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    झांसी में लट्ठमार होली, महिलाओं ने बरसाए लट्ठ:खातीबाबा मंदिर के बाहर 50 फीट ऊंचे खंभे पर बंधी पोटली, खोलने की कोशिश करते पुरुष

    5 hours ago

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    झांसी में आज ब्रज के बरसाने जैसी लट्ठमार होली देखने को मिली। इसमें गांव की 150-200 महिलाएं करीब 500 पुरुषों को गांव में दौड़ा-दौड़ाकर लाठियों से पीटती हैं। इस दौरान पुरुष टी-शेप की लाठियों से बचने की कोशिश करते हैं। गांव की महिलाओं ने गुलाल उड़ाते हुए ढोल की थाप पर पारंपरिक फाग गाया। वहीं बच्चे भी रंग और गुलाल से सराबोर नजर आए। शाम होते ही गांव के खातीबाबा मंदिर के बाहर बने बरामदे में पुरुषों की महफिल सजती है। जहां देर रात तक फाग गूंजती रहती है। पिछले एक सप्ताह से इस गांव में यही माहौल बना हुआ है। इसके साथ ही घर-घर में लट्ठ भी तैयार किए जाते हैं। इन लट्ठों को मजबूत बनाने के लिए उनमें अच्छे से तेल लगाया जाता है। होली की दूज पर महिलाएं इन्हीं लट्ठों से लट्ठमार होली खेलती हैं। देखें लट्ठमार होली की तीन तस्वीरें… परंपरा करीब 1100 साल पुरानी दरअसल झांसी-शिवपुरी हाईवे से करीब तीन किलोमीटर अंदर स्थित डगरवाहा गांव में बरसाने की तर्ज पर लट्ठमार होली खेली जाती है। गांव में यह परंपरा करीब 1100 साल पुरानी बताई जाती है। इस बार भी लट्ठमार होली को लेकर तैयारियां शुरू हो गईं हैं और पूरे गांव में उत्साह का माहौल है। खंभे पर टंगी पोटली को उतारने की चुनौती गांव की परंपरा के अनुसार, होली की दूज पर खातीबाबा मंदिर के बाहर मैदान में करीब 50 फीट ऊंचे खंभे पर कपड़े की एक पोटली बांधी जाती है। इस पोटली में गुड़ और नकदी रखी जाती है। पोटली को उतारने के लिए हुरियारों यानी पुरुषों की टोलियां मैदान में पहुंचती हैं। वहीं गांव की महिलाएं लट्ठ लेकर उन्हें रोकने की कोशिश करती हैं। हुरियारों को महिलाओं के लट्ठों से बचते-बचाते खंभे तक पहुंचकर पोटली उतारनी होती है। जब तक गुड़ की पोटली को तोड़ा नहीं जाता, तब तक होली खेली जाती है। यह होली अब गांव तक ही सीमित नहीं रही, आस-पास के जिलों के लोग भी इस होली का आनंद लेने पहुंचते हैं। जो व्यक्ति यह कारनामा कर लेता है, उसे पोटली में बंधी नकदी इनाम के रूप में मिलती है। कई बार पंचमी पर भी होता है आयोजन कई बार महिलाओं के लट्ठों की इतनी बौछार होती है कि कोई भी हुरियारा पोटली तक पहुंचने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। ऐसी स्थिति में पंचमी के दिन दोबारा लठामार होली खेली जाती है। हालांकि ऐसा मौका 20 से 25 साल में एक बार ही आता है। पुरुष कहीं का हो, महिलाएं गांव की होती हैं परंपरा के अनुसार, इस लट्ठमार होली में सिर्फ डगरवाहा गांव की महिलाएं ही हिस्सा ले सकती हैं। बाहरी गांव की महिलाओं को इसमें शामिल होने की अनुमति नहीं होती। हालांकि पुरुष किसी भी गांव के हो सकते हैं। वे अपने बचाव के लिए लाठियां लेकर आते हैं और दोनों हाथों से लाठी पकड़कर महिलाओं के वार से बचने की कोशिश करते हैं। लट्‌ठ उनको ही मारा जाता है जो मैदान में आता है। छतों या अन्य स्थानों से होली देख रहे लोगों से महिलाएं नहीं बोलती हैं। होली के बाद महिलाओं को मिठाई बांटी जाती है।” आसपास के गांवों से उमड़ती है भीड़ डगरवाहा की लट्ठमार होली देखने के लिए आसपास के करीब एक सैकड़ा गांवों से लोग यहां पहुंचते हैं। ग्रामीणों के लिए यह आयोजन किसी मेले से कम नहीं होता। मैदान में ढोल, फाग और रंग-गुलाल के बीच लाठियों की यह अनोखी होली लोगों को रोमांचित कर देती है। ……………… पढ़ें ये भी जरूरी खबरें… सखियों ने हुरियारों के कपड़े फाड़कर कोड़े मारे, VIDEO: मथुरा में घूंघट डालकर महिलाओं ने खेली होली, हुरियारों ने बाल्टी से बरसाया रंग मथुरा में दाऊजी महाराज मंदिर में गुरुवार को कोड़ामार होली खेली गई। महिलाएं दुल्हन की तरह सज-धज कर पहुंचीं। मंदिर प्रांगण में हुरियारों (पुरुष) और हुरियारिनों (महिलाओं) के बीच जमकर होली हुई। घूंघट में महिलाओं ने हुरियारों के कपड़े फाड़ दिए। उसी कपड़े का कोड़ा बनाया और प्रेम से हुरियारों के नंगे बदन पर कोड़ों की बारिश कर दी। इस दौरान हुरियारे भी सखियों पर बाल्टी से रंग बरसाते रहे। होली गीतों पर झूमते दिखे। मंदिर में हर तरफ रंग और अबीर-गुलाल उड़ाए गए। पूरा परिसर रंगों से सरोबार हो गया। इस अनोखी होली को देखने के लिए विदेशियों समेत एक लाख से ज्यादा लोग पहुंचे। पढ़ें पूरी खबर…
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