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    'मुसलमान नहीं गा सकता वंदे मातरम्':सहारनपुर में मौलाना मदनी बोले- जबरन थोपना संविधान के खिलाफ, ये देशभक्ति नहीं राजनीति

    9 hours ago

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    वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में अनिवार्य करने पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने एतराज जताया। सहारनपुर में संगठन के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा- मुसलमान किसी को भी वंदे मातरम् गाने या बजाने से नहीं रोकते, लेकिन इसके कुछ छंद मातृभूमि को एक देवता के रूप में दिखाते हैं। हम मुसलमान इस गीत को इसलिए नहीं गा सकते क्योंकि हम केवल एक अल्लाह की इबादत करते हैं। अपनी इस इबादत में किसी और को शामिल नहीं कर सकते। ये हमारे मान्यताओं के खिलाफ है। इसलिए वंदे मातरम् को अनिवार्य करना संविधान की आत्मा, धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर खुला हमला है। X पर पोस्ट कर उन्होंने कहा- एक मुसलमान सिर्फ एक अल्लाह की पूजा करता है। इसलिए उसे यह गाना गाने के लिए मजबूर करना संविधान के आर्टिकल 25 और सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का साफ उल्लंघन है। इस गाने को जरूरी बनाना और इसे नागरिकों पर थोपने की कोशिश देशभक्ति का इजहार नहीं है, बल्कि यह चुनावी राजनीति, एक सांप्रदायिक एजेंडा और बुनियादी मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश है। दरअसल, केंद्र सरकार ने गुरुवार को एक आदेश जारी कर राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को राष्ट्रगान जन गण मन की तरह ही सम्मान देना अनिवार्य कर दिया है। आदेश के मुताबिक राष्ट्रगीत के सभी 6 अंतरे गाए जाएंगे, जिनकी कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकेंड है। अब तक मूल गीत के पहले दो अंतरे ही गाए जाते थे। पढ़िए मौलाना मदनी के बयान की बड़ी बातें… देश के लिए प्यार का असली पैमाना कुर्बानी में देश के लिए प्यार का असली पैमाना नारों में नहीं, बल्कि किरदार और कुर्बानी में है। इसकी शानदार मिसालें मुसलमानों और जमीयत उलेमा-ए-हिंद के ऐतिहासिक संघर्ष में खास तौर पर देखी जा सकती हैं। ऐसे फैसले देश की शांति, एकता और डेमोक्रेटिक मूल्यों को कमजोर करते हैं और संविधान की भावना को कमजोर करते हैं। डेमोक्रेटिक उसूलों पर साफ हमला वंदे मातरम् को जरूरी बनाना संविधान, धार्मिक आजादी और डेमोक्रेटिक उसूलों पर साफ हमला है। उन्होंने गीत के एक अंतरे में देश को दुर्गा माता के रूप में संबोधित कर उपासना के शब्दों का प्रयोग किया गया है, जो मुस्लिम धार्मिक विश्वास के विरुद्ध है। पढ़िए मौलाना मदनी का X पोस्ट… मुसलमानों को देश प्रेम के प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं सुप्रीम कोर्ट भी यह स्पष्ट कर चुका है कि किसी नागरिक को राष्ट्रगान या किसी भी गीत को गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, अगर वह उसके धार्मिक विश्वासों के विरुद्ध हो। देश प्रेम और पूजा दो अलग बातें हैं। मुसलमानों को इस देश से कितनी मोहब्बत है, इसके लिए उन्हें किसी के प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है। आजादी में मुसलमानों और जमीयत की भूमिका देश के विभाजन का विरोध करने में जमीयत के बुजुर्गों की अहम भूमिका रही है। आजादी के बाद भी देश की एकता और अखंडता के लिए उनके प्रयासों को भुलाया नहीं जा सकता। मौजूदा सरकार जब भी किसी मुद्दे पर घिरती है तो जानबूझकर ऐसा विवाद खड़ा करती है, जिससे जनता का ध्यान महंगाई, बेरोजगारी और अन्य मूल समस्याओं से हटाया जा सके। यह देशभक्ति नहीं, बल्कि सत्ता बनाए रखने की राजनीति है। यह देश को बांटने वाली सोच है। सिर्फ 2 अंतरे गाने का निर्णय लिया गया था मौलाना मदनी ने ऐतिहासिक रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा- 26 अक्टूबर 1937 को रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर सलाह दी थी कि वंदे मातरम् के केवल प्रारंभिक दो बंदों (अंतरे) को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया जाए। क्योंकि शेष पंक्तियां एकेश्वरवादी धर्मों की मान्यताओं से टकराती हैं। इसके बाद 19 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने निर्णय लिया था कि केवल दो बंदों को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया जाए। संसद में हुई चर्चा में भी इसी दृष्टिकोण को दोहराया गया था, लेकिन अब पूरे गीत को अनिवार्य करने की कोशिश की जा रही है। वंदे मातरम् बजने पर हर व्यक्ति को खड़ा होना होगा केंद्र सरकार ने राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर नए दिशानिर्देश जारी किए हैं। गृह मंत्रालय ने आदेश में कहा है कि अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों या अन्य औपचारिक आयोजनों में ‘वंदे मातरम्’ बजाया जाएगा। इस दौरान हर व्यक्ति का खड़ा होना अनिवार्य होगा। यह आदेश 28 जनवरी को जारी हुआ, लेकिन मीडिया में इसकी जानकारी 11 फरवरी को आई। न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, आदेश में साफ लिखा है कि अगर राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ साथ में गाए या बजाए जाएं, तो पहले वंदे मातरम गाया जाएगा। इस दौरान गाने या सुनने वालों को सावधान मुद्रा में खड़ा रहना होगा। हालांकि, आदेश में यह भी कहा गया है किन-किन मौकों पर राष्ट्रगीत गाया जा सकता है, इसकी पूरी लिस्ट देना संभव नहीं है। यह पहली बार है जब राष्ट्रगीत के गायन को लेकर डिटेल में प्रोटोकॉल जारी किए गए हैं। केंद्र इस समय वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में कार्यक्रम मना रहा है। राष्ट्रपति के आगमन और झंडारोहण जैसे कार्यक्रमों में गाया जाएगा नई गाइडलाइन के अनुसार, तिरंगा फहराने, किसी कार्यक्रमों में राष्ट्रपति के आगमन, राष्ट्र के नाम उनके भाषणों और संबोधनों से पहले और बाद में, और राज्यपालों के आगमन और भाषणों से पहले और बाद में सहित कई आधिकारिक अवसरों पर वंदे मातरम् बजाना अनिवार्य होगा। मंत्रियों या अन्य महत्वपूर्ण व्यक्तियों की मौजूदगी वाले गैर-औपचारिक लेकिन जरूरी कार्यक्रमों में भी राष्ट्रगीत सामूहिक रूप से गाया जा सकता है। बशर्ते इसे पूरा सम्मान और शिष्टाचार के साथ पेश किया जाए। 10 पेजों के आदेश में, सिविलियन पुरस्कार समारोहों, जैसे कि पद्म पुरस्कार समारोह या ऐसे किसी भी कार्यक्रम में जहां राष्ट्रपति उपस्थित हों, वहां भी वन्दे मातरम बजाया जाएगा। गणतंत्र दिवस परेड में वंदे मातरम की झांकी निकली थी दिल्ली में कर्तव्य पथ पर मुख्य परेड में इस साल 77वें गणतंत्र दिवस पर मुख्य परेड की थीम वंदे मातरम् रखी गई थी। परेड में संस्कृति मंत्रालय ने वंदे मातरम् के 150 साल पूरे होने का जश्न मनाने वाली झांकी निकाली थी। इस झांकी को मंत्रालयों और विभागों की कैटेगरी में बेस्ट झांकी का अवॉर्ड मिला। संस्कृति मंत्रालय की 'वंदे मातरम: एक राष्ट्र की आत्मा की पुकार' थीम पर आधारित झांकी में बंकिम चंद्र चटर्जी के गीत की रचना, एक प्रसिद्ध मराठी गायक द्वारा औपनिवेशिक काल की रिकॉर्डिंग और Gen Z का प्रतिनिधित्व करने वाले एक समूह द्वारा इसका गायन दिखाया गया था। झांकी के आगे के भाग में वंदे मातरम की पांडुलिपि बनाते हुए दिखाया गया था। इसके निचले हिस्से में एक पैनल पर चटर्जी की एक छवि दिखाई गई थी। मध्य भाग में पारंपरिक वेशभूषा में कलाकारों का एक समूह था जिसने भारत की लोक विविधता को दर्शाया। 26 जनवरी 2026 को दिल्ली के कर्तव्य पथ पर आयोजित 77वें गणतंत्र दिवस परेड के दौरान संस्कृति मंत्रालय की झांकी की तस्वीर। ------------------------------ ये भी पढ़ें: 'जज साहब, मुझे पति का साथ चाहिए':कोर्ट में फूट-फूटकर रोईं ज्योति सिंह, कहा-पवन सिंह साथ नहीं रहना चाहते तो मेंटेनेंस में 10 करोड़ दें “जज साहब, मेरी शादी को सात साल हो चुके हैं, लेकिन आज तक न तो मुझे पति का प्यार मिला और न ही मेरे भरण-पोषण का खर्च मिला है। मैं पवन सिंह के साथ रहना चाहती हूं। मेरे दर्द को नजरअंदाज किया जा रहा है। अगर वह साथ नहीं रहना चाहते हैं, तो मुझे 10 करोड़ रुपए मेंटेनेंस दिया जाए।” भोजपुरी स्टार पवन सिंह की पत्नी ज्योति सिंह ने आरा सिविल कोर्ट स्थित कुटुंब न्यायालय में ये बातें कहीं। ये जानकारी खुद ज्योति सिंह के वकील विष्णुधर पांडेय ने भास्कर से बातचीत में दी। (पढ़ें पूरी खबर)
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