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    गोरखपुर में पानी पर फ्लोटिंग सोलर प्लांट बनेगा:20 मेगावाट बिजली पैदा करेगा; जमीन की जगह झील में बनाने की जरूरत क्यों

    2 hours ago

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    योगी कैबिनेट ने 23 मार्च को गोरखपुर में फ्लोटिंग सोलर पावर प्लांट लगाने की मंजूरी दी है। तैरने वाला ये पावर प्लांट चिलुआताल पर बनेगा। इसकी क्षमता 20 मेगावाट होगी। गोरखपुर के लोग यहां से पैदा हुई बिजली का इस्तेमाल करेंगे। अब सवाल ये है कि सोलर प्लांट तो जमीन पर भी लग सकता है, फिर इसे झील पर बनाने की क्या जरूरत है? भारी सोलर पैनल तैरते कैसे हैं? पानी और बिजली साथ होंगे, ये कितना खतरनाक हो सकता है? पढ़िए भास्कर एक्सप्लेनर में… सवाल- पानी पर तैरने वाला सोलर पावर प्लांट कैसे बनता है? जवाब- फ्लोटिंग सोलर प्लांट में सोलर पैनल्स को प्लास्टिक से बनी मचान (फ्लोटर्स) पर रखकर झील के ऊपर तैराया जाता है। फ्लोटर्स को अपने से 2.5 गुना ज्यादा वजन उठाने के लिए डिजाइन किया जाता है। गर्मी-बरसात में झील का जलस्तर ऊपर-नीचे होने या तेज हवाओं में पैनल अपनी जगह से न हिलें, इसके लिए फ्लोटर्स झील की तलहटी में लंगर से बांध दिए जाते हैं। फ्लोटर्स का पूरा फ्रेम जंगरोधी मटेरियल से बनाया जाता है। इसके अलावा प्लांट में लगने वाले सोलर पैनल्स भी खास तरह से बनाए जाते हैं। सामान्य सोलर पैनल्स की तरह इन्हें बनाने में लेड का इस्तेमाल नहीं होता। चूंकि ये पैनल्स हमेशा पानी के संपर्क में रहते हैं, इसलिए इनमें खास वाटर प्रूफिंग होती है। प्लांट से बनने वाली बिजली को ग्रिड तक पहुंचाने के लिए पानी के नीचे से इन्सुलेटेड केबिल बिछाई जाती है। इसके जरिए बिजली किनारों पर लगे इनवर्टर्स तक पहुंचती है। फिर वहां से मुख्य ग्रिड में भेजी जाती है। सवाल- सोलर प्लांट को झील में लगाने की जरूरत क्यों पड़ी? जवाब- 20 मेगावाट के प्लांट के लिए 100 से 120 एकड़ जमीन का इस्तेमाल होता है। प्लांट लगने के बाद जमीन खेती या अन्य निर्माण के लिए इस्तेमाल नहीं हो सकती। इसके अलावा सोलर प्लांट अक्सर दूरदराज के इलाकों में लगाए जाते हैं। वहां बुनियादी ढांचा, बिजली ट्रांसमिशन, संचालन और देख-रेख में काफी लागत आती है। अगर पहाड़ी इलाके में सोलर प्लांट लगाना हो तो लागत और बढ़ जाती है। इन सभी फैक्ट को ध्यान में रखते हुए सोलर एक्सपर्ट तालाबों को एक विकल्प के रूप में देखते हैं। इससे जमीन का प्रोडक्टिव उपयोग जैसे- खेती, आवास, पर्यटन में इस्तेमाल हो सकता है। सवाल- क्या यह जमीन पर लगे प्लांट से बेहतर होता है? जवाब- जी हां। रिसर्च से पता चला है कि तैरते हुए सोलर प्लांट की बिजली उत्पादन क्षमता जमीन पर बने प्लांट से 10% ज्यादा होती है। दरअसल, तैरते हुए सोलर प्लांट के पैनल पानी की वजह से ठंडे रहते हैं। इससे उनकी कार्यक्षमता बढ़ जाती है और वो ज्यादा बिजली बनाते हैं। जमीन पर भीषण गर्मी से सोलर पैनलों की कार्यक्षमता कम हो जाती है। सवाल- क्या नदी और समुद्र में भी फ्लोटिंग सोलर प्लांट लगा सकते हैं? जवाब- आमतौर पर तैरते हुए सोलर प्लांट झीलों और बांधों पर बने कृत्रिम जलाशयों के ऊपर ही लगाए जाते हैं। झीलों और जलाशयों के पानी में ठहराव होता है। इनमें बड़ी लहरें नहीं उठतीं। नदी और समुद्र में इन प्लांट्स को लहरों का लगातार सामना करना पड़ेगा। इससे डिजाइन और संचालन की लागत काफी बढ़ जाएगी। किसी हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट (पनबिजली योजना) के जलाशय पर बने सोलर प्लांट ज्यादा किफायती साबित होते हैं। वहां पानी से बिजली बनाने के लिए मौजूद ग्रिड कनेक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर का फ्लोटिंग प्लांट में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे लागत में भारी कमी आती है। सवाल- क्या यूपी में पहले से भी कोई फ्लोटिंग सोलर पावर प्लांट है? जवाब- यूपी में 2 फ्लोटिंग सोलर पावर प्लांट पहले से एक्टिव हैं। औरैया के दिबियापुर में 20 मेगावाट का प्लांट चल रहा है। ये यूपी का पहला फ्लोटिंग प्लांट था। इसे नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन (NTPC) ने बनाया था। इसके अलावा बुलंदशहर के खुर्जा में 11 मेगावॉट का प्लांट है। यूपी सरकार अब कोल इंडिया के जरिए गोरखपुर के चिलुआताल में 20 मेगावॉट का नया प्लांट लगा रही है। ललितपुर में भी 49 मेगावाट का प्रोजक्ट प्रस्तावित है। सवाल- क्या अन्य राज्यों में फ्लोटिंग सोलर प्लांट काम कर रहे? जवाब- हां, तेलंगाना के रामागुंडम में भारत का सबसे बड़ा 100 मेगावाट का फ्लोटिंग सोलर प्लांट जुलाई, 2022 में चालू किया गया था। इसके बाद केरल के कायमकुलम में देश का दूसरा सबसे बड़ा 92 मेगावाट का फ्लोटिंग सोलर प्लांट अगस्त, 2022 में चालू किया गया था। इसके अलावा मध्यप्रदेश के खंडवा जिले में नर्मदा नदी पर ओंकारेश्वर बांध में विश्व का सबसे बड़ा 600 मेगावाट का तैरता सोलर प्लांट बनाया जा रहा है। सवाल- फ्लोटिंग सोलर पावर प्लांट लगाने की क्या चुनौतियां हैं? जवाब- इसको बनाने में आने वाली लागत सबसे बड़ी चुनौती है। इसके लिए विशेष तरह के सोलर इक्विपमेंट और पैनल लगाने के लिए एक्सपर्ट टेक्नीशियन की जरूरत होती है। फ्लोटर्स को लंगर डालकर स्थिर करना और बांधना कठिन होता है। इससे इंजीनियरिंग और निर्माण लागत बढ़ जाती है। बिजली और पानी की एक साथ मौजूदगी से सेफ्टी को लेकर भी कुछ गंभीर चिंताएं होती हैं। चूंकि केबल पानी के नीचे हैं, इसलिए इन्सुलेशन टेस्टिंग पर विशेष ध्यान देना जरूरी होता है। हालांकि, इस तकनीक पर काफी शोध हो चुका है। फिर भी इन प्रोजेक्ट्स को लेकर कुछ अनिश्चितताएं बनी हुई हैं। इन्हें कश्मीर, लेह-लद्दाख जैसे ठंडे इलाकों में स्थापना को लेकर एक्सपर्ट्स में एक राय नहीं है। भीषण सर्दियों में झीलों के जम जाने पर सोलर प्लांट पर क्या असर होगा, इसके बारे में साफ डेटा नहीं है। सवाल- पावर प्लांटों को बंद करके सारी बिजली सोलर से क्यों नहीं बना सकते? जवाब- सोलर एनर्जी के साथ एक बड़ी समस्या है, ये तभी काम करती है जब सूरज चमक रहा हो। बारिश, बादल या सर्दियों में सोलर पैनल से बिजली उत्पादन की क्षमता 10 से 50 फीसदी तक कम हो जाती है। दूसरी समस्या होती है कि आप ग्रिड में एक निश्चित मात्रा में ही ऊर्जा रख सकते हैं। बहुत ज्यादा बिजली होगी, तो उसे छोड़ना ही पड़ेगा। स्टोरेज की समस्या को देखते हुए सोलर से बहुत ज्यादा बिजली बनाना संभव नहीं है। -------------------------- ये खबर भी पढ़ें… शंकराचार्य की 'चतुरंगिणी' सेना कैसी होगी, योद्धाओं की पीली ड्रेस; हाथ में तलवार-भाले शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद अपनी सेना तैयार कर रहे हैं। इसके सेनापति खुद शंकराचार्य होंगे। टास्क वो खुद देंगे, उनके आदेश पर ये सेना पूरे देश में मूवमेंट करेगी। अभी मौजूदा वक्त में 3 तरह के टास्क होंगे। इस सेना को बनाने की शुरुआत हिंदू नववर्ष यानी 19 मार्च से होगी। पूरी खबर पढ़ें…
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