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    अजगर करे न चाकरी...कहावत कहने वाले संत की कहानी:खत्री परिवार में जन्म, व्यापार नहीं भक्तिमार्ग चुना; मथुरा में मनाई जा रही 452वीं जयंती समारोह

    3 hours ago

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    संघ प्रमुख मोहन भागवत और सीएम योगी आदित्यनाथ 7 अप्रैल को वृंदावन के वंशीवट स्थित मलूकपीठ में जगतगुरु मलूक दास के 452वीं जयंती समारोह में शामिल होंगे। भक्ति काल में जन्मे संत मलूक दास वैष्णव साधु परंपरा के प्रमुख संतों में से एक हैं। कड़ा में जन्मे (पहले प्रयागराज-इलाहाबाद में आता था…. अब कौशांबी में स्थित है) संत मलूक दास सामाजिक समानता, ईश्वर की आराधना और मानवता के समर्थक थे। 108 वर्ष तक जीवित रहे संत मलूक दास जी का गोलोक गमन वृंदावन में हुआ जहां आज भी उनकी समाधि बनी हुई है। एक समाधि उनके जन्मस्थान कड़ा में भी है। खत्री परिवार में जन्मे मलूक चंद कैसे संत बने…संत बनने की कहानी क्या है? पढ़िए… कारोबारी के परिवार में जन्मे मलूक चंद…बन गए संत मथुरा वृंदावन मलूक पीठ से जुड़े संत धनंजय दास ने बताया कि मलूक दास का बचपन का नाम मलूक चंद था। परिवार कपड़े के व्यापार से जुड़ा था, इसलिए उनसे भी यही अपेक्षा थी कि वे बड़े होकर व्यापार संभालें। एक दिन उनके पिता ने उन्हें कपड़े बेचने के लिए भेजा। प्रयाग में जब वह कपड़े बेचने गए तो…कथा सुनी-संतों के दर्शन हुए। भक्ति मार्ग जागृत हुआ। मन में विचार आया कि जब भगवान ही सबकुछ करने वाले हैं, तो मैं क्यों न भगवान का आश्रय लेकर रहूं। उन्होंने सारे कपड़े संतों को दान कर दिए और जंगल में जाकर पेड़ पर बैठ सीताराम का जाप करने लगे। पूरा दिन निकल गया कुछ नहीं मिला लेकिन जाप नहीं छोड़ा। इसी दौरान एक व्यक्ति झोला लेकर पहुंचा। देर रात होने के कारण झोला पेड़ पर टांग दिया। तभी कुछ डकैतों की आहट सुन वह झोला छोड़कर भाग गया। इसके बाद डकैत आए और झोला देखकर उसको खोला तो खाने-पीने का सामान था। इसी दौरान डकैतों के सरदार ने कहा कि इतने घने जंगल में यह कहां से आया कहीं इसमें जहर तो नहीं है। इसके बाद उसे रखने वाले की तलाश हुई। देखा पेड़ पर संत मलूक दास बैठे हैं। डकैतों ने उनको नीचे उतारा और जबरन उनको झोले में रखे लड्डू कचौड़ी खिलाने लगे। यह देख संत मलूक दास जी की आंखों में आंसू आ गए। उन्हें विश्वास हो गया कि ईश्वर ही सब कुछ हैं। इसी घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने महसूस किया कि संसार का मोह-माया क्षणिक है और सच्चा सुख सेवा, भक्ति और त्याग में है। धीरे-धीरे उन्होंने सांसारिक जीवन से दूरी बनाकर भक्ति का मार्ग अपना लिया। वे ईश्वर की भक्ति, सत्संग और जनसेवा में लग गए। उनकी वाणी में इतनी सादगी और सच्चाई थी कि लोग उनसे प्रभावित होकर उन्हें संत मानने लगे। ये दोहा हुआ प्रसिद्ध संत मलूक दास आलसी होने के बजाय ईश्वर पर विश्वास करने का संदेश देते थे। वह कहते थे कि अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए सबके दाता राम। इसका अर्थ था अजगर किसी की नौकरी न करे, पक्षी काम न करे लेकिन भगवान पर विश्वास हो तो सबका भला राम जी करते हैं। उन्होंने दीन दुखियों की सहायता को ही सच्ची भक्ति माना। वह कृष्ण भक्ति किया करते थे। वृंदावन को बनाया साधना स्थली संत मलूक दास जी का साहित्य में भी योगदान रहा। उनकी रत्न खान, मलूक शतक और ज्ञान बोध जैसी रचनाएं प्रमुख हैं। उन्होंने पंजाबी, उर्दू, ब्रज भाषा और खड़ी बोली में रचनाएं लिखीं। संत मलूक दास ने अपनी साधना स्थली वृंदावन को बनाया। जहां उन्होंने यमुना किनारे वंशीवट पर अपनी कुटिया बनाई। जो वर्तमान में मलूक पीठ के नाम से विख्यात है। संत मलूक दास का जन्म वैशाख की पंचमी को करीब 451 वर्ष पहले (1574) माना जाता है। वह 108 वर्ष तक जीवित रहे। इनकी समाधि मलूक पीठ में ही स्थापित है। निर्गुण सगुण भक्ति के अनुयायी संत मलूक दास जी का स्थान पहले मलूक अखाड़ा था जहां वह संतों के साथ रहते और भगवान कृष्ण की सेवा,भजन और कामों में लीन रहते थे। वर्तमान में मलूक पीठ का संचालन प्रसिद्ध संत देवाचार्य राजेंद्र दास महाराज करते हैं। यहां संत, गौ, बृजवासी सेवा अनवरत चलती है। संत मलूक दास जी को अवध के संत से शिक्षा प्राप्त हुई जिसके बाद उनको आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हुआ। वह स्वभाव से उदार और कोमल हृदय थे। प्रेमानंद महाराज भी हैं भक्त जगद्गुरु मलूकदास महाराज के भक्त प्रेमानंद महाराज भी हैं। बीते दिनों वह पहाड़ी बाबा गौशाला में आयोजित समारोह में शामिल हुए थे। यहां संत प्रेमानंद महाराज ने साधु संतों के दर्शन किए और भगवान सीताराम के स्वरूपों का पूजन अर्चन किया। संत प्रेमानंद महाराज यहां करीब एक घंटे तक रहे। कौशांबी में मौजूद है संत की गद्दी, साधना केंद्र दैनिक भास्कर कौशांबी स्थित मालूक दास के आश्रम भी पहुंचा। यहां कड़ा में आज भी संत मलूक दास की गद्दी, गुफा और साधना केंद्र मौजूद है। हमने मौजूदा समय में 15 वें उत्तराधिकारी के रूप देख रेख कर रहे महंत शिवा कांत पांडेय से बात की। महंत शिवा कांत पांडेय ने बताया कि उन्होंने औरंगजेब के सामने कुछ चमत्कार दिखाए थे, जिससे औरंगजेब भी उनका भक्त बन गया था। महंत शिवा कांत पांडेय ने बताया कि मालूक दास जी के पारिवारिक लोग लखनऊ, दिल्ली व महाराष्ट्र में रहते हैं बीच-बीच में वो कभी कदार आकर आश्रम में देख रेख करते हैं। हर साल मालूक दास की जयंती पर उनके परिवार से जुड़े‌ लोग आते है यहां पूजा-अर्चना करते हैं और विशाल भंडारे का भी आयोजन होता है जिसमें प्रदेश ही नही अन्य प्रदेश में मौजूद उनके अनुयायी आते हैं। मलूक गुफा में लगी हैं लखौरी ईंट, लिखे हैं संत के लिखे दोहे संत मलूक दास के आश्रम में मलूक गुफा बनी है। महंत शिवा कांत पांडेय का कहना है कि हम सुनते आ रहे हैं कि यहीं पर बैठकर संत मलूक दास साधना जप-तप किया करते थे। गुफा के अंदर लखौरी ईटें लगी हैं। दीवारों पर मलूक दास के तमात तरह के दोहे भी लिखे गए हैं। ---------------------- ये खबर भी पढ़ें… जिसके तलाक पर ढोल-नगाड़े बजे, वो बोली-बहुत दुख झेला:मेरठ में रिटायर्ड जज पिता बोले- मेजर से डाइवोर्स अंत नहीं, नई शुरुआत ‘मैंने मानसिक रूप से काफी संघर्ष झेला। एंग्जायटी-डिप्रेशन तक फेस किया, लेकिन आज मैं यहां हूं क्योंकि मेरे परिवार ने मेरा साथ दिया। मेरे माता-पिता ने समाज नहीं, मेरी खुशी को चुना। हर लड़की को ऐसा सपोर्ट मिलना चाहिए। जब तक लड़की अपने पैरों पर खड़ी न हो जाए, उसकी शादी नहीं करनी चाहिए।’ ये बातें मेरठ की प्रणिता शर्मा ने कही। पढ़ें पूरी खबर
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