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    अम्बेडकरनगर के जलालपुर में बीजेपी की मुश्किल:1996 के बाद से नहीं जीती, स्थानीय समीकरण बनी बड़ी चुनौती

    2 hours ago

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    अंबेडकरनगर की जलालपुर विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पिछले तीन दशकों से जीत दर्ज नहीं कर पाई है। यह सीट राजनीतिक लहरों के बजाय स्थानीय रणनीति और सामाजिक समीकरणों पर आधारित रही है, जिससे बीजेपी के लिए यहां हमेशा चुनौती बनी रही है। बीजेपी ने जलालपुर में अपनी आखिरी बड़ी जीत 1996 में दर्ज की थी, जब शेर बहादुर सिंह ने पार्टी का परचम लहराया। इसके बाद से पार्टी हर चुनाव में समीकरणों और स्थानीय गुटबाजी के चलते फिसड्डी रही है। सामाजिक समीकरण बनाते हैं खेल का मैदान जलालपुर की राजनीति केवल पार्टी लाइन से नहीं, बल्कि जातीय संतुलन और सामाजिक संरचना पर निर्भर है। दलित, पिछड़ा और मुस्लिम वोट बैंक का समीकरण समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के पक्ष में काम करता रहा है। यही कारण है कि बीजेपी की कोशिशें यहां अब तक सफल नहीं हो सकीं। मोदी लहर भी नहीं कर सकी मदद 2014 की मोदी लहर और 2017 में बीजेपी को प्रदेश में मिले प्रचंड बहुमत के बावजूद, जलालपुर सीट पार्टी के झोली में नहीं आ सकी। यह स्पष्ट करता है कि इस विधानसभा क्षेत्र में स्थानीय कारक ही निर्णायक होते हैं। पार्टी में गुटबाजी और संगठन की कमजोरी बीजेपी ने कई दावेदारों को होर्डिंग और बैनर के माध्यम से प्रचारित किया, लेकिन स्थानीय गुटबाजी और संगठनात्मक कमजोरी हर चुनाव में पार्टी की ताकत घटाती रही है। अन्य विधानसभाओं के नेताओं की दावेदारी भी पार्टी में असंतोष पैदा करती है। 2027 चुनाव में चुनौती बरकरार वर्तमान स्थिति यही दर्शाती है कि बीजेपी अभी भी जलालपुर में संघर्षरत है। यदि पार्टी ने अपनी रणनीति में ठोस बदलाव नहीं किया, तो 2027 का विधानसभा चुनाव भी उसके लिए कठिन साबित हो सकता है। इस सीट पर जीत के लिए लहर नहीं, बल्कि जमीन पर मजबूत पकड़, सटीक सामाजिक संतुलन और भरोसेमंद स्थानीय चेहरा जरूरी है।
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