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    Iran Warship को निशाना बनाने के लिए US ने सबसे घातक Mark 48 Torpedo का उपयोग किया, एक ही वार में काम हो गया तमाम

    3 hours from now

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    पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते हालात के बीच एक ओर जहां अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव तेज होता जा रहा है, वहीं भारत को लेकर भी कई तरह के दावे सामने आए हैं। कुछ विदेशी माध्यमों में यह आरोप लगाया गया कि अमेरिका ईरान के खिलाफ सैन्य हमलों के लिए भारतीय बंदरगाहों का इस्तेमाल कर रहा है। भारत सरकार ने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि इस तरह की खबरें पूरी तरह निराधार और भ्रामक हैं।भारतीय विदेश मंत्रालय ने इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारतीय बंदरगाहों का किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। मंत्रालय ने कहा कि कुछ विदेशी चैनलों और विश्लेषकों द्वारा फैलाए गए ये दावे तथ्यहीन हैं और भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश के अलावा कुछ नहीं हैं। सरकार ने साफ किया कि भारत एक संप्रभु देश है और उसकी विदेश नीति स्वतंत्र तथा संतुलित है। इसलिए किसी तीसरे देश के युद्ध में भारत की भूमि या बंदरगाहों का उपयोग होने की बात पूरी तरह गलत है।इसे भी पढ़ें: जंग में ईरान की मदद कर रहा है भारत? अमेरिका के दावों में कितनी सच्चाई हैभारत सरकार के इस स्पष्टीकरण के बाद यह भी कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय हालात के बीच जिम्मेदार सूचना का प्रसार बेहद जरूरी है। बिना आधिकारिक पुष्टि के फैलने वाली अफवाहें न केवल भ्रम पैदा करती हैं बल्कि कूटनीतिक स्तर पर भी अनावश्यक तनाव बढ़ा सकती हैं। विदेश मंत्रालय ने लोगों और माध्यमों से अपील की है कि वह ऐसी अपुष्ट खबरों को फैलाने से बचें और केवल प्रमाणित सूचनाओं पर ही भरोसा करें।इसी बीच, समुद्र में हुई बड़ी सैन्य घटना ने इस पूरे संकट को और गंभीर बना दिया है। खबरों के अनुसार अमेरिकी नौसेना की एक पनडुब्बी ने हिंद महासागर में एक ईरानी युद्धपोत को मार गिराया। बताया गया कि यह हमला शक्तिशाली मार्क-48 टारपीडो के जरिए किया गया, जो आधुनिक नौसैनिक युद्ध में सबसे घातक हथियारों में गिना जाता है। इस हमले के बाद ईरानी जहाज समुद्र में डूब गया।मार्क-48 टारपीडो को अमेरिका की पनडुब्बियों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला भारी हथियार माना जाता है। यह पानी के भीतर से छोड़ा जाने वाला ऐसा हथियार है जो दुश्मन के जहाज का पीछा करते हुए उसे निशाना बनाता है। इसमें शक्तिशाली वारहेड लगा होता है और यह लक्ष्य के नीचे या आसपास विस्फोट करके जहाज को भारी नुकसान पहुंचाता है। इसी कारण इसे नौसैनिक युद्ध में बेहद प्रभावी और घातक हथियार माना जाता है।रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा छोड़े गए एक ही टारपीडो ने ईरानी युद्धपोत को सीधे निशाना बनाया और जहाज कुछ ही समय में समुद्र की गहराइयों में समा गया। रक्षा अधिकारियों ने इस हमले को अमेरिकी सैन्य क्षमता का बड़ा प्रदर्शन बताया है। उनका कहना है कि इस तरह की कार्रवाई यह दिखाती है कि अमेरिकी नौसेना समुद्र के किसी भी हिस्से में अपने लक्ष्य को खोजकर नष्ट करने की क्षमता रखती है।विशेषज्ञों के अनुसार टारपीडो हमला समुद्री युद्ध की सबसे खतरनाक रणनीतियों में से एक होता है। पनडुब्बियां पानी के भीतर छिपकर चलती हैं और दुश्मन को पता चलने से पहले ही हमला कर सकती हैं। इसी वजह से टारपीडो हमले अक्सर अचानक और निर्णायक साबित होते हैं।इस पूरी घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता बढ़ा दी है। एक तरफ समुद्र में सैन्य टकराव की खबरें आ रही हैं, दूसरी तरफ भारत का नाम भी गलत तरीके से इस विवाद में घसीटने की कोशिश की गई। हालांकि भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी तरह से इस युद्ध का हिस्सा नहीं है और उसके बंदरगाहों का उपयोग किसी सैन्य कार्रवाई के लिए नहीं किया जा रहा।इस बीच, ईरान ने इस हमले को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है। ईरान के विदेश मंत्री ने कहा है कि अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा ईरानी फ्रिगेट आईरिस देना पर किया गया हमला बेहद गंभीर और खतरनाक कदम है और अमेरिका को इस घटना पर गहरा अफसोस होगा। ईरान के अनुसार यह युद्धपोत भारतीय नौसेना के अतिथि के रूप में तैनात था और अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में मौजूद था, जहां उस पर बिना किसी पूर्व सूचना के हमला किया गया। ईरानी पक्ष का कहना है कि इस जहाज पर लगभग एक सौ तीस नौसैनिक सवार थे और बिना चेतावनी के किया गया यह हमला अंतरराष्ट्रीय नियमों और समुद्री आचरण के खिलाफ है। ईरान ने इस कार्रवाई को उकसावे वाली घटना बताते हुए कहा है कि इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं।बहरहाल, पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट में जहां सैन्य घटनाएं तेजी से सामने आ रही हैं, वहीं सूचना के स्तर पर भी कई तरह के दावे और अफवाहें फैल रही हैं। भारत ने अपने आधिकारिक बयान के जरिए स्पष्ट कर दिया है कि वह इस संघर्ष से दूर रहते हुए संतुलित और स्वतंत्र नीति पर कायम है, जबकि समुद्र में हुए टारपीडो हमले ने इस पूरे संघर्ष की गंभीरता को और बढ़ा दिया है।
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