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    तानों को ठुकराकर बना कत्थक स्टार:काशी के आशीष कर रहे वृंदावन में परंपरा बचाने का प्रयास, उनके घुंघरुओं की झंकार देती है सुकून

    1 hour ago

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    वाराणसी के एक राजपूत परिवार में जन्मे आशीष सिंह बचपन से ही संगीत और नृत्य के प्रति आकर्षित थे। संगीत सुनते ही उनके कदम अपने आप थिरकने लगते थे। धीरे-धीरे उन्होंने नृत्य को ही अपना जीवन बना लिया और घुंघरू बांधकर कत्थक की राह पर चल पड़े। आज आशीष सिंह कत्थक के नामी कलाकार बन चुके हैं। करीब 11 साल की कड़ी मेहनत और निरंतर रियाज ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया है। उनकी प्रस्तुति की झंकार अब देश-विदेश में लोगों को सुकून देती है। आशीष 11 साल पहले काशी छोड़कर वृंदावन आ गए थे। यहां मीराबाई मंदिर में रहकर उन्होंने 2016 से लगातार अभ्यास किया। उन्होंने कभी मेहनत में कमी नहीं आने दी। विश्व नृत्य दिवस पर आशीष सिंह के बारे में जानेंगे। समाज के तानों को किया दरकिनार वाराणसी में जन्मे आशीष सिंह बचपन से ही संगीत की धुन पर थिरकने लगते थे। लेकिन इस शौक को लेकर उन्हें समाज के ताने और उपहास भी झेलने पड़े। लोगों की बातों ने उन्हें रोकने की बजाय और मजबूत बना दिया। आशीष ने सभी तानों को नजरअंदाज कर पैरों में घुंघरू बांधे और अभ्यास जारी रखा। उन्होंने नकारात्मक बातों को अपनी ताकत बना लिया। यही वजह है कि आज उनके घुंघरुओं की झंकार देश ही नहीं, विदेशों तक पहुंच रही है। प्राचीन परंपरा को कर रहे बचाने का प्रयास कत्थक में पारंगत आशीष का कहना है कि उनका उद्देश्य भारतीय शास्त्रीय नृत्य की परंपरा को आगे बढ़ाना है। वे मानते हैं कि अपनी कला का प्रचार-प्रसार अपने देश में ही होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारी परंपरा को हमारी नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है। विश्व नृत्य दिवस पर उन्होंने अपील की कि वरिष्ठ कलाकार युवाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें और उन्हें सही मार्गदर्शन दें, ताकि भारतीय संस्कृति और मजबूत हो सके। सरकार से की मांग आशीष सिंह ने विश्व नृत्य दिवस पर कहा कि सरकार कहती है पर वह उसे पूरी तरह साकार नहीं कर पाती। क्योंकि वह जान पहचान या जुगाड वालों के बीच तक सीमित रह जाती है। सही लोगों तक सरकार के प्रयास नहीं पहुंच पाते। जो प्रसिद्धि पा चुके हैं शासन प्रशासन से जुड़े लोग उन्हीं को मंच देते हैं। संबंधित विभागों में संपर्क करने पर कोई उचित जवाब नहीं दिया जाता।
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