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    बरेली में 3 प्राइवेट कॉलेज, सरकारी की जरूरत नहीं-वन मंत्री:9 साल से धूल फांक रहे सुपर स्पेशलिटी अस्पताल और लखनऊ शिफ्ट हुए क्रिटिकल केयर पर बचते नजर आए डॉक्टर मंत्री

    9 hours ago

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    बरेली शहर के विधायक और पेशे से डॉक्टर वन मंत्री डॉ. अरुण कुमार सक्सेना ने स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर एक ऐसा बयान दिया है, जिसने जिले की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। दैनिक भास्कर के तीखे सवालों के घेरे में आए मंत्री जी ने साफ कह दिया कि बरेली में पहले से ही 3 प्राइवेट मेडिकल कॉलेज हैं, इसलिए यहाँ सरकारी मेडिकल कॉलेज की कोई जरूरत नहीं है। यह बयान उस समय आया है जब बरेली की जनता बरसों से एक आधुनिक सरकारी स्वास्थ्य केंद्र की राह देख रही है। 9 साल से अधूरे पड़े 300 बेड के सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल और जमीन न मिलने के कारण लखनऊ शिफ्ट हो चुके क्रिटिकल केयर यूनिट पर मंत्री जी के पास 'प्रयास करेंगे' जैसे रटे-रटाए जवाब के अलावा कुछ नहीं था। बजट की वाहवाही में छिपा ली बरेली की बदहाली वन मंत्री डॉ. सक्सेना ने प्रदेश के बजट का जमकर गुणगान किया। उन्होंने इसे किसानों, नौजवानों और महिलाओं के लिए कल्याणकारी बताते हुए मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री को बधाई दी। मंत्री जी ने बेटियों को स्कूटी और युवाओं को लैपटॉप देने के वादों पर तो खूब खुशी जताई, लेकिन जब सवाल बरेली के छिद्रित स्वास्थ्य ढांचे का आया, तो उन्होंने बड़ी चालाकी से प्राइवेट कॉलेजों का ढाल बनाकर पल्ला झाड़ लिया। उनके अनुसार, सरकार हर जिले में मेडिकल कॉलेज खोल रही है, लेकिन बरेली के लिए उनकी प्राथमिकता में सरकारी कॉलेज शामिल ही नहीं है। प्रशासनिक लापरवाही: बरेली का 'हक' अब लखनऊ के पास वन मंत्री डॉ अरुण कुमार से जब क्रिटिकल केयर हॉस्पिटल के जमीन न मिलने के कारण लखनऊ शिफ्ट होने का सवाल किया गया तो उन्होंने वही रटा रटाया बयान दिया कि प्रयास करेंगे। इसी तरह जब उनसे सपा सरकार में बने 300 बेड सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के 9 साल से अभी तक चालू नहीं हो पाने का कारण पूछा तो फिर वही रटा रटाया बयान दोहराया गया कि शुरू कराने का प्रयास करेंगे। क्या है 'क्रिटिकल केयर हॉस्पिटल बरेली के स्वास्थ्य भविष्य के लिए यह एक गहरा जख्म है। प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन के तहत जिले को जो 'क्रिटिकल केयर हॉस्पिटल ब्लॉक' और 'एकीकृत जन स्वास्थ्य प्रयोगशाला' मिलनी थी, वह अब आधिकारिक रूप से लखनऊ शिफ्ट हो गई है। साल 2021 से 2026 तक स्थानीय प्रशासन इस बेशकीमती प्रोजेक्ट के लिए महज एक टुकड़ा जमीन नहीं जुटा पाया। यह प्रशासनिक सुस्ती अब बरेली के उन मरीजों पर भारी पड़ेगी जिन्हें आपातकालीन स्थिति में लखनऊ या दिल्ली की दौड़ लगानी पड़ती है। सांसद के सवाल पर संसद में खुला बरेली की नाकामी का कच्चा चिट्ठा संसद के पटल पर बरेली की प्रशासनिक नाकामी उस वक्त सार्वजनिक हो गई जब सांसद नीरज मौर्य के सवाल पर केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री ने कड़वा सच बोला। मंत्री ने लोकसभा में स्पष्ट किया कि यूपी के लिए स्वीकृत 74 गहन चिकित्सा ब्लॉकों की सूची में बरेली का नाम प्रमुखता से था, लेकिन स्थानीय स्तर पर जमीन उपलब्ध न होने के कारण इसे लखनऊ स्थानांतरित करना पड़ा। इस खुलासे ने स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के उन दावों की हवा निकाल दी है जो विकास की बड़ी-बड़ी बातें करते नहीं थकते।
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