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    मथुरा के मुखराई में हुआ चरकुला नृत्य:महिलाओं ने सिर पर जलते दीपकों को रखकर किया डांस, मुखरा रानी के शौर्य से जुड़ा इतिहास

    2 hours ago

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    ब्रज की देहरी और राधा रानी के ननिहाल कहे जाने वाले मथुरा जे गांव मुखराई में गुरुवार को विश्व प्रसिद्ध 'चरकुला नृत्य' का आयोजन किया गया। बड़ी संख्या में उमड़े जनसमूह के बीच जब नृत्यांगनाओं ने सिर पर जलते दीपकों का पिंजरा (चरकुला) रखकर नृत्य किया, तो पूरा परिसर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।मथुरा में कहीं लठामार होली तो कहीं कपड़ा फाड़ होली की परंपरा देखने को मिलती है। धूल होली के बाद अनौखी और अलौकिक परंपरा फूलों की होली के साथ प्रसिद्ध चरकुला नृत्य का आयोजन किया जाता है । यह अनोखा नृत्य होता है राधारानी के ननिहाल कहे जाने वाले गांव मुखराई में, जिसका इतिहास हजारों साल पुराना है। ​मुखरा रानी और चरकुला का इतिहास ​मान्यता है कि द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण की प्रिया राधा रानी का जन्म हुआ, तो उनकी नानी 'मुखरा रानी' ने अपनी प्रसन्नता व्यक्त करने के लिए रथ के पहिए के ऊपर दीपक रखकर नृत्य किया था। तभी से इस परंपरा का नाम 'चरकुला' पड़ा। मुखराई गांव को राधा जी का ननिहाल माना जाता है, इसीलिए यहाँ इस नृत्य का विशेष महत्व है। ​साधना और संतुलन का संगम ​चरकुला नृत्य केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक कठिन साधना है। इसमें महिला नृत्यांगनाएं सिर पर 40 से 50 किलो वजन का लकड़ी का पिंजरा (चरकुला) रखती हैं, जिसमें 108 जलते हुए दीपक सजे होते हैं। ढोल और नगाड़ों की थाप पर भारी वजन के साथ संतुलन बनाकर किया जाने वाला यह नृत्य दर्शकों को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर देता है। ​भक्ति और लोक संस्कृति का अनूठा मेल ​कार्यक्रम के दौरान ब्रज के लोक गायकों ने होली के रसिया और भजनों की प्रस्तुति दी। स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि यह नृत्य विजय और उल्लास का प्रतीक है। मुखराई गांव में इस आयोजन को देखने के लिए न केवल ब्रज ही नहीं बल्कि देश-विदेश से भी पर्यटक और शोधकर्ता पहुँचते हैं।
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