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    Prabhasakshi NewsRoom: Donald Trump की लोकप्रियता धड़ाम! 32% पर पहुंची Approval Rating, अमेरिकी जनता का भरोसा टूटा

    1 hour ago

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    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति जिस आत्मविश्वास के साथ दुनिया को अपनी शर्तों पर चलाने निकली थी, उसी राजनीति को अब अमेरिकी जनता के बीच जबरदस्त झटका लगता दिखाई दे रहा है। हम आपको बता दें कि रॉयटर्स-इप्सोस के ताजा सर्वे में ट्रंप की स्वीकृति दर गिरकर महज 32 प्रतिशत रह गई है, जो उनके पूरे राजनीतिक जीवन का सबसे निचला स्तर है। एक सप्ताह पहले यही आंकड़ा 35 प्रतिशत था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह गिरावट केवल विपक्षी डेमोक्रेट मतदाताओं के बीच नहीं है, बल्कि ट्रंप के अपने रिपब्लिकन आधार में भी असंतोष बढ़ रहा है। रिपब्लिकन समर्थकों के बीच उनकी स्वीकृति 82 प्रतिशत से गिरकर 73 प्रतिशत रह गई है।यानी जिस नेता ने सत्ता में लौटते समय महंगाई पर लगाम लगाने और दुनिया के युद्ध खत्म करने का वादा किया था, आज उसी के शासन में अमेरिकी मतदाता महंगाई, ईंधन की कीमतों और ईरान युद्ध को लेकर सवाल खड़े कर रहे हैं। ट्रंप के लिए सबसे बड़ा झटका यह है कि जीवन-यापन की लागत जैसे सीधे घरेलू मुद्दे पर महज 17 प्रतिशत अमेरिकी उनके प्रदर्शन को मंजूरी देते हैं। यह उस राष्ट्रपति के लिए बेहद गंभीर संकेत है जिसने आर्थिक असंतोष को अपनी राजनीतिक वापसी का बड़ा हथियार बनाया था।इसे भी पढ़ें: Saudi Arabia की अपील के बाद भी Donald Trump ने बदला फैसला, Yemen में Houthi पर हमला टालासबसे गंभीर सवाल ईरान युद्ध को लेकर है। ट्रंप ने फरवरी में ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू करते हुए दावा किया था कि यह संघर्ष कुछ ही सप्ताह में समाप्त हो जाएगा। लेकिन महीनों बाद भी युद्ध खत्म होने के संकेत नहीं हैं। सर्वे के मुताबिक केवल 34 प्रतिशत अमेरिकी ईरान पर हमलों का समर्थन करते हैं, जबकि 82 प्रतिशत लोगों को लगता है कि यह संघर्ष लंबे समय तक चल सकता है। देखा जाये तो युद्ध का असर केवल रणभूमि तक सीमित नहीं है। तेल और ईंधन बाजार में व्यवधान ने अमेरिका सहित दुनिया के कई हिस्सों में महंगाई और ऊर्जा संकट का दबाव बढ़ाया है।यही वह बड़ा कारण है जहां ट्रंप की “अमेरिका पहले” नीति का उलटा असर दिखाई देने लगता है। सवाल उठ रहा है कि युद्ध अगर अमेरिका के हित में है तो उसकी आर्थिक कीमत अमेरिकी उपभोक्ता क्यों चुका रहा है? ईंधन महंगा हो, परिवहन महंगा हो, खेती और उद्योग की लागत बढ़े और फिर उसका बोझ आम आदमी की जेब पर पड़े, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह नीति किसके लिए है? यह भी बताया जा रहा है कि अमेरिकी डीजल की कीमतों में पिछले एक वर्ष में भारी वृद्धि हुई है और परिवहन से लेकर कृषि तक इसका असर पहुंच रहा है।साथ ही ट्रंप की मुश्किल केवल अर्थव्यवस्था और युद्ध तक सीमित नहीं है। अपराध से निपटने के उनके तरीके को केवल 35 प्रतिशत लोग मंजूरी देते हैं, जबकि 50 प्रतिशत असहमति जताते हैं। आव्रजन के मुद्दे पर उनकी अपनी पार्टी में 79 प्रतिशत समर्थन जरूर है, लेकिन पूरे अमेरिकी मतदाताओं में केवल 36 प्रतिशत उनके दृष्टिकोण का समर्थन करते हैं और 55 प्रतिशत विरोध करते हैं। यानी ट्रंप का राजनीतिक आधार अभी भी कुछ मुद्दों पर मजबूती से उनके साथ है, लेकिन व्यापक अमेरिकी जनमत में तस्वीर काफी अलग दिखाई दे रही है।माना जा रहा है कि इस सबका असर नवंबर के मध्यावधि चुनावों पर भी पड़ सकता है। सर्वे में कांग्रेस के लिए मतदान की पसंद पूछे जाने पर डेमोक्रेट्स को 43 प्रतिशत और रिपब्लिकन को 35 प्रतिशत समर्थन मिला। यह आठ अंकों का अंतर इस वर्ष के ऐसे सर्वे में डेमोक्रेट्स की सबसे बड़ी बढ़त है। हालांकि यह आंकड़ा सीट-दर-सीट चुनावी परिणाम की भविष्यवाणी नहीं करता, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि ट्रंप की नीतियों को लेकर अमेरिकी मतदाताओं में असंतोष बढ़ा है।इसी बीच व्हाइट हाउस और मीडिया के बीच टकराव भी तेज हुआ है। ट्रंप प्रशासन ने हाल में तीन बड़े समाचार संस्थानों को व्हाइट हाउस से बाहर कर दिया। इसके अलावा कैनेडी सेंटर का नाम बदलने को लेकर भी ट्रंप ने टिप्पणी की। इन घटनाओं ने राष्ट्रपति और स्वतंत्र मीडिया के बीच पहले से मौजूद संघर्ष को और तीखा कर दिया है।लेकिन असली सवाल अमेरिका की सीमा से कहीं बड़ा है। ट्रंप की व्यापार, युद्ध, ऊर्जा और विदेश नीति का असर अब वैश्विक बाजारों और दूसरे देशों की अर्थव्यवस्थाओं तक पहुंच चुका है। तेल की आपूर्ति बाधित हो तो एशिया और यूरोप प्रभावित होते हैं, ईंधन महंगा हो तो परिवहन और खाद्य कीमतें बढ़ती हैं और व्यापारिक टकराव बढ़े तो पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था उसकी कीमत चुकाती है। इसलिए अमेरिका का यह सर्वे केवल अमेरिकी राष्ट्रपति की लोकप्रियता का आंकड़ा नहीं, बल्कि उनकी नीतियों के प्रति बढ़ते असंतोष का एक महत्वपूर्ण संकेत है।यहां एक राजनीतिक सवाल भी उठता है कि अगर अमेरिका के भीतर ही ट्रंप की लोकप्रियता 32 प्रतिशत तक पहुंच गई है, तो कल्पना कीजिए कि उनकी नीतियों से प्रभावित पूरी दुनिया के नागरिकों के बीच ऐसा ही सर्वे कराया जाए तो तस्वीर कितनी अलग दिखाई दे सकती है?हम आपको यह भी याद दिला दें कि इसी वर्ष की पिछली वैश्विक नेता स्वीकृति रैंकिंग यानि ग्लोबल लीडर अप्रूवल रेटिंग में तस्वीर बिल्कुल उलट थी। मॉर्निंग कंसल्ट के सर्वे में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 68 प्रतिशत स्वीकृति के साथ शीर्ष पर थे, जबकि डोनाल्ड ट्रंप 39 प्रतिशत के साथ शीर्ष दस में भी जगह नहीं बना सके थे।बहरहाल, जिस अमेरिकी राष्ट्रपति ने दुनिया को अपनी राजनीतिक और आर्थिक शर्तों पर चलाने का दावा किया था उस पर उसकी अपनी जनता का ही भरोसा खत्म होने की कगार पर पहुँच गया है। 32 प्रतिशत का यह आंकड़ा ट्रंप के लिए महज एक सर्वे नहीं, बल्कि उनकी नीतियों के सामने खड़ा होता जा रहा बड़ा राजनीतिक आईना भी है।
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