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    CSJMU में उकेरी गईं लोक कला की विरासत:छात्रों ने सीखी मधुबनी और गोंड आर्ट की बारीकियां, मास्टर कारीगरों ने बताए सदियों पुराने किस्से

    3 hours ago

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    छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय (CSJMU) इन दिनों भारतीय रंगों और परंपराओं से सराबोर नजर आ रहा है। यूनिवर्सिटी के 'स्कूल ऑफ क्रिएटिव एंड परफॉर्मिंग आर्ट्स' में 'धरोहर 2026' उत्सव के तहत 'कलाकृति' नामक विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस दौरान कैंपस का पूरा माहौल किसी जीवंत आर्ट गैलरी जैसा नजर आया, जहां छात्र अपनी सांस्कृतिक जड़ों से रूबरू हुए। तीन राज्यों की प्रसिद्ध लोक कलाओं का दिखा संगम इस कार्यशाला के माध्यम से भारत के अलग-अलग कोनों की प्रसिद्ध लोक कलाओं को एक मंच पर लाया गया। छात्रों ने न केवल इन कलाकृतियों को बनाना सीखा, बल्कि उनके पीछे छिपे गहरे इतिहास और सांस्कृतिक महत्व को भी गहराई से समझा। कार्यशाला के दौरान बिहार की विश्व प्रसिद्ध मधुबनी चित्रकला के चटक रंगों और ज्यामितीय पैटर्न के जरिए प्रकृति को उकेरा गया। वहीं महाराष्ट्र की वारली कला के जरिए सामाजिक जीवन और सामुदायिक नृत्य के दृश्यों को सफेद आकृतियों में ढालना सिखाया गया। मध्य प्रदेश की गोंड कला के बारीक बिंदुओं और रेखाओं के जादू ने भी छात्रों को खूब आकर्षित किया। किताबी ज्ञान नहीं, प्रैक्टिकल अनुभव पर रहा जोर 'धरोहर 2026' का मुख्य उद्देश्य भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) को किताबी पन्नों से बाहर निकालकर छात्रों के हाथों तक पहुंचाना है। पूरे सप्ताह चलने वाले इस उत्सव में छात्रों को मास्टर कारीगरों से सीधे सीखने का मौका मिला। कार्यशाला का मुख्य आकर्षण पारंपरिक कला रूपों को समकालीन रचनात्मकता के साथ जोड़ना रहा। छात्रों ने जाना कि ये कलाएं सिर्फ चित्रकारी नहीं हैं, बल्कि इनमें कई पीढ़ियों का धैर्य, कौशल और वो सांस्कृतिक कहानियां छिपी हुई हैं जो हमें हमारे पूर्वजों से जोड़ती हैं। 'NEP सारथी' और आधुनिक रचनात्मकता का मेल इस पूरे कार्यक्रम का समन्वय 'NEP सारथी' टीम द्वारा किया गया। यह विश्वविद्यालय के उन सक्रिय छात्रों का समूह है जो नई शिक्षा नीति के तहत भारतीय ज्ञान परंपरा को लेकर जागरूकता फैला रहे हैं। डॉ. अंशु सिंह ने बताया कि इस तरह के व्यावहारिक अनुभव न केवल पारंपरिक कलाओं को संरक्षित करते हैं, बल्कि शैक्षणिक समुदाय को उन कारीगरों के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए भी प्रेरित करते हैं जिन्होंने सदियों से इस विरासत को बचाकर रखा है। कार्यशाला में छात्रों ने पारंपरिक प्रतीकों का उपयोग करते हुए अपनी कल्पना के नए रंग भरे, जिससे पुरानी परंपरा और आधुनिक सोच का अनूठा संगम देखने को मिला।
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