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    अभिनेता अखिलेंद्र मिश्रा पहुंचे वाराणसी:बाबा विश्वनाथ-कालभैरव का किया दर्शन,बोले- काशी बदल रहा,मन को शांति मिली

    1 hour ago

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    प्रसिद्ध अभिनेता अखिलेंद्र मिश्रा काशी की आध्यात्मिक यात्रा पर पहुंचे, जहां उन्होंने करीब 48 घंटे बिताए। इस दौरान उन्होंने काशी के प्रमुख धार्मिक स्थलों में दर्शन-पूजन कर आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त की। अखिलेंद्र मिश्रा ने अपने प्रवास के दौरान सबसे पहले काशी विश्वनाथ मंदिर में भगवान शिव का विधिवत दर्शन और पूजा-अर्चना की। मंदिर परिसर में वे लगभग एक घंटे तक बैठे रहे और शिव स्तुति का पाठ किया। इसके बाद उन्होंने काल भैरव मंदिर में दर्शन कर काशी के कोतवाल कहे जाने वाले भगवान काल भैरव का आशीर्वाद लिया। अभिनेता ने मां कुष्मांडा मंदिर में भी श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना की। इस दौरान मंदिर परिसर में मौजूद श्रद्धालुओं और उनके प्रशंसकों में उत्साह देखने को मिला। कई फैंस ने उनके साथ तस्वीरें भी खिंचवाईं। अखिलेंद्र मिश्रा ने कहा कि वे काशी में विशेष रूप से आध्यात्मिक शांति की तलाश में आए थे। उन्होंने बताया, “यह यात्रा मेरे लिए बेहद खास रही। काशी आकर मन को अद्भुत शांति मिली है।” उन्होंने काशी के बदलते स्वरूप की भी सराहना की। अभिनेता ने कहा कि शहर में काफी सकारात्मक बदलाव हुए हैं और अब यहां श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं पहले से कहीं बेहतर हो गई हैं। पहले तीन तस्वीर देखे… एक्टिंग से जुड़ाव कैसे हुआ? अखिलेंद्र कहते हैं, 'एक्टिंग की शुरुआत तो बचपन से ही हो गई थी। हमारे गांव में दुर्गा पूजा के दौरान दो नाटक होते थे, एक हिंदी और दूसरा भोजपुरी में। छुट्टियों के दौरान हम सभी चचरे भाई-बहन वहां इकट्ठा होते थे। एक बार एक नाटक के लिए छोटे बच्चे की जरूरत थी, जिसमें मुझे कास्ट किया गया। मेरे लिए ये पल बहुत खुशी का था। उस वक्त गांव में लाइट नहीं थी। इस कारण हम सभी रात में लालटेन की रोशनी में नाटक की तैयारी करते थे। इस नाटक को करने के बाद एक्टिंग से ऐसा जुड़ा कि आज तक इससे खुद को अलग नहीं कर पाया।' बिग बी का बहुत बड़ा फैन रहा ‘जब तक छोटा था, तब तक घरवालों को मेरा नाटक करना रास आता था, लेकिन बड़े होने पर उन्हें ये चीज खटकने लगी। यहां तक कि सिनेमाघर में फिल्म देखने की छूट नहीं थी। सबसे छिप कर फिल्म देखने जाता था। उस वक्त सबसे ज्यादा अमिताभ बच्चन की दीवानगी सवार थी। नई फिल्म में वो जो कपड़े पहनते, वही सब आस-पास के लड़के पैसा इकट्ठे कर सिला लेते। फिर बारी-बारी से पहनकर अपनी इच्छा पूरी करते।’ बचपन के दिन कैसे रहे? उन्होंने कहा, 'मेरा जन्म बिहार के सिवान जिले के छोटे से गांव में हुआ था। हर बच्चे की तरह मेरा बचपन भी बहुत खूबसूरत बीता। हम कुल दस भाई-बहन थे। पिता जी केंद्र सरकार के कस्टम एक्साइज डिपार्टमेंट में कार्यरत थे। उनकी पोस्टिंग एक जगह से दूसरे जगह होती रहती थी। ऐसे में भाई-बहनों की पढ़ाई भी अलग-अलग स्कूल में हुई। जब पिता जी की पोस्टिंग महुआ में हुई तो मेरी उम्र स्कूल जाने की हो गई थी। एडमिशन के लिए उन्होंने जान-पहचान के लोगों से पता किया। उनमें से किसी ने गुरदेव जी के गुरुकुल के बारे में बताया। उनकी बात मान पिता जी ने एडमिशन वहीं करा दिया और इस तरह मैं गुरदेव के सानिध्य में आ गया। रोज सुबह मैं और कुछ बच्चे गुरुकुल पहुंच जाते। फिर झाड़ू-पोंछा लगाने के बाद हम गुरदेव को उठाते थे, क्योंकि उनको लकवा मार गया था। फिर उनका नित्य-क्रिया कराने के बाद हम सभी पढ़ने के लिए बैठ जाते। यहां पर मैं करीब चार-साढ़े चार साल तक पढ़ा। फिर पिता जी का तबादला हो गया। उस गुरुकुल में पढ़ने का प्रभाव इतना गहरा था कि इसके बाद मेरा सीधे एडमिशन 5वीं क्लास में हुआ। अंत में पूरा परिवार गोपालगंज आ गया। यहां पर मैंने छपरा जिला स्कूल से आगे की स्कूलिंग की। फिर ग्रेजुएशन (फिजिक्स, ऑनर्स) छपरा राजेंद्र कॉलेज से 1982 में पूरा किया।'
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