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    अयोध्या में जगद्गुरु रत्नेश बोले-सीता का चरित्र संयम सीखाता है:रामायण केवल श्रीराम की कथा नहीं, बल्कि मानव के रामत्व की यात्रा है

    5 hours ago

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    अयोध्या की पुण्यभूमि पर नवनिर्मित श्रीरामायण वेला देवस्थान में आयोजित प्राणप्रतिष्ठा महोत्सव के द्वितीया दिवस का दृश्य श्रद्धा, संस्कृति और आदर्शों का अद्भुत संगम बन गया। पूरा परिसर वेद मंत्रों, भजनों और ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष से गुंजायमान रहा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने आयोजन को भव्यता प्रदान की।द्वितीय दिवस पर श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण कथा के अंतर्गत जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी रत्नेश प्रपन्नाचार्य ने श्रीसीता चरित्र और प्रभु श्रीराम के जन्म प्रसंग का अत्यंत सरल, मधुर और हृदयस्पर्शी वर्णन किया। कथा श्रवण के दौरान श्रद्धालु भाव-विभोर नजर आए। माता सीता का जीवन त्याग, धैर्य और मर्यादा की अनुपम मिसाल आचार्य ने कहा कि माता सीता का जीवन त्याग, धैर्य और मर्यादा की अनुपम मिसाल है। उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में जब परिवार और समाज अनेक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, तब सीता का चरित्र हमें संयम, सहनशीलता और आत्मसम्मान का पाठ पढ़ाता है। कठिन परिस्थितियों में भी धर्म और सत्य का साथ न छोड़ने की प्रेरणा सीता के जीवन से मिलती है। उनका संपूर्ण जीवन नारी शक्ति, गरिमा और आदर्श का प्रतीक है।श्रीराम जन्म प्रसंग का वर्णन करते हुए आचार्यश्री ने उस दिव्य क्षण का सजीव चित्र उपस्थित किया, जब अयोध्या आनंद और मंगलध्वनि से भर उठी थी। राम एक आदर्श पुत्र, आदर्श राजा और आदर्श मानव के रूप में सदैव पूजनीय उन्होंने कहा कि प्रभु श्रीराम का जन्म केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि धर्म, न्याय और करुणा के अवतरण का प्रतीक है। राम एक आदर्श पुत्र, आदर्श राजा और आदर्श मानव के रूप में सदैव पूजनीय रहेंगे। उनका जीवन समाज कोकर्तव्यनिष्ठा, सत्य और लोककल्याण का मार्ग दिखाता है। प्राणप्रतिष्ठा महोत्सव के अवसर पर श्रद्धालुओं ने पूरे उत्साह और भक्ति भाव से भाग लिया। मंदिर परिसर को आकर्षक ढंग से सजाया गया था। कथा के उपरांत भजन-कीर्तन और आरती में उपस्थित जनसमूह ने एक स्वर में प्रभु का स्मरण किया। कथा के विश्राम बेला पर आरती उतारी की प्रसाद वितरण किया गया। आए हुए अतिथियों का स्वागत सम्मान किया गया। इससे पहले देवस्थान श्रीरामायण वेला में श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के भव्य शुभारंभ का आयोजन अत्यंत श्रद्धा, गरिमा और वैदिक मंगलध्वनि के मध्य सम्पन्न हुआ। संत-महात्माओं की पावन उपस्थिति से सम्पूर्ण वातावरण आध्यात्मिक आलोक से दीप्त हो उठा। कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ मणिराम दास जी की छावनी के उत्तराधिकारी महंत कमलनयन दास महाराज द्वारा दीपप्रज्वलन कर किया गया। वाल्मीकि रामायण भारतीय संस्कृति का शाश्वत प्राण है-महंत कमल नयन दास आशीर्वचन में उन्होंने कहा कि वाल्मीकि रामायण केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का शाश्वत प्राण है। उन्होंने इसे मर्यादा, कर्तव्य और आदर्श जीवन की दिव्य पाठशाला बताते हुए जनमानस से इसके नियमित श्रवण और मनन का आग्रह किया। धर्म, प्रेम और समरसता का सार्वकालिक संदेश-जगद्गुरु कृपालुरामभूषण जगद्गुरु कृपालुरामभूषण दास देवाचार्य ने कहा कि रामायण मानवता के लिए धर्म, प्रेम और समरसता का सार्वकालिक संदेश है। उन्होंने कहा कि जब समाज अपने मूल मूल्यों से विचलित होता है, तब रामकथा उसे पुनः संतुलन और सदाचार की दिशा प्रदान करती है। रामायण ‘आदर्श पारिवारिक जीवन का दर्पण’ -आचार्य मिथिलेशनन्दिनी शरण आचार्य मिथिलेशनन्दिनी शरण ने रामायण को ‘आदर्श पारिवारिक जीवन का दर्पण’ बताते हुए कहा कि श्रीराम का चरित्र त्याग, सत्य और कर्तव्यनिष्ठा की सर्वोच्च पराकाष्ठा है। उन्होंने विशेष रूप से मातृ-पितृ भक्ति और भ्रातृ प्रेम के प्रसंगों को आज के युग के लिए अत्यंत प्रासंगिक बताया। प्रेमशंकरदास रामायणी ने कहा कि रामकथा श्रवण से अंत:करण की शुद्धि होती है और समाज में सद्भाव का संचार होता है। उन्होंने रामनाम की महिमा का वर्णन करते हुए इसे कलियुग का सरलतम साधन बताया। इस अवसर पर जगद्गुरु रत्नेश प्रपन्नाचार्य जी महाराज द्वारा श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण का कथा-वाचन किया गया। उन्होंने बालकाण्ड के मंगलाचरण से प्रारंभ करते हुए महर्षि वाल्मीकि की करुणा, तप और दिव्य दृष्टि का उल्लेख किया। रामायण केवल श्रीराम की कथा नहीं, बल्कि ‘मानव के रामत्व की यात्रा’ कथा में उन्होंने स्पष्ट किया कि रामायण केवल श्रीराम की कथा नहीं, बल्कि ‘मानव के रामत्व की यात्रा’ है। उन्होंने बताया कि श्रीराम का जीवन संघर्षों के मध्य भी मर्यादा की अखंड ज्योति जलाए रखने की प्रेरणा देता है। कथा के दौरान उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर होकर ‘सीताराम’ के जयघोष से वातावरण गुंजायमान करते रहे। सम्पूर्ण आयोजन भक्ति, ज्ञान और वैराग्य के समन्वित संदेश के साथ संपन्न हुआ। इस भव्य शुभारंभ ने यह संदेश दिया कि श्रीधाम अयोध्या की पावन भूमि पर रामायण का निनाद केवल परंपरा नहीं, बल्कि संस्कृति के पुनर्जागरण का सशक्त संकल्प है।
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