Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    India को घेरने के लिए Bangladesh ने मिलाया China से हाथ, Siliguri Corridor के पास ड्रैगन देगा दस्तक

    3 hours from now

    2

    0

    भारत और बांग्लादेश के संबंधों में इस समय नई जटिलताएं उभरती दिखाई दे रही हैं। एक ओर अवैध घुसपैठ और सीमा से लोगों को वापस भेजने का मुद्दा दोनों देशों के बीच तनाव का कारण बना हुआ है, वहीं दूसरी ओर तीस्ता नदी परियोजना को लेकर बांग्लादेश का चीन की ओर बढ़ता झुकाव दक्षिण एशिया की सामरिक राजनीति में नए संकेत दे रहा है। हाल के घटनाक्रम यह स्पष्ट करते हैं कि ढाका, बीजिंग और नई दिल्ली के बीच कूटनीतिक संतुलन तेजी से बदल रहा है।हम आपको बता दें कि बांग्लादेश के गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने भारत में असम और पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की चुनावी सफलता के बाद इस आशंका पर चिंता जताई कि कहीं सीमा पर संदिग्ध अवैध प्रवासियों को जबरन वापस भेजने की घटनाएं न बढ़ जाएं। हालांकि उन्होंने उम्मीद जताई कि ऐसा कोई घटनाक्रम नहीं होगा। इससे पहले बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने भी संकेत दिया था कि यदि ऐसी घटनाएं बढती हैं तो ढाका प्रतिक्रिया देगा। देखा जाये तो अवैध प्रवासन और सीमा से लोगों को वापस भेजने का प्रश्न लंबे समय से भारत-बांग्लादेश संबंधों में संवेदनशील विषय रहा है।इसे भी पढ़ें: India-Vietnam के बीच 13 बड़े समझौते हुए, South China Sea में अब नहीं चल पाएगी चीन की दादागिरी, Modi और To Lam ने Jinping की टेंशन बढ़ा दीइसी बीच, सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम तीस्ता नदी व्यापक प्रबंधन और पुनरुद्धार परियोजना को लेकर सामने आया है। तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश सरकार ने औपचारिक रूप से इस परियोजना के लिए चीन का सहयोग मांगा है। बीजिंग में बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच हुई वार्ता में यह मुद्दा प्रमुखता से उठा। चीन ने न केवल परियोजना में सहयोग की इच्छा जताई, बल्कि बेल्ट एंड रोड पहल के अंतर्गत बांग्लादेश के साथ आर्थिक, आधारभूत ढांचा, जल प्रबंधन और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने का भी भरोसा दिया।हम आपको बता दें कि तीस्ता नदी का सामरिक महत्व अत्यंत संवेदनशील है। यह नदी सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होकर बांग्लादेश में प्रवेश करती है और लाखों लोगों की सिंचाई तथा आजीविका का आधार है। यह क्षेत्र भारत के अत्यंत महत्वपूर्ण सिलीगुडी गलियारे के निकट स्थित है, जो पूर्वोत्तर भारत को देश के शेष भाग से जोड़ने वाली जीवनरेखा माना जाता है। ऐसे में चीन की संभावित भागीदारी भारत की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा सकती है। यदि चीन को तीस्ता क्षेत्र में आधारभूत ढांचा या जल प्रबंधन परियोजनाओं के माध्यम से दीर्घकालिक उपस्थिति मिलती है, तो यह भारत की सामरिक निगरानी और पूर्वोत्तर क्षेत्र की सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकता है।हम आपको याद दिला दें कि भारत ने भी वर्ष 2024 में तीस्ता बेसिन के संरक्षण और तकनीकी सहयोग का प्रस्ताव देकर बांग्लादेश के साथ जल प्रबंधन सहयोग मजबूत करने की कोशिश की थी। हालांकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विरोध के कारण वर्ष 2011 का तीस्ता जल बंटवारा समझौता अब तक लागू नहीं हो पाया है। यही कारण है कि ढाका में लंबे समय से यह भावना बनी हुई है कि भारत ने जल बंटवारे के प्रश्न पर अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखाई। चीन अब इसी असंतोष का लाभ उठाने की कोशिश करता दिखाई दे रहा है।रिपोर्टों के मुताबिक, चीन ने वार्ता के दौरान यह भी कहा कि दक्षिण एशियाई देशों के साथ उसके संबंध किसी तीसरे पक्ष के खिलाफ नहीं हैं और उन्हें किसी अन्य देश के प्रभाव से नहीं देखा जाना चाहिए। लेकिन रणनीतिक दृष्टि से यह बयान महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि हाल के महीनों में बांग्लादेश की अंतरिम व्यवस्था चीन और पाकिस्तान के अधिक निकट दिखाई दी है। बीजिंग ने बांग्लादेश को राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा में समर्थन देने की बात कही, जबकि ढाका ने ताइवान के प्रश्न पर चीन के एक चीन सिद्धांत के प्रति खुला समर्थन दोहराया है।इसके साथ ही आर्थिक दृष्टि से भी चीन का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। बांग्लादेशी मीडिया के अनुसार चीन जापान, विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक के बाद बांग्लादेश का चौथा सबसे बड़ा ऋणदाता है। वर्ष 1975 से अब तक चीन लगभग साढ़े सात अरब अमेरिकी डॉलर का ऋण दे चुका है। इससे स्पष्ट है कि बांग्लादेश अपनी विकास आवश्यकताओं के लिए चीन पर अधिक निर्भर होता जा रहा है।बहरहाल, इस पूरे घटनाक्रम का व्यापक रणनीतिक निहितार्थ देखें तो सामने आता है कि दक्षिण एशिया में प्रभाव संतुलन तेजी से बदल रहा है। भारत के लिए चुनौती केवल सीमा सुरक्षा या जल बंटवारा नहीं है, बल्कि अपने पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र में चीन की बढ़ती उपस्थिति भी है। यदि नई दिल्ली बांग्लादेश के साथ राजनीतिक विश्वास और आर्थिक साझेदारी को मजबूत नहीं कर पाती, तो चीन को क्षेत्रीय रणनीतिक बढ़त मिल सकती है। दूसरी ओर बांग्लादेश अपने आर्थिक हितों और सामरिक विकल्पों को संतुलित करने की नीति पर आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। आने वाले समय में तीस्ता परियोजना और सीमा संबंधी मुद्दे भारत-बांग्लादेश संबंधों की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
    Click here to Read more
    Prev Article
    Strait of Hormuz पर Trump का Iran को अल्टीमेटम, कहा- शर्तें नहीं मानीं तो होगी बमबारी
    Next Article
    Hormuz Strait पर तनाव खत्म? सूत्रों का दावा- America-Iran में नौसैनिक नाकाबंदी हटाने पर बनी ऐतिहासिक सहमति

    Related विदेश Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment