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    'हमसे बड़े मुजरिम संसद में रहते हैं':मुनव्वर के बेटे तबरेज बोले- सच बोलना ही जुर्म बन गया; डबल इंजन की ट्रेन में नफरती टीटीई

    1 hour ago

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    ‘इनको हमारे सच से सदमे रहते हैं, यूंही थोड़ी मुकदमे रहते हैं। जुर्म यही है हम हैं खुदा वाले, वरना हमसे बड़े मुजरिम संसद में रहते हैं…' यह शेर दिवंगत शायर मुनव्वर राणा के बेटे तबरेज राणा ने बरेली के मुशायरे में पढ़ा। इसकी आखिरी पंक्ति को लेकर विवाद खड़ा हो गया। पूरे विवाद पर दैनिक भास्कर ने तबरेज राणा से बात की। उनसे जानना चाहा कि ऐसा शेर क्यों पढ़ा? इसके जरिये वह क्या कहना चाहते थे? धुरंधर मूवी से शायरी को जोड़ने की जरूरत क्यों पड़ी? इन सवालों के जवाब तबरेज ने बेबाकी से दिए। उन्होंने कहा कि आजकल डबल इंजन की सरकार है। लेकिन, इसमें टीटीई तो नफरती बैठा है। पढ़िए पूरा इंटरव्यू… सवाल : आपके एक शेर का विरोध हो रहा है, इसके जरिये आपने क्या कहने की कोशिश की है? जवाब : शेर ‘इनको हमारे सच से सदमे रहते हैं, यूंही थोड़ी मुकदमे रहते हैं। जुर्म यही है हम हैं खुदा वाले, वरना हमसे बड़े मुजरिम संसद में रहते हैं…' को हमने कई दिन पहले पढ़ा था, वायरल अब हो रहा है। बहुत आसान सी भाषा में यह कहा गया है। बस बात इतनी है कि झूठ की दुनिया में सच बोल दिया जाए तो सबको हैरानी होती है। अगर आप आंकड़े निकालेंगे तो पता चल जाएगा कि कितने ऐसे लोग संसद में बैठे हैं, जिन पर मुकदमे हैं, और कितने ऐसे भी हैं, जिनके मुकदमे वापस ले लिए गए हैं। मुकदमे राजनीति में डिग्री बन गए हैं। जिसके पास जितने ज्यादा होंगे, उसे उतनी ही बड़ी कुर्सी मिलेगी। हमारे ऊपर कोई मुकदमा नहीं है, इसलिए हम लाइब्रेरी की कुर्सी पर बैठे हैं। झूठ के कमरे में अचानक चिराग जल जाए, सच बिल्कुल वैसा ही होता है। शायद यही वजह है कि लोगों को यह शेर हजम नहीं हो रहा। सवाल : संसद तक तो केवल साफ-सुथरी छवि के लोग पहुंच सकते हैं जवाब : ये लोग सिर्फ दिखने में साफ-सुथरे होते हैं। बहुत पहले मेरे पिताजी ने एक शेर कहा था- ‘यह जो साफ-शफ्फाफ लिबासों में नजर आते हैं, कौन मानेगा ये सब वही कल वाले हैं। लूटने वाले उसे कत्ल न करते, लेकिन उसने पहचान लिया था कि बगल वाले हैं।’ सिर्फ लिबास से यह तय नहीं किया जा सकता कि कौन कितना साफ है। सवाल : फिल्म धुरंधर पर भी आपने शेर लिखा, क्यों जरूरत पड़ी? जवाब : फिल्म धुरंधर आई थी, जिसमें तमाम तरह के तमाशे दिखाए गए। हमने उसे देखा। लगभग हर चीज का श्रेय सरकार को दिया गया। क्या-क्या किया गया, यह दिखाया गया। लेकिन, फिल्म तथ्यों और आंकड़ों से काफी दूर थी, जिसे देखकर अजीब लगा। 2016 में नोटबंदी से लेकर 2024 में माफिया पर कार्रवाई तक बहुत कुछ दिखाया गया है। उसे देखने का मेरा भी एक नजरिया था, जिसे मैंने शेर के जरिये रखा- बिकते न थे जो कहीं मंजर में आ गए,गम आपको हुआ कैसे बराबर में आ गए,कुछ सोच कर हम करते हैं आपका एहतराम,रोकेगा कौन जो हम तेवर में आ गए,लाशों से काम लेती हैं अक्सर हुकूमतें,देखो अतीक मरकर धुरंधर में आ गए… हम मुसलमान सागौन की लकड़ी की तरह हैं—100 साल पड़े रहें, 100 साल खड़े रहें, 100 साल सड़ें, फिर भी काम आते हैं। हम मरकर भी काम आते हैं, लेकिन इल्जाम अक्सर हमारे ही सिर पर रखे जाते हैं। सवाल : उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी से साहित्य का अवार्ड दिया जाता था, जो 2022-23 से बंद है। क्या इसे उर्दू साहित्य का नुकसान मानते हैं? जवाब : ये खसारा (नुकसान) हमारा है, उनसे क्या लेना-देना। जिहालत की प्रकाष्ठा है। हम हिंदी में चले जाते हैं, वह उर्दू में नहीं आते। सवाल : हाल ही में कहा गया कि जिसे उर्दू बोलना हो, वह बंगाल से कहीं और चला जाए। इसे कैसे देखते हैं? जवाब : जो बंगाल की बात कर रहे थे, उन्हें न बंगला आती है, न उर्दू। अब वह हिंदी का ढोल पीट रहे हैं। हिंदी से हमें इन्कार नहीं है, हिंदी हमारी मां है। मगर उर्दू पर सख्ती करने वाले और उसका विरोध करने वाले पाकिस्तानी हैं। वो कट्टर पाकिस्तानी हैं जो हिंदुस्तान में उर्दू का विरोध करते हैं। पाकिस्तान तो चाहता ही है कि हम उर्दू को छोड़ें और वह अपना ले। चीन हमारी जमीन अपनाते जा रहा है और पाकिस्तान वाले उर्दू। हम किसी से नहीं लड़ पा रहे हैं। बस मुंह से लड़ रहे हैं। क्या डोनाल्ड ट्रंप ने जो कहा, उस पर खून नहीं खौलना चाहिए। सवाल : इससे पहले राहत इंदौरी के ऊपर बैन लगा था। लाल किले के मुशायरे में शामिल नहीं हो सकते और भी कई साहित्यकारों पर सवाल खड़े हुए कैसे देखते हैं ? जवाब : राहत इंदौरी क्या तमाम शायरों और कॉमेडियंस पर पाबंदी लगी। नए लड़कों पर मुकदमे हो रहे हैं। पाबंदी हर दौर में लगती रही है मगर अब तो गला भी दबाते हैं और कहते हैं कि आंख न निकले। यह हमेशा से होता रहा है और होता रहेगा। बशीर बद्र का शेर है…'मुखालिफत से मिरी शख्सियत संवरती है, मैं दुश्मनों का बड़ा एहतिराम करता हूं।' उनका काम है कहना, वह कहते रहे। हमारा जो काम है, वह हम करते रहेंगे। इनके कहने से हम कलम से नारा नहीं डालेंगे, उसको कागज पर ही उतारेंगे। इन्हें नहीं पता होगा कि किस चीज से क्या काम लिया जाता है। हमें पता है और हम वही कर रहे हैं। सवाल : आपकी शायरी पर सवाल खड़े होते हैं तो चर्चा तेज हो जाती है। कानून की पकड़ मजबूत होने का डर हो, तब यह नहीं लगता कि कुछ हल्का लिखना चाहिए? जवाब: नहीं, हमने कभी ऐसा नहीं सोचा। जब हुकूमत पीछे पड़ जाती है, तो मौलवी को आतंकवादी बना देती है और शंकराचार्य को विलेन बना देती है। मगर जितनी जिंदगी लिखी है, उतना ही जीएंगे। मेरे पिता मुनव्वर राणा के जाने के बाद अब कोई खौफ नहीं रहा। जैसे हम यहां रह रहे हैं, वैसे ही जेल में भी रह लेंगे। मगर जो सच है, वही लिखेंगे। सवाल: मौजूदा समय में उत्तर प्रदेश या भारत में मुस्लिम समुदाय और उर्दू को लेकर क्या कहेंगे, माहौल को कैसे देखते हैं ? जवाब: मुसलमान की जिंदगी इस समय बहुत दुश्वार है, इसीलिए हम कहते हैं कि जीने की ख्वाहिश नहीं रही। ‘जीने से यूं तो अच्छा है मर जाना चाहिए, दस्तार के साथ में ही कर जाना चाहिए’। मौत इज्जत की आनी चाहिए, शान से जियो और उसी तरीके से मर जाओ। आजकल कहा जाता है कि डबल इंजन की सरकार है। इंजन बढ़ते जा रहे हैं मगर टीटीई नफरती बैठा है। वह ट्रेन कभी सही ट्रैक पर नहीं चल सकती, जिस पर टीटीई नफरती हो।
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