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    9 राज्यों में 42 हजार बुजुर्गों का नेटवर्क:एक-दूसरे की मदद कर 70% बुजुर्ग आत्मनिर्भर हुए; सुनामी के बाद तमिलनाडु से शुरू हुए सेल्फ-हेल्प ग्रुप

    10 hours ago

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    बिहार के सुपौल जिले के 75 वर्षीय मोहन मंडल गांव में बुजुर्गों के एक समूह का हिस्सा हैं। इसमें हमउम्र साथी एक-दूसरे का ख्याल रखते हैं और सरकारी योजनाओं से जुड़ने में मदद करते हैं। मोहन को भी एक साथी ने इलाज के लिए ‘वय वंदना कार्ड’ बनाने के लिए प्रेरित किया। उस समय उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि यह कार्ड कभी उनकी जिंदगी बचाएगा। कुछ दिन बाद ही मोहन मंडल को ब्रेन स्ट्रोक आया। इलाज का खर्च लाखों रुपए था। ऐसे समय में गांव के ग्रुप ने परिवार को योजना में सूचीबद्ध अस्पताल तक पहुंचाया। वहां उनका ऑपरेशन हुआ। तीन लाख रुपए खर्च हुए। आज मोहन स्वस्थ हैं। अब दूसरे बुजुर्गों को भी जरूरत के खर्चों के लिए तैयार रहने के लिए प्रेरित करते हैं। यूएन पॉपुलेशन अवॉर्ड से सम्मानित हेल्पएज इंडिया ने सुनामी के बाद इस तरह के समूहों की नींव रखी थी। आज मोहन जैसे करीब 42 हजार बुजुर्ग देशभर के 9 राज्यों में फैले ऐसे 3 हजार ग्रुप्स से जुड़े हुए हैं। समूह के हर बुजुर्ग के पास 1.19 लाख रुपए हो गए हैं सुपौल में बुजुर्ग हर महीने 50-50 रु. जमा करते हैं। 15 साल में समूह अपने सदस्यों में 2.33 करोड़ रु. का लोन दे चुका है। इससे 13 लाख रु. की आय हुई। अब ग्रुप के प्रत्येक सदस्य की हिस्सेदारी 1.19 लाख रु. है। लोग उन्हें लखपति बुजुर्ग कहते हैं। भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने भी एल्डर सेल्फ हेल्प ग्रुप मॉडल अपनाने का फैसला किया है। इसे राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन में शामिल किया है। एक-दूसरे की मदद के मंच के तौर पर शुरू हुआ था ग्रुप साल 2004 में आई सुनामी से प्रभावित बुजुर्गों के लिए 2005 में चेन्नई में पहला एल्डर सेल्फ हेल्प ग्रुप बना। इसके बाद देशभर में शुरू किया गया। एक ग्रुप में 55 वर्ष या उससे ज्यादा उम्र के 10-20 बुजुर्ग होते हैं। संस्था गांवों में जाकर ऐसे लोगों की पहचान करती है, जो आर्थिक, सामाजिक या स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों से जूझ रहे होते हैं। सदस्य नियमित बैठक करते हैं। बचत करते हैं। एक-दूसरे को ऋण देते हैं और स्थानीय समस्याओं पर मिलकर काम करते हैं। इन ग्रुप्स के 70% बुजुर्ग पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गए हैं। (जैसा दैनिक भास्कर के राजेश को बताया)
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