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    लखनऊ में अंतरराष्ट्रीय कृषि सम्मेलन की शुरुआत:खाद्य सुरक्षा और क्लाइमेट रेजिलिएंट खेती पर मंथन

    17 hours ago

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    भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है, और उत्तर प्रदेश इसकी उपजाऊ जमीन के कारण खेती का मजबूत केंद्र माना जाता है। बावजूद इसके, किसानों के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं। कहीं सिंचाई की कमी, कहीं भंडारण की समस्या, तो कहीं अच्छी पैदावार के बावजूद सही कीमत नहीं मिल पाना। इन्हीं मुद्दों के समाधान की तलाश में लखनऊ के एमिटी विश्वविद्यालय में चार दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की शुरुआत हुई। मुख्य अतिथि उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने सम्मेलन का शुभारंभ करते हुए कहा कि खेती में उत्पादन बढ़ाने के साथ उसकी गुणवत्ता सुधारना भी जरूरी है, ताकि भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार में अपनी पहचान बना सकें। उन्होंने कहा कि सरकार किसानों को मजबूत बनाने और उनकी आय बढ़ाने के लिए लगातार काम कर रही है। यह सम्मेलन 'पैथोजेन्स, प्लांट हेल्थ एंड फूड सिक्योरिटी: क्लाइमेट रेजिलिएंट एग्रीकल्चर एंड लैंडस्केप कंजर्वेशन' विषय पर आयोजित किया जा रहा है, जिसमें दुनिया भर के वैज्ञानिक शामिल होकर खाद्य सुरक्षा और सतत कृषि पर विचार साझा कर रहे हैं। सम्मेलन भारत को कृषि क्षेत्र में और मजबूत बनाएंगे कार्यक्रम में अशोक के. चौहान ने कहा कि किसान परिवार से जुड़े होने के कारण वे खेती की चुनौतियों को समझते हैं। उन्होंने भरोसा जताया कि इस तरह के सम्मेलन भारत को कृषि क्षेत्र में और मजबूत बनाएंगे। वहीं असीम चौहान ने ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों के इस्तेमाल को खेती के भविष्य के लिए जरूरी बताया। पारंपरिक खेती के साथ नई तकनीकों और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाया जाए विशेषज्ञों ने जलवायु परिवर्तन, बढ़ते रोग और कीटों के खतरे को खेती के लिए बड़ा संकट बताया। वैज्ञानिकों ने कहा कि अब समय आ गया है कि पारंपरिक खेती के साथ नई तकनीकों और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाया जाए। रासायनिक खादों पर अधिक निर्भरता को भी कम करने की सलाह दी गई। सम्मेलन में यह भी सामने आया कि केवल उत्पादन बढ़ाना ही काफी नहीं, बल्कि खाद्य गुणवत्ता और पोषण सुरक्षा पर भी ध्यान देना होगा। बिहार जैसे राज्यों के मखाना, आम और लीची जैसे उत्पादों का उदाहरण देते हुए विशेषज्ञों ने कहा कि भारत के पास वैश्विक बाजार में बड़ी संभावनाएं हैं।
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