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    मिडिल ईस्ट क्राइसिस से सेहत पर भी संभावित संकट:भारतीय दवाओं का 200 देशों में निर्यात, सप्लाई चेन प्रभावित हुई तो उत्पादन पर असर

    4 hours ago

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    अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में हुई वार्ता बेनतीजा रही। इसके संकेत हैं कि मिडिल ईस्ट में तनाव और बढ़ सकता है। अब तक इसका असर पेट्रोलियम पदार्थों और रसोई गैस की कीमतों पर दिख रहा है, लेकिन इसका व्यापक प्रभाव अभी सामने आना बाकी है। खरीफ सीजन के साथ उर्वरकों की स्थिति स्पष्ट होगी, लेकिन इससे पहले दवाओं की कीमत और उपलब्धता पर दबाव बनने की आशंका है। दवाओं पर क्यों पड़ सकता है असर दैनिक उपयोग की कई दवाएं पेट्रोकेमिकल इंटरमीडिएट्स से जुड़ी होती हैं। पैरासिटामोल, एस्पिरिन, कई एंटीबायोटिक्स और कफ सिरप जैसी दवाओं के निर्माण में पेट्रोकेमिकल आधारित रसायनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके अलावा दवाओं की पैकेजिंग, सिरिंज, आइवी ट्यूबिंग और अन्य मेडिकल उपकरण भी बड़े पैमाने पर पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर निर्भर हैं। मिडिल ईस्ट की भूमिका सऊदी अरब, ईरान, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश तेल और पेट्रोकेमिकल उत्पादन के प्रमुख केंद्र हैं। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है। यदि इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के साथ पेट्रोकेमिकल इंटरमीडिएट्स महंगे हो सकते हैं, जिसका असर फार्मास्यूटिकल उद्योग की लागत पर पड़ेगा। भारत पर संभावित असर भारत दुनिया का सबसे बड़ा जेनरिक दवा उत्पादक और निर्यातक है। भारतीय दवाएं 200 से अधिक देशों में जाती हैं और अमेरिका में भी बड़ी मात्रा में निर्यात होती हैं। हालांकि, कई महत्वपूर्ण कच्चे माल और इंटरमीडिएट्स के लिए भारत आयात पर निर्भर है। ऐसे में सप्लाई चेन प्रभावित होने पर उत्पादन लागत बढ़ सकती है। आम उपभोक्ताओं पर प्रभाव इस स्थिति का सबसे अधिक असर उन मरीजों पर पड़ सकता है जो डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और संक्रमण जैसी बीमारियों के लिए नियमित दवाओं पर निर्भर हैं। फिलहाल दवाओं की उपलब्धता सामान्य है, लेकिन आने वाले समय में कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। सरकार की जन औषधि जैसी योजनाएं राहत देती हैं, लेकिन आपूर्ति बाधित होने पर इन पर भी असर पड़ सकता है। क्या कहते हैं दवा के कारोबारी दवा विक्रेता समिति गोरखपुर के महामंत्री आलोक चौरसिया के मुताबिक फ़िलहाल अब तक मिडल ईस्ट के क्राइसिस का असर दवा इंडस्ट्री पर नहीं पड़ा है। पर सप्लाई चेन अगर लंबे समय तक प्रभावित रहा तो कई दवाओं की कीमतों पर असर पड़ सकता है। चूंकि ज़्यादातर दवाओं का कच्चा माल एपीआई (एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट्स) बाहर खासकर चीन से आता है। चीन की सप्लाई चेन फिलहाल अबाधित है। हालत ऐसे ही रहे तो एपीआई में उसकी मोनोपली (एकाधिकार) और बढ़ जाएगा। चूंकि भारत उसके लिए सबसे बड़ा बाज़ार है। लिहाजा मांग देखकर वह दाम टाइट कर सकता है। इसका असर पूरे विश्व के मेडिसिन मार्केट पर पड़ सकता है। खासकर जेनरिक दवाओं पर। क्योंकि ब्रांडेड और जेनरिक दवाओं की कीमतों में बहुत फर्क होता है। आम तौर पर तो एमआरपी का यह अंतर 50 फीसद तक होता है,पर कुछ ब्रांडेड दवाएं 300 से 400 फीसद तक मंहगी होती हैं। इसी वजह से जेनरिक दवाओं की कीमत किसी वजह से बढ़ी तो पूरी दुनिया के गरीब और मध्यम वर्गीय लोग सर्वाधिक होंगे। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश के नाते भारत पर उसी अनुपात में इसका असर पड़ सकता है। निष्कर्ष मौजूदा परिस्थितियों में यह तत्काल संकट नहीं है, लेकिन मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव भविष्य में दवाओं की लागत और उपलब्धता को प्रभावित कर सकता है। स्थिति पर सतत निगरानी आवश्यक है।
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