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    कानपुर में मर्डर–सुसाइड के 3 मामले:क्यों बढ़ रहा है यह खतरनाक पैटर्न? एक्सपर्ट से समझिए असली वजह

    21 hours ago

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    कानपुर में पिछले कुछ समय के भीतर सामूहिक हत्या के बाद आत्महत्या की तीन गंभीर घटनाएं सामने आई हैं। तीनों मामलों में एक समान पैटर्न देखने को मिला। परिवार के मुखिया ने ही पत्नी और बच्चों की हत्या की और बाद में खुद भी जान दे दी। तीनों के पेशे अलग-अलग थे, कोई डॉक्टर, कोई रिटायर्ड फौजी और कोई कारोबारी, लेकिन अंजाम एक जैसा रहा। केस-1: डॉक्टर का मामला, गंगा में मिला शव कल्याणपुर स्थित डिविनिटी अपार्टमेंट में रहने वाले डॉक्टर सुशील कुमार के मामले ने पूरे शहर को झकझोर दिया। पुलिस के अनुसार, मानसिक अवसाद की स्थिति में उन्होंने अपनी पत्नी चंद्रप्रभा और दो बच्चों शिखर और खुशी की हत्या कर दी। घटना के बाद उन्होंने अपने भाई को संदेश भेजा और लापता हो गए। पुलिस की पांच टीमें और गोताखोर करीब 10 दिनों तक तलाश करते रहे। बाद में चकेरी स्थित सिद्धनाथ घाट पर गंगा में उनका शव बरामद हुआ। जेब से मिले आईकार्ड और दवाओं के पत्तों के आधार पर पहचान की पुष्टि हुई। केस-2: कर्ज और पारिवारिक विवाद के बीच टूटा पूर्व सैनिक रिटायर्ड फौजी चेतराम पासवान आर्थिक दबाव से जूझ रहे थे। बेटी की शादी और मकान निर्माण के लिए लिया गया करीब 12 लाख रुपये का कर्ज उन पर भारी पड़ रहा था। बताया जाता है कि रात में पत्नी से हुए विवाद के बाद उन्होंने अपनी लाइसेंसी बंदूक से पत्नी और 16 वर्षीय बेटे को गोली मार दी। इसके बाद चेतराम ने ट्रेन के सामने आकर आत्महत्या कर ली। पुलिस के मुताबिक, शुरुआती जांच में आर्थिक तनाव और पारिवारिक विवाद को मुख्य कारण माना गया। केस-3: कारोबारी का सुसाइड नोट और दो बेटों पर हमला बिल्हौर के सर्राफा कारोबारी अजय कटियार ने अपने दो बेटों पर हमला किया। छोटे बेटे की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि बड़ा बेटा अस्पताल में इलाजरत है। घटना के बाद अजय ने पहले जहर खाया और फिर फांसी लगा ली। कमरे से एक सुसाइड नोट बरामद हुआ, जिसमें बच्चों के भविष्य को लेकर असमर्थता और बेबसी जाहिर की गई थी। पुलिस सीसीटीवी फुटेज और अन्य साक्ष्यों के आधार पर जांच कर रही है। विशेषज्ञ की राय: नकारात्मकता, अवसाद और निर्णय क्षमता पर असर एलएलआर अस्पताल के मनोरोग विभागाध्यक्ष डॉ. धनंजय पांडेय के अनुसार, ऐसे मामलों के पीछे कोई एक कारण नहीं होता। यह सामाजिक दबाव, पारिवारिक तनाव, आर्थिक बोझ और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का जटिल मिश्रण हो सकता है। उनका कहना है कि जब व्यक्ति पूरी तरह निराशा और नकारात्मकता से घिर जाता है, तो उसकी निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है। कई मामलों में व्यक्ति किसी गंभीर मानसिक विकार से जूझ रहा होता है, लेकिन परिवार को इसकी गंभीरता का अंदाजा नहीं होता। क्या मानसिक बीमारियां बढ़ा रही हैं खतरा? डॉ. पांडेय बताते हैं कि बाइपोलर डिसऑर्डर, गंभीर अवसाद या स्किजोफ्रेनिया जैसी स्थितियों में व्यक्ति को भ्रम या अवास्तविक विचार आ सकते हैं। यदि समय पर इलाज न मिले तो स्थिति खतरनाक रूप ले सकती है। आर्थिक तंगी या पारिवारिक विवाद जैसी परिस्थितियां इस मानसिक दबाव को और बढ़ा देती हैं। कुछ मामलों में व्यक्ति को यह भ्रम हो जाता है कि उसके बाद परिवार असहाय हो जाएगा और इसी विकृत सोच में वह घातक कदम उठा बैठता है। इलाज और रोकथाम: समय पर पहचान जरूरी डॉ. पांडेय के अनुसार, आधुनिक रिसर्च में ‘कीटामाइन’ जैसी दवाओं का उपयोग गंभीर आत्मघाती विचारों को कम करने के लिए नियंत्रित परिस्थितियों में किया जा रहा है। हालांकि, यह उपचार केवल विशेषज्ञ की निगरानी में ही संभव है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि यदि परिवार के किसी सदस्य के व्यवहार में अचानक बदलाव दिखे, अत्यधिक नशा करने लगे, बार-बार निराशा या मरने की बात करे, खुद को परिवार पर बोझ बताने लगे तो उसे डांटने या नजरअंदाज करने के बजाय तुरंत मनोचिकित्सक से संपर्क कराएं।
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