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    नेतन्याहू पिछले 8 चुनावों में इस बार सबसे कमजोर:उनकी पार्टी को सिर्फ 27 सीटें मिलीं, फिर भी सरकार बना लेने के आसार

    5 hours ago

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    इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी लिकुड को 2026 के चुनाव में 27 सीटें मिली हैं। पिछले 8 चुनावों में यह उनकी पार्टी का सबसे कमजोर प्रदर्शन है। इससे पहले लिकुड को 2009 में 27 सीटें मिली थीं। इजराइल की संसद नेसेट में कुल 120 सीटें हैं। नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं। सरकार बनाने के लिए 61 सांसदों का समर्थन चाहिए। उनकी पार्टी बहुमत से 34 सीटें पीछे है, लेकिन सत्ता में उनकी वापसी के आसार हैं। इसकी वजह विपक्षी दलों के बीच मतभेद और सरकार बनाने के लिए जरूरी समर्थन जुटाने की संभावनाएं हैं। नेतन्याहू के पास सरकार बनाने के तीन रास्ते पहला रास्ता: विपक्षी दलों के सांसदों का समर्थन नेतन्याहू विपक्षी खेमे में शामिल कुछ दलों या सांसदों को अपने साथ लाने की कोशिश कर सकते हैं। विपक्ष के पास कुल 48 सीटें हैं। अगर उसके कुछ सहयोगी नेतन्याहू का समर्थन करने को तैयार हो जाते हैं, तो उनके लिए 61 सीटों का आंकड़ा हासिल करना संभव हो सकता है। चुनौती- इस रास्ते में सबसे बड़ी चुनौती विपक्षी नेताओं का विरोध है। उन्होंने चुनाव में नेतन्याहू को सत्ता से हटाने का वादा किया था। ऐसे में उनके लिए नेतन्याहू के साथ जाना राजनीतिक रूप से मुश्किल होगा। दूसरा रास्ता: राष्ट्रीय एकता सरकार नेतन्याहू विपक्षी नेता गादी आइजनकोट और उनके सहयोगियों के साथ मिलकर राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसी सरकार में अलग-अलग विचारधारा वाली पार्टियां शामिल हो सकती हैं। चुनौती- नेतन्याहू के कुछ सहयोगियों ने भी इस विकल्प पर चर्चा की है। इससे उन्हें प्रधानमंत्री पद पर बने रहने का मौका मिल सकता है। हालांकि, आइजनकोट नेतन्याहू के नेतृत्व का विरोध कर चुके हैं। इसलिए इस प्रस्ताव पर सहमति बनना आसान नहीं होगा। तीसरा रास्ता: अल्पमत सरकार नेतन्याहू अल्पमत सरकार बनाने की कोशिश भी कर सकते हैं। ऐसी सरकार के पास अपने गठबंधन में 61 सांसद नहीं होते, लेकिन उसे संसद में दूसरे दलों का समर्थन या कुछ मामलों में उनका विरोध नहीं मिलने की जरूरत होती है। चुनौती- अल्पमत सरकार को बजट, विश्वास मत और दूसरे अहम फैसलों पर समर्थन जुटाना पड़ता है। इसलिए ऐसी सरकार बन भी जाए, तो उसे लंबे समय तक चलाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। विपक्ष के पास 48 सीटें, बहुमत के लिए 13 और चाहिए पूर्व सैना प्रमुख गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे को 48 सीटें मिली हैं। सरकार बनाने के लिए उसे 13 और सांसदों के समर्थन की जरूरत है। विपक्ष का मुख्य लक्ष्य नेतन्याहू को सत्ता से हटाना रहा है, लेकिन उसके सामने भी गठबंधन को एकजुट रखने की चुनौती है। उसके सहयोगियों के बीच अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने को लेकर मतभेद हैं। आइजनकोट ने ऐसी सरकार बनाने की बात कही है जो यहूदी हो और सभी नागरिकों के लिए सैन्य सेवा अनिवार्य करने का समर्थन करे। इस रुख से अरब पार्टियों और अति-रूढ़िवादी यहूदी दलों के साथ समझौता करना मुश्किल हो सकता है। अगर विपक्ष अपने सहयोगियों के बीच सहमति नहीं बना पाता, तो नेतन्याहू को सरकार बनाने के लिए जरूरी समर्थन जुटाने का मौका मिल सकता है। अरब पार्टियों की 19 सीटें क्यों अहम इजराइल की अरब पार्टियों को चुनाव में कुल 19 सीटें मिलने का अनुमान है। इनमें जॉइंट लिस्ट को 11 और यूनाइटेड अरब लिस्ट यानी राअम को 8 सीटें मिली हैं। इन पार्टियों का समर्थन विपक्ष को बहुमत तक पहुंचने में मदद कर सकता है। विपक्ष की 48 सीटों में अगर राअम की सभी 7 सीटें जुड़ जाएं, तो संख्या 55 होगी। बहुमत के लिए तब भी 6 और सीटों की जरूरत पड़ेगी। अगर जॉइंट लिस्ट और राअम दोनों का समर्थन मिल जाए, तो विपक्षी खेमे की संख्या 67 तक पहुंच सकती है। लेकिन यह तभी संभव होगा, जब दोनों अरब पार्टियां समर्थन देने को तैयार हों और विपक्ष के दूसरे सहयोगी भी इस व्यवस्था पर सहमत हों। अरब पार्टियों ने नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के लिए दूसरी पार्टियों के साथ काम करने की इच्छा जताई है। लेकिन विपक्ष के कुछ सहयोगी अरब पार्टियों के साथ गठबंधन का विरोध करते रहे हैं। इसलिए उनका समर्थन हासिल करना सिर्फ सीटों का गणित नहीं, बल्कि राजनीतिक सहमति का मामला भी है। नेतन्याहू को पद छोड़ना होगा या वे कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहेंगे चुनाव में किसी भी खेमे को बहुमत नहीं मिलने का मतलब यह नहीं है कि नेतन्याहू को तुरंत प्रधानमंत्री पद छोड़ना होगा। नई सरकार बनने तक वह कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में काम कर सकते हैं। इजराइल के राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग चुनाव के बाद राजनीतिक दलों से बातचीत करेंगे। इसके बाद वह उस नेता को सरकार बनाने का पहला मौका देंगे हैं, जिसके पास बहुमत जुटाने की सबसे बेहतर संभावना होगी। सरकार बनाने के लिए नेता को शुरुआत में 28 दिन मिलते हैं। जरूरत पड़ने पर राष्ट्रपति 14 दिन का अतिरिक्त समय दे सकते हैं। यानी सरकार बनाने की कोशिश के लिए कुल 42 दिन तक मिल सकते हैं। इस दौरान पार्टियों के बीच गठबंधन, मंत्रिपदों और नीतियों को लेकर बातचीत होती है। अगर कोई भी नेता बहुमत जुटाने में नाकाम रहता है, तो दोबारा चुनाव कराने की नौबत भी आ सकती है। नेतन्याहू के लिए चुनाव क्यों अहम था नेतन्याहू ने लंबे समय से अपनी राजनीति को मजबूत नेतृत्व और राष्ट्रीय सुरक्षा के वादे पर आगे बढ़ाया है। लेकिन 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इजराइल की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे। इसके बाद गाजा में लंबा युद्ध चला और ईरान के साथ जंग ने भी क्षेत्रीय तनाव बढ़ाया। विपक्ष ने चुनाव में नेतन्याहू के नेतृत्व और सुरक्षा नीति को निशाना बनाया। वहीं, सेना में भर्ती को लेकर विवाद और न्यायपालिका की शक्तियों में बदलाव की कोशिश भी इजराइल की राजनीति में बड़े मुद्दे रहे हैं। इन मुद्दों का चुनावी नतीजों पर कितना असर पड़ा, यह केवल सीटों के आंकड़ों से तय नहीं किया जा सकता। लेकिन लिकुड को 2022 के मुकाबले 5 सीटों का नुकसान हुआ है और नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत से दूर है। क्या नेतन्याहू फिर प्रधानमंत्री बन पाएंगे नेतन्याहू की पार्टी को बहुमत नहीं मिला है, लेकिन उनका पूरा गठबंधन सरकार बनाने की दौड़ में है। विपक्ष को भी बहुमत के लिए दूसरे दलों का समर्थन चाहिए। अरब पार्टियों की 19 सीटें सरकार गठन के गणित में अहम हैं, लेकिन विपक्षी खेमे में उनके साथ गठबंधन को लेकर मतभेद हैं। यही नेतन्याहू के लिए सबसे बड़ा अवसर हो सकता है। आखिरकार, सरकार कौन बनाएगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-सा नेता 61 सांसदों का समर्थन जुटा पाता है। नेतन्याहू के लिए चुनाव आसान नहीं रहा, लेकिन उनकी सत्ता में वापसी की संभावना अभी खत्म नहीं हुई है। -------------------- ये खबर भी पढ़ें… इजराइल चुनाव- सरकार बनाने की कोशिशों में जुटे आइजनकोट:तीन विपक्षी नेताओं से मुलाकात की; बोले- नेतन्याहू चुनाव को बदनाम कर रहे इजराइल में चुनाव के बाद विपक्षी नेता गादी आइजनकोट सरकार बनाने की कोशिशों में जुट गए हैं। आइजनकोट ने डेमोक्रेट्स पार्टी के प्रमुख यायर गोलान, बियाचाद के प्रमुख नफ्ताली बेनेट और विपक्षी नेता यायर लैपिड से मुलाकात की है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
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