Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    इटावा में सैय्यद मजार पर रात में चला बुलडोजर:5 घंटे में 3 हजार स्क्वॉयर फीट में बनी मजार समतल; वन विभाग ने पौधे रोपे

    4 hours ago

    1

    0

    इटावा में सैयद बाबा की मजार को वन विभाग ने बुधवार की रात के अंधेरे में बुलडोजर से तोड़ दिया। जंगल में करीब पांच घंटे तक तीन बुल्डोजर चलते रहे। मौके पर फोर्स तैनात रही, किसी को वहां जाने नहीं दिया गया। सुबह जब मौके पर लोग पहुंचे तो उन्हें मजार की जगह पर पौधे रोपे मिले। तीन हजार स्क्वॉयर फीट में बनी यह मजार "बीहड़ वाले सैय्यद बाबा" के नाम से प्रसिद्ध थी। यह इटावा शहर से डेढ़ किलोमीटर दूर बीहड़ के फिशर वन क्षेत्र में बनी थी। मजार 800 साल पुरानी बताई जा रही है। फरवरी में यहां पर उर्स का आयोजन होता है, जिसमें 5 से 7 हजार लोग शामिल होते थे। इस बार फरवरी में उर्स नहीं हुआ। जनवरी में इसकी शिकायत सीएम पोर्टल पर की गई थी। इसके बाद वन विभाग ने जांच की और मजार हटाने के लिए कहा। मजार के केयर टेकर ने कोर्ट गए, लेकिन उनकी अपील खारिज हो गई। बुधवार को दिन में ही मजार खाली करा ली गई थी। इसके बाद वन विभाग ने इसे तोड़ दिया। 3 तस्वीरों में देखिए तोड़ी गई मजार… शाम को मजार, सुबह वहां समतल जमीन बची बुधवार शाम 6 बजे वन विभाग और पुलिस ने मजार हटाने की कार्रवाई शुरू कर दी। तीन बुलडोजरों से मजार के ढांचे को गिराया गया। रात 1 बजे तक पूरी मजार हटा दी गई। कोई विरोध न हो, इसलिए पुलिस बल मजार जाने वाले रास्तों पर तैनात रही। सुबह होने तक वहां का पूरा स्वरूप बदल चुका था। जहां कभी मजार और उससे जुड़ी संरचनाएं मौजूद थीं, वहां अब समतल जमीन दिखाई दे रही। वन विभाग ने पौधे रोप दिए। अब समझिए पूरा मामला 3 जनवरी को आईजीआरएस के माध्यम से मुख्यमंत्री कार्यालय को की इस मजार को अवैध बताकर शिकायत की गई। 5 जनवरी को ही जिले के डीएम ऑफिस को आदेश मिला कि ये मजार वन विभाग की जमीन पर बनी है। इसकी जांच कर आख्या प्रस्तुत की जाए। आदेश आने के बाद वन विभाग ने आनन फानन में जांच की। जांच के दौरान वन विभाग के वन रेंज अधिकारी अशोक कुमार शर्मा ने पाया कि यह मजार फिशर वन के कंपार्टमेंट नंबर तीन में स्थित है और पूरी तरह वन भूमि के भीतर बनी हुई है। टीम ने मौके पर पहुंचकर मापजोख की और पुराने नक्शों का अवलोकन किया, जिसमें यह क्षेत्र वन भूमि के अंतर्गत दर्ज पाया गया। वन विभाग के रिकॉर्ड और वर्ष 1916, 1936 तथा 1946 के राजपत्रों के अनुसार यह भूमि वन विभाग के स्वामित्व में दर्ज है। वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत ऐसी भूमि का उपयोग भारत सरकार की अनुमति के बिना किसी भी गैर-वानिकी कार्य के लिए नहीं किया जा सकता। 23 जनवरी 2026 को वन विभाग ने मजार पर होने वाली धार्मिक गतिविधियों और इबादत पर रोक लगा दी थी। इसी दिन जिला वन अधिकारी की अदालत में मजार को संरक्षित वन भूमि पर अवैध निर्माण बताते हुए ध्वस्तीकरण का वाद दायर किया गया। 5 फरवरी को पहली सुनवाई हुई, जहां मजार पक्ष की ओर से जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा गया। अदालत ने 16 फरवरी तक का समय दिया। मजार के पक्षकारों ने इसके लिए समय मांगा। जिस पर उन्हें 20 फरवरी और फिर 23 मार्च तक की मोहलत दी गई। 28 मार्च को अंतिम अवसर दिया गया, लेकिन जमीन और मजार निर्माण से जुड़े डॉक्यूमेंट पक्षकार नहीं दे पाए। इस पर जिला वन अधिकारी की अदालत ने आदेश दिया कि भूमि पर उनका कोई वैध अधिकार है। मजार हटाई जाए। इस पर मजार के केयरटेकर फजले इलाही ने जिला वन अधिकारी की अदालत के आदेश को चुनौती देते हुए कानपुर स्थित वन संरक्षक के समक्ष अपील दाखिल की। अपील में ध्वस्तीकरण आदेश को निरस्त करने की मांग की गई थी। हालांकि सुनवाई के बाद वन संरक्षक ने भी अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही वन विभाग के सामने कार्रवाई का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया। पहले पांच गड्‌ढे बनाकर रास्ता राेका गया अपील खारिज होने के बाद वन विभाग मजार हटाने की तैयारी शुरू कर दी। पहले ही मजार तक जाने वाले रास्ते बंद कर दिया गया था। वन विभाग ने पांच जगहों पर बड़े-बड़े गड्‌ढे कर दिए। मजार परिसर में किसी भी प्रकार के धार्मिक आयोजन और उर्स पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसी वजह से फरवरी माह में उर्स का आयोजन भी नहीं हो सका। मजार किसने बनाई कब बनाई, इसका कोई रिकॉर्ड नहीं मजार का इतिहास भी संदिग्ध है। यह मजार कब बनी, किसने बनाई और इसकी स्थापना कब हुई, इसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। स्वयं वन विभाग के अधिकारियों के पास भी इसके निर्माण का कोई प्रमाणिक इतिहास मौजूद नहीं है। वन विभाग का दावा है कि समय के साथ धीरे-धीरे संरक्षित वन भूमि पर निर्माण बढ़ता गया और बाद में यहां स्थायी ढांचा खड़ा हो गया। विभाग के अनुसार यह पूरी प्रक्रिया बिना किसी वैधानिक अनुमति के हुई थी, इसलिए इसे अवैध निर्माण माना गया। मजार की देखरेख इटावा शहर के आकालगंज निवासी फजले इलाही करते हैं। उनके सहयोगी नदीम ने बताया– ये मजार 800 साल पुरानी है। कुछ लोग इसे मोहम्मद गोरी के सेनापति शमसुद्दीन की मजार बता रहे हैं, जो पूरी तरह गलत और निराधार है। मेरी कई पीढ़ियों ने इसे देखा है। हर साल फरवरी या मार्च में रमजान से पहले चांद देखकर मजार पर सालाना उर्स होता है। जिसमें हजारों लोग आते हैं।
    Click here to Read more
    Prev Article
    गोंडा एसपी ने 22 उपनिरीक्षकों का किया तबादला:सिविल लाइन सहित कई चौकी प्रभारी हटाए गए, सोनू कुमार बने चौकी प्रभारी रोडवेज
    Next Article
    घायल की मदद करने पहुंचे लोगों को SUV ने रौंदा:गोंडा में 2 सगे भाइयों, चाचा-भतीजे समेत 5 की मौत, घायल को उठाकर एंबुलेंस में रखने जा रहे थे

    Related न्यूज Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment