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    लखनऊ में अमृतलाल नागर की ड्योढ़ी पर साहित्य चर्चा:साहित्यकारों ने अमर कथाकार के व्यक्तित्व-कृतित्व पर की बात

    18 hours ago

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    राजधानी लखनऊ के चौक स्थित अमर कथाकार अमृतलाल नागर की ऐतिहासिक ड्योढ़ी पर रविवार को साहित्यकारों और प्रबुद्ध जनों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। इसके बाद बान वाली गली स्थित सेठ पन्नालाल अग्रवाल धर्मशाला में लोक संस्कृति शोध संस्थान की ओर से एक लोक चौपाल आयोजित की गई, जहां नागर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तार से चर्चा हुई। लोक संस्कृति विशेषज्ञ शाखा वन्द्योपाध्याय ने नागर से जुड़े संस्मरण साझा किए। उन्होंने कहा कि नागर की रचनाधर्मिता, सहजता और लोक-स्वीकार्यता उन्हें जन-जन का कथाकार बनाती है। वन्द्योपाध्याय ने नागर की कृतियों के डिजिटलीकरण के लिए उनके पुत्र शरद नागर और प्रपौत्रियों प्रो. ऋचा नागर व डॉ. दीक्षा नागर के प्रयासों की सराहना भी की। नागर अक्सर अपने उपन्यास बोलकर लिखवाते थे नागर के चर्चित उपन्यास 'नाच्यो बहुत गोपाल' के लेखन के दौरान उनके लिपिक रहे राजेंद्र वर्मा ने भी अपने अनुभव साझा किए। बाद में संगीत नाटक अकादमी से जुड़े वर्मा ने नागर के लेखकीय अनुशासन और उनकी शोधपरक दृष्टि को याद करते हुए बताया कि वे हर कृति से पहले गहन अध्ययन और तथ्य-संग्रह करते थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार दयानंद पाण्डेय ने की। उन्होंने बताया कि अमृतलाल नागर अक्सर अपने उपन्यास बोलकर लिखवाते थे और उनके सान्निध्य में कई लोग लेखक व संपादक बने। पाण्डेय ने 'खंजन नयन', 'सुहाग के नूपुर', 'शतरंज के मोहरे', 'ये कोठे वालियां' और 'गदर के फूल' जैसी कृतियों को नागर की शोध-संपन्न लेखनी का प्रमाण बताया। साहित्यिक धरोहर के संरक्षण और प्रसार का संकल्प चौपाल में डॉ. अपूर्वा अवस्थी ने नागर द्वारा लिखे जयशंकर प्रसाद के संस्मरण का वाचन किया। कार्यक्रम का संचालन अर्चना गुप्ता ने किया, जिन्होंने नागर की रचनाओं को स्वर दिया। डॉ. करुणा पाण्डे ने उनकी कृतियों को ऐतिहासिक दस्तावेज करार दिया। कवि श्रीकृष्ण द्विवेदी 'द्विजेश' ने कविता पाठ किया। लोक संस्कृति शोध संस्थान की सचिव डॉ. सुधा द्विवेदी ने नागर की साहित्यिक धरोहर के संरक्षण और प्रसार का संकल्प लिया। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को उनके लोकनिष्ठ साहित्य से प्रेरणा मिल सके, इसके लिए निरंतर प्रयास किए जाएंगे।
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