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    चंद्रशेखर की एक्स गर्लफ्रेंड रोहिणी ने अखिलेश से हाथ मिलाया:UP में 200 सभाएं करेंगी; सपा से 6 मुद्दों पर बात बनी

    2 hours ago

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    भीम आर्मी के अध्यक्ष और नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद की पूर्व प्रेमिका डॉ. रोहिणी घावरी यूपी की राजनीति में एक्टिव होने वाली हैं। ‘दैनिक भास्कर’ से बातचीत में उन्होंने दावा किया कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव से उनकी बात हो चुकी है। वे जून में स्विट्जरलैंड से भारत लौटेंगी और सपा के लिए नॉन जाटव दलितों, खासकर वाल्मीकि और पासी समाज को एकजुट करेंगी। वे पूरे यूपी में करीब 200 छोटी-बड़ी सभाएं करेंगी। इसके बाद आगरा या लखनऊ में एक बड़ी रैली होगी, जिसमें अखिलेश यादव मुख्य अतिथि होंगे। क्या रोहिणी की पॉलिटिकल एंट्री से चंद्रशेखर की राजनीति को झटका लगेगा या अखिलेश यादव को नया दलित चेहरा मिलेगा? पढ़िए ये रिपोर्ट… पहले जानिए रोहिणी के राजनीति में आने की अटकलें कैसे शुरू हुईं… सोशल मीडिया X पर पोस्ट, ‘बड़े भैया’ ने बुलाया है डॉ. रोहिणी घावरी स्विट्जरलैंड में जॉब करती हैं। उन्होंने 8 अप्रैल को सोशल मीडिया एक्स पर लिखा- “चलो बुलावा आया है, उत्तर प्रदेश से बड़े भैया ने बुलाया है। अगले महीने से शुरू होंगी 200 बैठक। आप सब तैयार हो जाइए, नई ऊर्जा के साथ आपकी बहन आपके साथ होगी।” दैनिक भास्कर ने इस पोस्ट को लेकर रोहिणी से बात की। उन्होंने बताया- ‘7 अप्रैल को अखिलेश जी से मेरी बात हुई थी। मैंने सबसे पहला सवाल उनसे पूछा था कि क्या आप चंद्रशेखर के साथ गठबंधन करेंगे? उन्होंने साफ कहा, कभी नहीं। इसी वजह से मैं सपा का साथ दे रही हूं।’ रोहिणी ने बताया कि अभी वे तीन दिन के लिए इटली जा रही हैं। वहां अपने लोगों के साथ बैठक करके अपनी टीम बनाएंगी। इसके बाद आगे की प्लानिंग करेंगी। इटली के बाद वे पेरिस जाएंगी और वहां भी कुछ लोगों से मुलाकात करेंगी। इसके बाद जून में भारत लौटेंगी और एक साल तक यूपी में एक्टिव रहेंगी। रोहिणी कहती हैं कि वे लखनऊ को केंद्र बनाकर पूरे यूपी में दलित समाज के लोगों के बीच जाएंगी। करीब 200 छोटी-छोटी सभाएं करेंगी और ‘कथित दलित मूवमेंट’ चला रहे चंद्रशेखर की सच्चाई जनता के सामने रखेंगी। बोलीं- दलित राजनीति के नाम पर सिर्फ जाटव फायदे में रहे रोहिणी का कहना है कि यूपी में 20 से 21 प्रतिशत दलित हैं। इनमें 10% नॉन जाटव दलित हैं। सबसे ज्यादा 65 लाख आबादी पासी समाज की है। वाल्मीकि समाज में करीब 13.19 लाख लोग हैं। ये समाज सफाई कर्मचारी, हेल्थ, एजुकेशन और सामाजिक क्षेत्र में योगदान दे रहा है। इसके बावजूद राजनीतिक रूप से काफी पिछड़ा है। दलित राजनीति के नाम पर सिर्फ जाटव को फायदा मिला। वाल्मीकि, पासी और दूसरी उपजातियां आज भी हाशिए पर हैं। रोहिणी का कहना है कि 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में सपा ने भी आरक्षित सीटों पर वाल्मीकि समाज को पर्याप्त टिकट नहीं दिए थे। इससे उन उपजातियों में असंतोष बढ़ा है। 2027 के चुनाव में सपा PDA फॉर्मूले के तहत वाल्मीकि समाज को उचित और सम्मानजनक हिस्सेदारी दे। इसके अलावा कोरी, दुसाध, धोबी, खटिक और धानुक जैसी दलित उपजातियों को भी एकजुट करना है। नॉन जाटव को एकजुट करने की तैयारी, सपा ने स्वागत किया रोहिणी घावरी के मुताबिक वाल्मीकि समाज के साथ-साथ पासी और दूसरे नॉन जाटव दलित नेताओं से उनकी बात हुई है। वे सब उनके साथ जुड़ना चाहते हैं। रोहिणी कहती हैं- हाशिए पर जी रहे अपने समाज को आगे बढ़ाने के लिए मैं अपने NGO के जरिए काम करूंगी। दलितों में सबसे ज्यादा फायदा जाटव समाज उठा रहे हैं। अब नॉन जाटव दलितों का भी हक दिलाएंगे। रोहिणी दावा करती हैं कि ब्राह्मण सभा और करणी सेना जैसे संगठन के लोग भी उनका साथ देने को तैयार हैं। पूरे मामले में सपा प्रवक्ता आजम खान ने कहा कि पार्टी समाज के हर वर्ग को जोड़ने की कोशिश कर रही है। जो भी पीड़ित है या PDA का हिस्सा हैं, उसका स्वागत है। ऐसे सभी लोगों से आह्वान करते हैं कि सपा के साथ जुड़ें ताकि 2027 की लड़ाई जीती जा सके। यकीनन समाज के निचले तबके का कोई भी व्यक्ति हमारे साथ आता है तो PDA की लड़ाई मजबूत होगी। इन 6 मुद्दों पर हुई रोहिणी-अखिलेश की बात– अब 2 सबसे अहम सवालों के जवाब जानिए… 1. रोहिणी के अभियान से चंद्रशेखर को कितना नुकसान? सीनियर जर्नलिस्ट सैय्यद कासिम कहते हैं कि रोहिणी ने चंद्रशेखर को एक्सपोज कर दिया है। अब विधानसभा चुनाव से पहले खुद रोहिणी यूपी में सभाओं के जरिए चंद्रशेखर पर हमला बोलेंगी तो सहानुभूति के चलते लोग उनसे जुड़ेंगे। इसका सीधा असर चंद्रशेखर की राजनीति पर पड़ेगा। 21 प्रतिशत दलितों में करीब 12 प्रतिशत जाटव और 10 प्रतिशत नॉन जाटव हैं। नॉन जाटव भाजपा, सपा जैसे दलों में बंटे हुए हैं। रोहिणी इस विभाजन को बढ़ाकर चंद्रशेखर को कमजोर करने की कोशिश करेंगी। 2. रोहिणी को आगे बढ़ाकर अखिलेश यादव को कितना फायदा? सीनियर जर्नलिस्ट रतन मणि लाल कहते हैं कि सपा प्रमुख PDA की बात करते हैं। इसमें D का मतलब दलित है। 2022 और 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश ने अलग-अलग इलाकों में नॉन जाटव दलित चेहरों को आगे बढ़ाया है। जैसे मछलीशहर में सोनकर समाज की डॉक्टर रागिनी, अयोध्या में पासी समाज के अवधेश और जौनपुर में प्रिया सरोज सक्रिय हैं। सपा में जाटव समाज के भी कई बड़े नेता हैं। जाटव वोटर 2027 के विधानसभा चुनाव में बसपा और चंद्रशेखर को छोड़कर सपा के साथ आएंगे या नहीं, इस पर संशय है। ऐसे में रोहिणी घावरी जैसे चर्चित चेहरे को साथ लेकर अखिलेश नॉन जाटव दलितों को साध सकते हैं। 2022 चुनाव में सपा ने दलितों में जाटव, पासी, कोरी, धोबी और खटिक को टिकट दिया, लेकिन वाल्मीकि समाज को एक भी टिकट नहीं दिया। यही कारण रहा कि तब नॉन जाटवों का बड़ा वोट बसपा के बाद भाजपा को मिला। रोहिणी को आगे करके अखिलेश इस बार नॉन जाटव दलितों को साधकर प्रदेश की 50 से 70 सीटों पर असर डाल सकते हैं, जहां ये वर्ग निर्णायक भूमिका में है। जानिए कौन हैं रोहिणी घावरी, चंद्रशेखर से क्या है विवाद? डॉ. रोहिणी घावरी इंदौर की रहने वाली हैं। मध्य प्रदेश सरकार की फेलोशिप स्कीम के तहत उन्हें स्विट्जरलैंड में पढ़ाई का मौका मिला। वहीं से उन्होंने PhD की और ‘जनपॉवर’ नाम से NGO बनाया। स्विट्जरलैंड में पढ़ाई के दौरान ही रोहिणी की मुलाकात भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर से हुई। रोहिणी के मुताबिक, चंद्रशेखर ने अपने शादीशुदा होने की बात भी छिपाई और शादी का झांसा देकर शारीरिक शोषण किया। जब वे नगीना से सांसद बने तो उन्होंने दूरी बनानी शुरू कर दी। रोहिणी ने महिला आयोग में चंद्रशेखर के खिलाफ शिकायत भी दी थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। दूसरी ओर, चंद्रशेखर और उनके समर्थकों की ओर से रोहिणी के खिलाफ FIR दर्ज कराई गई है। रोहिणी पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया पर चंद्रशेखर के खिलाफ अभियान चला रही हैं। -------------------------------------------------- ये खबर भी पढ़ें… यूपी में महापुरुषों की मूर्तियां लगाकर क्या जीत मिलेगी: सरकार छत्र-लाइटिंग लगाएगी, अखिलेश ने 12वीं प्रतिमा की घोषणा की; जानिए मूर्तियों की सियासत भाजपा सरकार महापुरुषों की प्रतिमाओं पर छत्र, लाइट और बाउंड्रीवाल लगाने जा रही है। अखिलेश यादव एक के बाद 12 से ज्यादा महापुरुषों की मूर्तियां गोमती रिवर फ्रंट पर लगाने का वादा कर चुके हैं। सवाल उठना वाजिब है कि क्या महापुरुषों की मूर्तियां लगाने से पार्टियों को फायदा होता है? पढ़िए रिपोर्ट…
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