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    भगोड़े आरोपियों का मुकदमा कैसे चलेगा?:हाईकोर्ट ने ट्रायल' की पूरी प्रक्रिया बताई, आदेश सभी अफसरों भेजा जाए

    1 hour ago

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    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि यदि कोई घोषित भगोड़ा आरोपी जानबूझकर गिरफ्तारी और मुकदमे से बचता है तो उसकी अनुपस्थिति में भी आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है। अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 356 के तहत अनुपस्थिति में ट्रायल की विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित की। जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी की पीठ ने इस प्रावधान को भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में ऐतिहासिक प्रावधान बताते हुए कहा कि यह व्यवस्था न्यायिक प्रक्रिया से भागने वाले आरोपियों के कारण होने वाली देरी रोकने के लिए लाई गई है। घोषित भगोड़ा आरोपी के बारे में बताया अदालत ने कहा कि यदि कोई घोषित भगोड़ा आरोपी सुनवाई से बचने के लिए फरार रहता है और उसकी शीघ्र गिरफ्तारी की संभावना नहीं है तो इसे उसके व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर मुकदमा लड़ने के अधिकार के त्याग के रूप में माना जाएगा। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में अदालत निम्न प्रक्रिया अपनाकर आरोपी की अनुपस्थिति में मुकदमा चला सकती है- कोर्ट ने विस्तार से समझाया 1. अदालत आरोपी की गैरहाजिरी में साक्ष्य दर्ज कर सकती है, गवाहों की परीक्षा कर सकती है और निर्णय सुना सकती है। 2. गवाहों के बयान और क्रॉस एग्जामिनेशन की रिकॉर्डिंग ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से की जानी चाहिए, जिसमें मोबाइल फोन जैसे साधनों का उपयोग भी किया जा सकता है। 3. यदि फरार आरोपी का कोई वकील न हो तो राज्य के खर्च पर उसके लिए वकील नियुक्त किया जाना अनिवार्य होगा। 4. आरोप तय होने के बाद कम-से-कम 90 दिन की अवधि बीतने से पहले ऐसा ट्रायल शुरू नहीं किया जा सकता। 5. कम-से-कम दो लगातार गैर-जमानती वारंट जारी किए जाने चाहिए और उनके बीच कम से कम 30 दिन का अंतर होना चाहिए। 6. आरोपी के अंतिम ज्ञात पते वाले क्षेत्र में प्रसारित होने वाले राष्ट्रीय या स्थानीय समाचारपत्र में सूचना प्रकाशित की जानी चाहिए। 7. आरोपी के रिश्तेदारों या मित्रों को मुकदमे की शुरुआत की जानकारी दी जानी चाहिए। 8. आरोपी के घर और स्थानीय थाने में ट्रायल की सूचना प्रमुख स्थान पर चस्पा की जानी चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बीएनएसएस की धारा 356(7) के तहत ऐसे मामलों में दोषसिद्धि के खिलाफ अपील तभी सुनी जाएगी, जब दोषी स्वयं अपीलीय अदालत के समक्ष उपस्थित होगा। साथ ही अपील दायर करने की अधिकतम समय सीमा निर्णय की तिथि से तीन वर्ष होगी। हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी उस मामले में की जिसमें रवि उर्फ रविंद्र सिंह ने आगरा की अदालत द्वारा जारी गैर-जमानती वारंट को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता को वर्ष 2021 में जमानत मिल चुकी थी, लेकिन फरवरी 2024 में आरोप तय होने के बाद वह अक्टूबर 2024 से अदालत में उपस्थित नहीं हुआ। इसके चलते ट्रायल कोर्ट ने उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट, उद्घोषणा और संपत्ति कुर्की की कार्रवाई शुरू की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने फिलहाल गैर-जमानती वारंट के संचालन पर दो माह की रोक लगाई। साथ ही स्पष्ट किया कि यदि आरोपी आगे भी सहयोग नहीं करता तो ट्रायल कोर्ट विधि अनुसार कठोर कार्रवाई कर सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि अनुपस्थिति में ट्रायल शुरू करने से पहले अदालतों को यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी सामान्य दंडात्मक उपाय जैसे गैर-जमानती वारंट उद्घोषणा, संपत्ति कुर्की और न्यायालयी आदेश की अवहेलना पर पृथक अभियोजन पूरा कर लिया गया हो। इन सभी प्रक्रियाओं के बाद ही अदालत बीएनएसएस की धारा 356 के तहत आरोप तय कर अनुपस्थिति में मुकदमा पूरा कर सकती है। हाईकोर्ट ने इस आदेश प्रति प्रदेश के मुख्य सचिव, एसीएस होम, प्रमुख सचिव न्याय, डीजी अभियोजन, सभी जिलों के जिलाधिकारियों, पुलिस कप्तानों को भेजने का निर्देश दिया है ताकि इस सम्बन्ध में जरुरी कार्रवाई 60 दिन में पूरा किया जाय।
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