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    कानपुर में मिडिल ईस्ट युद्द का असर:चेयरमैन बोले- 2000 फैक्ट्रियां बंदी की कगार पर, कच्चा माल महंगा होने से बढ़ी मुश्किलें

    3 hours ago

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    मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध का असर कानपुर के उद्योगों पर व्यापक रूप से पड़ता दिखाई दे रहा है। उत्पादन से जुड़े सभी क्षेत्रों के उद्यमियों की चिंताएं बढ़ गई हैं। कानपुर में उत्पादन करने वाले उद्योगपतियों का कहना है कि अगर 20 दिन तक इसी तरह ईरान, इज़रायल और अमेरिका के बीच तनाव बना रहा, तो बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। कच्चा माल महंगा होने के चलते उत्पादन में 50 प्रतिशत तक गिरावट देखने को मिल रही है, क्योंकि बढ़ी हुई कीमतों के कारण लागत तक नहीं निकल पा रही है। यही वजह है कि कई फैक्ट्री मालिकों ने काम बंद कर दिया है। चेयरमैन बोले- 2000 फैक्ट्रियां बंदी की कगार पर कानपुर इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट को-ऑपरेटिव एस्टेट लिमिटेड के चेयरमैन विजय कपूर का कहना है कि हालात कोरोना काल से भी ज्यादा खराब हो सकते हैं। सरकार को इस पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। शहर में करीब 2500 फैक्ट्रियां हैं, जिनमें से 2000 फैक्ट्रियां बंदी की कगार पर पहुंच गई हैं। कच्चे माल की कीमतें 50 से 80 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं, जिससे फैक्ट्री मालिक मजदूरों को काम नहीं दे पा रहे हैं। कालाबाजारी पर हो सख्त कार्रवाई उद्यमियों का कहना है कि आपदा में अवसर तलाशने वालों के खिलाफ सरकार को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। बाजार में जमकर कालाबाजारी हो रही है। प्लास्टिक उद्योग से जुड़े लोगों की स्थिति बेहद खराब है। जो प्लास्टिक का दाना पहले 100 रुपये में मिलता था, वही अब 180 रुपये तक पहुंच गया है। यानी कीमत में करीब 80 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जिससे साफ है कि जमाखोरी और कालाबाजारी हो रही है। सरकार से अपील की गई है कि ऐसे जमाखोरों पर पुराने कानून के तहत कार्रवाई की जाए, ताकि उन्हें आसानी से जमानत न मिल सके। जिन व्यापारियों ने पहले सस्ता माल खरीद लिया था, वही अब उसे महंगे दामों पर फैक्ट्री मालिकों को बेच रहे हैं। काम न होने की वजह से मजदूर गांव जा रहे हैं मजदूरों की स्थिति भी बेहद दयनीय हो गई है। काम न मिलने की वजह से मजदूर गांवों की ओर पलायन कर रहे हैं। उन्हें गैस सिलेंडर तक नहीं मिल पा रहा है। करीब 80 प्रतिशत मजदूरों के पास काम नहीं है। अगर महीने में सिर्फ 8 दिन ही काम मिलेगा, तो उनके लिए दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो जाएगा। इंडस्ट्रियल एरिया में बड़े उत्पादन से जुड़े अलग-अलग उद्योगों के मालिकों ने भी अपनी चिंता जाहिर की है। उनका कहना है कि कच्चे माल की बढ़ती कीमतों ने उत्पादन पर सीधा असर डाला है और हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। यूपी प्लास्टिक मैन्युफैक्चर वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष हरीश ईसरानी ने कहा कि युद्ध शुरू होने के बाद से प्लास्टिक के दानों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। करीब 80 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो चुकी है, जिसके कारण रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक की चीजें महंगी हो गई हैं। होज़री कारोबारी नरूला ने बताया कि युद्ध का असर कपास पर नहीं पड़ना चाहिए, क्योंकि कपास भारत में ही पैदा होती है। इसके बावजूद कीमतों में बढ़ोतरी हो रही है, जो समझ से परे है। इस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इसका तेल, डीजल या गैस से सीधा संबंध भी नहीं है। टेक्नोफार्म कंपनी के मालिक अरुण भाटिया, जो अज़ूबी टैबलेट और पैरासिटामोल बनाते हैं, ने बताया कि जो कच्चा माल पहले 270 रुपये में मिलता था, वह अब 470 रुपये में भी नहीं मिल रहा है। जबकि भारत में इसके सिर्फ 5 निर्माता हैं, ऐसे में कीमतों का इस तरह बढ़ना चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि सरकार को ऐसे मामलों की जांच करानी चाहिए कि जब माल देश में ही बन रहा है, तो महंगा क्यों हो रहा है। उद्योगपतियों का कहना है कि अगर इसी तरह कीमतें बढ़ती रहीं, तो मैन्युफैक्चरिंग पूरी तरह ठप हो सकती है और बाजार में भारी किल्लत पैदा हो जाएगी। इसलिए सरकार को जमाखोरी और कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ सख्त जांच और कार्रवाई करनी चाहिए।
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