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    Lathicharge पर CJI Surya Kant ने कर दी अहम टिप्पणी, प्रदर्शन के लिए Nationwide Protocol बनाने के पक्ष में Supreme Court

    2 hours from now

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    राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर छिड़े विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने आज बेहद स्पष्ट और अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार है और केवल यह कहकर कि कहीं आंदोलन चल रहा था, पुलिस की कथित ज्यादतियों को उचित नहीं ठहराया जा सकता। शीर्ष अदालत ने साफ संकेत दिए कि अब पूरे देश में विरोध-प्रदर्शनों के लिए एक समान प्रोटोकॉल बनाने की जरूरत है, ताकि लोकतांत्रिक अधिकार भी सुरक्षित रहें और कानून-व्यवस्था भी कायम रहे।हम आपको बता दें कि मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह टिप्पणी 20 जुलाई को कथित नीट पेपर लीक के विरोध में छात्रों के प्रदर्शन और पिछले सप्ताह दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की। अदालत ने इन मामलों को केवल दिल्ली तक सीमित मानने से इंकार करते हुए कहा कि यह पूरे देश से जुड़ा मुद्दा है और इस पर व्यापक दिशा-निर्देश तैयार किए जाने चाहिए।इसे भी पढ़ें: Peaceful Protest संवैधानिक अधिकार, Supreme Court ने NEET-UG प्रदर्शनों पर Police Excess पर जताई गंभीर चिंतासुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार संविधान में निहित है। यह पूर्ण रूप से संरक्षित अधिकार है और इससे इंकार नहीं किया जा सकता। केवल आंदोलन होने के आधार पर पुलिस की कथित ज्यादतियों को उचित नहीं ठहराया जा सकता।" अदालत ने यह भी जोड़ा कि "आंदोलन का मतलब लाठीचार्ज नहीं होता और न ही आंदोलन का मतलब हिंसा होता है।"सुप्रीम कोर्ट ने लोकतंत्र में प्रदर्शन और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने पर जोर देते हुए कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों के लिए पहले से निर्धारित और उपयुक्त स्थान उपलब्ध कराए जाने चाहिए। यदि किसी प्रदर्शन में असामाजिक तत्व घुसकर हिंसा फैलाने की कोशिश करें तो उनके खिलाफ कानून के मुताबिक सख्त कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन इसका असर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के संवैधानिक अधिकारों पर नहीं पड़ना चाहिए।हालांकि अदालत ने पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाने के साथ-साथ पुलिसकर्मियों की सुरक्षा को भी समान रूप से महत्वपूर्ण बताया। सुनवाई के दौरान जब पुलिसकर्मियों के घायल होने और उनके परिवारों पर कथित हमलों का मुद्दा उठाया गया तो न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि पुलिसकर्मियों को लगी चोट भी उतनी ही गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने संकेत दिया कि राज्य सरकारों से यह भी पूछा जा सकता है कि पुलिस की सुरक्षा के लिए पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं किए गए।मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पूरे देश में ऐसा स्पष्ट और एकरूप प्रोटोकॉल होना चाहिए, जिसमें यह तय हो कि कोई भी व्यक्ति या संगठन यदि शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करना चाहता है तो उसके लिए क्या प्रक्रिया होगी, किन स्थानों का उपयोग किया जाएगा और प्रशासन की जिम्मेदारियां क्या होंगी। साथ ही अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में आत्मानुशासन भी उतना ही आवश्यक है।सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि इस विषय पर केंद्र और राज्य सरकारों के साथ टकराव की बजाय सहयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए, ताकि पूरे देश में लागू होने वाले अनिवार्य दिशा-निर्देश तैयार किए जा सकें। अदालत ने कहा कि यह केवल किसी एक राज्य या एक घटना का मामला नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ा राष्ट्रीय महत्व का प्रश्न है।दिल्ली पुलिस की कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान भी अदालत ने दोहराया कि जब तक प्रदर्शन शांतिपूर्ण और कानून के दायरे में है, तब तक केवल आंदोलन के आधार पर लाठीचार्ज जैसी कार्रवाई स्वीकार्य नहीं हो सकती। यदि कहीं पुलिस की ओर से जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग हुआ है तो उसकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।अब इस बहुचर्चित मामले की अगली सुनवाई मंगलवार को होगी। माना जा रहा है कि अदालत देशभर में विरोध-प्रदर्शनों के लिए एक समान व्यवस्था और जवाबदेही तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा सकती है। यदि ऐसा होता है तो भविष्य में प्रदर्शनकारियों के अधिकारों और पुलिस की जिम्मेदारियों, दोनों के लिए एक स्पष्ट राष्ट्रीय मानक स्थापित हो सकता है।बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी लोकतंत्र को आईना दिखाने वाली चेतावनी है। शांतिपूर्ण विरोध हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और इसे पुलिसिया ताकत से दबाने की कोशिश लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करती है। लेकिन उतना ही सच यह भी है कि प्रदर्शन के नाम पर हिंसा, सरकारी संपत्ति को नुकसान या पुलिस पर हमले को किसी भी कीमत पर जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।अदालत ने बिल्कुल सही कहा कि "आंदोलन का मतलब लाठीचार्ज नहीं और आंदोलन का मतलब हिंसा भी नहीं।" यही लोकतंत्र का संतुलन है। अब जरूरत इस बात की है कि पूरे देश में विरोध-प्रदर्शनों के लिए एक समान और पारदर्शी प्रोटोकॉल बने, जिसमें प्रदर्शनकारियों के अधिकार और पुलिस की जिम्मेदारियां स्पष्ट हों। लोकतंत्र की असली ताकत न तो डंडे में है और न ही भीड़ के दबाव में, बल्कि कानून के निष्पक्ष और समान पालन में है। यदि यह संतुलन कायम हो गया, तो विरोध भी लोकतांत्रिक रहेगा और व्यवस्था भी सम्मानजनक।
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