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    Afghanistan-Pakistan War ने लिया और भीषण रूप, Trump का समर्थन मिलने से झूम उठे शहबाज और मुनीर

    3 hours from now

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    पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच 2600 किलोमीटर लंबी सीमा पर चल रहा तनाव अब खुले सैन्य टकराव का रूप ले चुका है। दोनों देशों ने एक दूसरे पर हवाई हमले, ड्रोन स्ट्राइक और सीमा चौकियों पर हमलों का आरोप लगाया है। इस तेजी से बिगड़ती स्थिति के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान की खुलकर प्रशंसा करते हुए उसके आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन किया है, जिससे क्षेत्रीय कूटनीति में नया मोड़ आ गया है।तनाव की ताजा कड़ी उस समय शुरू हुई जब पाकिस्तान ने ऑपरेशन गजब लिल हक के तहत काबुल, कंधार और पक्तिया सहित कई स्थानों पर हवाई और मिसाइल हमले किए। पाकिस्तान का दावा है कि इन हमलों में 274 तालिबान लड़ाके और अधिकारी मारे गए। दूसरी ओर अफगान पक्ष ने कहा कि उसने जवाबी कार्रवाई में 55 पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया, जबकि पाकिस्तान ने अपने 12 सैनिकों के मारे जाने की पुष्टि की है। मीडिया रिपोर्टों में काबुल में हमलों के बाद कई स्थानों से काला धुआं उठता देखा गया और नागरिकों के हताहत होने की भी खबरें सामने आईं।इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: Bangladesh Army में मौजूद Pakistan समर्थक अफसरों को PM Tarique Rahman ने दिखाया बाहर का रास्ताउधर, अफगानिस्तान में सत्ता पर काबिज तालिबान नेतृत्व ने हमलों के कुछ घंटों बाद संवाद की इच्छा जताई। तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने कहा कि इस्लामिक अमीरात हमेशा बातचीत के जरिये मसले सुलझाने की कोशिश करता रहा है और अब भी वह वार्ता के लिए तैयार है।इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका की भूमिका विशेष ध्यान खींच रही है। अमेरिकी राजनीतिक मामलों की उप विदेश मंत्री एलिसन हुकर ने पाकिस्तान की विदेश सचिव आमना बलूच से बातचीत के बाद कहा कि अमेरिका स्थिति पर नजर रखे हुए है और तालिबान के हमलों के खिलाफ आत्मरक्षा करने के पाकिस्तान के अधिकार का समर्थन करता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि तालिबान आतंकवाद विरोधी प्रतिबद्धताओं को निभाने में विफल रहा है।राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी पाकिस्तान की नेतृत्व की खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के साथ उनके बहुत अच्छे संबंध हैं और वहां एक महान प्रधानमंत्री और महान जनरल हैं, जिनका वह सम्मान करते हैं। ट्रंप ने कहा कि पाकिस्तान बहुत बढ़िया प्रदर्शन कर रहा है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने दोनों देशों के बीच खुले युद्ध जैसी स्थिति की बात कही है।ट्रंप के इन बयानों को कूटनीतिक हलकों में पाकिस्तान के पक्ष में झुकाव के रूप में देखा जा रहा है। पहले जहां अमेरिका तालिबान के साथ समझौते और क्षेत्रीय स्थिरता की बात करता था, वहीं अब वह खुले तौर पर पाकिस्तान के आत्मरक्षा अधिकार का समर्थन कर रहा है। इससे यह संदेश जाता है कि वाशिंगटन इस संघर्ष में इस्लामाबाद के साथ खड़ा है। इससे अफगान तालिबान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ सकता है और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पाकिस्तान के पक्ष में झुक सकता है।इस टकराव का सामरिक महत्व बेहद गहरा है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सीमा क्षेत्र पहले से ही उग्रवादी संगठनों की गतिविधियों का केंद्र रहा है। यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो इससे पूरे दक्षिण एशिया और मध्य एशिया में अस्थिरता फैल सकती है। चीन, ईरान और रूस जैसे देश भी इस क्षेत्र में अपने सामरिक हित रखते हैं। रूस ने सशस्त्र झड़पों में तेज वृद्धि पर चिंता जताते हुए दोनों देशों से वार्ता की अपील की है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतरेस ने भी हिंसा पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए तत्काल संघर्ष विराम और कूटनीतिक समाधान का आह्वान किया है।यूरोपीय संघ ने भी अफगान क्षेत्र का उपयोग दूसरे देशों पर हमले के लिए न होने देने की बात दोहराई है। ब्रिटेन ने तनाव कम करने का आग्रह किया है, चीन ने युद्ध विराम की अपील की है और ईरान ने मध्यस्थता की पेशकश की है। इन प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट है कि यह संघर्ष केवल द्विपक्षीय मामला नहीं रह गया है, बल्कि वैश्विक शक्तियां भी इसकी दिशा पर नजर रखे हुए हैं।देखा जाये तो सामरिक दृष्टि से पाकिस्तान का काबुल और कंधार जैसे शहरों को निशाना बनाना महत्वपूर्ण संकेत है। यह पहली बार है जब उसने सीधे अफगान शासन संरचना को लक्ष्य बनाया है। वहीं अफगानिस्तान की जवाबी ड्रोन कार्रवाई यह दिखाती है कि वह भी सैन्य स्तर पर जवाब देने में सक्षम है।बहरहाल, ट्रंप के बयानों ने इस पूरे संकट को और संवेदनशील बना दिया है। यदि अमेरिका खुलकर पाकिस्तान के साथ खड़ा रहता है तो यह तालिबान को और अलग थलग कर सकता है। दूसरी ओर, इससे क्षेत्रीय ध्रुवीकरण बढ़ सकता है और संघर्ष के और व्यापक होने का खतरा भी पैदा हो सकता है। फिलहाल स्थिति बेहद नाजुक है और संवाद ही एकमात्र रास्ता नजर आता है, लेकिन जमीनी हालात बताते हैं कि दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई काफी गहरी हो चुकी है।
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