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    9 साल जेल में बंद हत्या के आरोपी को जमानत:सुप्रीम कोर्ट बोला- घटना के समय किशोर था, आरोप लगा; केस में देरी उसकी गलती नहीं

    1 day ago

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    सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को 9 साल से जेल में बंद हत्या के आरोपी को जमानत दे दी। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल में असाधारण देरी ने हमारी न्यायिक अंतरात्मा को झकझोर दिया है। ऐसे मामलों की सुनवाई में तेजी लाना अदालतों की संवैधानिक जिम्मेदारी है। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की बेंच ने कहा, याचिकाकर्ता घटना के समय किशोर था। अब तक 9 साल बीते गए। इस स्पीड से ट्रायल पूरा होने में अभी और समय लगेगा। कोर्ट ने कहा- बिना ट्रायल में प्रगति के किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना, त्वरित सुनवाई (स्पीडी ट्रायल) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। त्वरित सुनवाई का अधिकार संविधान के आर्टिकल 21 से सीधे जुड़ा है और विशेष रूप से लंबे समय से हिरासत में बंद लोगों के मामलों में इसकी रक्षा की जानी चाहिए। कोर्ट के 2 बड़े कमेंट; कहा- बेल नियम है, जेल अपवाद आरोपी बोला- ट्रायल घोंघे की चाल से चल रहा आरोपी लियाकत अली की शिकायत थी कि ट्रायल 'घोंघे की चाल' से चल रहा है और इसमें उसकी कोई गलती नहीं है। हालांकि 2024 में उसकी जमानत याचिका पर अंतिम फैसला हो चुका था, लेकिन उसके बाद भी मुकदमे में कोई खास प्रगति नहीं हुई। अब तक अभियोजन पक्ष के 30 में से केवल 12 गवाहों की ही गवाही हो सकी है। सुप्रीम कोर्ट ने लियाकत अली की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि वह अनुच्छेद 32 के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर उसे जमानत दे रहा है। हालांकि, जमानत की शर्तें संबंधित ट्रायल कोर्ट तय करेगा। संविधान का आर्टिकल 21 क्या है संविधान का आर्टिकल 21 कहता है कि हर व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। आसान भाषा में समझें तो सरकार या पुलिस किसी व्यक्ति की जान या आजादी तब तक नहीं छीन सकती, जब तक कि कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन न किया जाए। आर्टिकल 21 के तहत सुप्रीम कोर्ट ने कई अधिकार शामिल किए हैं इस मामले में आर्टिकल 21 क्यों लागू हुआ? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 9 साल से अधिक समय तक ट्रायल पूरा न होना आरोपी के त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन है। इसलिए अदालत ने माना कि यह आर्टिकल 2 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हनन है और आरोपी को जमानत दी। ----------------------------- ये खबर भी पढ़ें… सुप्रीम कोर्ट बोला- गाली देना हर बार अश्लीलता नहीं होती: अभद्र भाषा और अश्लीलता अलग सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि गाली-गलौज या अभद्र भाषा का इस्तेमाल करना हमेशा अश्लीलता के दायरे में नहीं आता है। शुक्रवार को जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि कोई शब्द तभी अश्लील माना जाएगा, जब वह कामुकता को बढ़ावा देने वाला हो या लोगों को भ्रष्ट करने की प्रवृत्ति रखता हो। पूरी खबर पढ़ें…
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