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    50 साल पहले ही चांद पर पहुंच चुका इंसान, फिर NASA का ऑर्टेमिस-2 अब क्या खोजेगा? जानें हर सवाल का जवाब

    2 hours from now

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    नासा का आर्टिस्ट मून मिशन फ्लोरिडा के कैनिटी स्पेस सेंटर से इतिहास को हराने नहीं इतिहास बदलने जा रहा है। ये सुनकर शायद आपका पहला रिएक्शन ये होगा। तो इसमें नया क्या है? जब इंसान 50 साल पहले ही चांद पर पहुंच चुका है। 1969 में चांद पर पहला कदम रख चुका है। उसके बाद अब तक 12 लोग चंद्रमा पर कदम रख चुके हैं। तो फिर आज के दुनिया में 93 बिलियन खर्च करके वही काम दोबारा क्यों किया जा रहा है? अब फिर से इतना पैसा लगाने की क्या जरूरत है? यही वो सवाल है जो हर किसी के मन में है और इसी सवाल का जवाब छिपा है। भविष्य की सबसे बड़ी अंतरिक्ष रेस में। नासा का आर्टिमिस टू मिशन सिर्फ एक स्पेस मिशन नहीं यह है एक लॉन्ग टर्म प्लान का हिस्सा जिसका लक्ष्य है चांद पर इंसानों को बसाना वहां संसाधनों का इस्तेमाल करना और आखिरकार मंगल तक पहुंचना यानी ये मिशन मून विजिट नहीं बल्कि मून सेटलमेंट की शुरुआत है क्या होगा आर्टिस्ट टू में यह भी जान लीजिए 1 अप्रैल 2026 को लॉन्चिंग अवधि 10 दिन क्रू में चार अंतरिक्ष यात्री रॉकेट है एसएलएस स्पेसक्राफ्ट ओरियो मिशन में नासा के रीड वाइसमैन कमांड है विक्टर ग्लोअर पायलट हैं। क्रिस्टना कोच स्पेशलिस्ट हैं और कनाडा के जर्मी हसन स्पेशलिस्ट हैं। इसे भी पढ़ें: युद्ध में फंसा भारत का जहाज, ईरान ने किया खेल, ट्रंप-नेतन्याहू हैरान!कोच पहली महिला होंगी जो चांद के अपने करीबंगी। एस्ट्रोनॉट ओरियन पर सवार होकर चंद्रमा के चारों ओर घूमेंगे लेकिन चंद्रमा पर लैंडिंग नहीं करेंगे। इस मिशन में अंतरिक्ष यात्री चांद के चारों ओर चक्कर लगाएंगे लेकिन वहां उतरेंगे नहीं। सवाल उठता है कि तो फिर जा क्यों रहे हैं? जवाब है टेस्ट करने के लिए। यह मिशन असल में एक ट्रायल रन है। इसमें टेस्ट होगा लाइट सपोर्ट सिस्टम का, कम्युनिकेशन का, नेविगेशन और इंसानों की सहनशक्ति का। क्योंकि अगला मिशन यानी कि एटमिस्ट भी सीधे चांद पर लैंड करेगा। अब अगला सवाल नासा इस मिशन के लिए इतना खर्चा क्यों कर रहा है? चंद्रमा की जमीन भले ही सूखी, धूल भरी और बंजर दिखाई देती हो, लेकिन असल में ऐसा बिल्कुल नहीं है। चांद क्या संसाधनों का खजाना है? वैज्ञानिकों का मानना है कि चांद पर वो सब कुछ है जो भविष्य बदल सकता है। पानी बर्फ के रूप में रेयर अर्थ एलिमेंट्स, लोहा, टाइटेनियम, हीलियम थ्री भी भारी मात्रा में वहां पर मौजूद हो सकता है। अब हीलियम थ्री खास क्यों है? क्योंकि ये भविष्य में न्यूक्लियर फ्यूजन एनर्जी का बड़ा सोर्स बन सकता है। इस मिशन के पीछे दूसरा सबसे बड़ा कारण है नई स्पेस रेस। अब मुकाबला है अमेरिका और चीन के बीच। चीन ट्रेनिंग से आगे बढ़ रहा है।इसे भी पढ़ें: 19 म‍िनट की स्पीच में जीत को लेकर क्या दावे कर गए? ईरान युद्ध के बीच ट्रंप के 10 सबसे बड़े ऐलान अंतरिक्ष यात्री अपनी 10 दिवसीय परीक्षण उड़ान के पहले 25 घंटे पृथ्वी के करीब ही रहेंगे, पृथ्वी के चारों ओर कक्षा में कैप्सूल की जांच करेंगे और फिर मुख्य इंजन को चालू करेंगे जो उन्हें चंद्रमा तक ले जाएगा। वे न तो चंद्रमा पर रुकेंगे और न ही उसकी परिक्रमा करेंगे, जैसा कि अपोलो 8 के पहले चंद्रयात्रियों ने 1968 की क्रिसमस की पूर्व संध्या पर किया था। उनका कैप्सूल चंद्रमा के पास से गुजरेगा और उससे 6,400 किलोमीटर आगे बढ़ने के बाद यू-टर्न लेकर सीधे प्रशांत महासागर में उतरेगा। इसी के साथ वे सबसे दूर तक जाने वाले इंसान बन जाएंगे। आर्टेमिस 1 के प्रक्षेपण के बाद से तीन साल से अधिक समय बीत चुका है। उस समय आर्टेमिस 1 कैप्सूल में कोई भी मनुष्य सवार नहीं था। उसमें जीवन रक्षक उपकरण और पानी की व्यवस्था करने वाला यंत्र एवं शौचालय जैसी अन्य आवश्यक सुविधाएं मौजूद नहीं थीं। ये प्रणालियां आर्टेमिस 2 के जरिए अंतरिक्ष में पहली बार इस्तेमाल हो रही हैं, जिससे जोखिम बढ़ गया है। यही वजह है कि नासा वाइजमैन और उनके दल को चांद की ओर चार दिन की यात्रा और चार दिन की वापसी यात्रा पर भेजने से पहले पूरा एक दिन इंतजार कर रहा है।इसे भी पढ़ें: Project Hail Mary Review | अंतरिक्ष की गहराइयों में छिपी उम्मीद और दोस्ती की एक मानवीय दास्तांअगर आटम हिस्ट्री सफल रहा तो एटम हिस्ट्री ल्च होगा। इंसान फिर से चांद पर उतरेगा। आगे चलकर चांद पर कॉलोनी बनेगी। मंगल मिशन को रफ्तार मिलेगी। यह मिशन दोहराव नहीं है। यह भविष्य की बुनियाद है। क्योंकि आने वाले समय में जिसके पास स्पेस होगा उसी के पास पावर होगी। यह सिर्फ चांद पर लौटने की कहानी नहीं है। यह उस दौर की शुरुआत है जहां इनाम है पूरे ब्रह्मांड पर पकड़। 
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