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    पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार बोलीं मैंने भी छुआछूत झेला:पढ़ाई के दौरान मां ने तो शीर्ष पद पर रहते पिता भी नहीं बच पाए

    1 hour ago

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    “मैंने भी छुआछूत झेला है… पढ़ाई के दौरान मेरी मां ने सही, तो राजनीति में शीर्ष पद पर रहते हुए पिता भी नहीं बच पाए!” पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने बाबू जगजीवन राम की जयंती की पूर्व संध्या पर आयोजित समता दिवस कार्यक्रम में यह दर्द भरा संस्मरण सुनाया। उत्तर प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय पर आयोजित विचार गोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए मीरा कुमार ने कहा कि पिता की विरासत आज भी छुआछूत के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक है। नाना के साहस और मां के साथ हुई छूआछूत का जिक्र किया मीरा कुमार ने बताया, “मेरी ननिहाल कानपुर में है। मेरे नाना डॉ. वीरबल कानपुर के बहुत बड़े डॉक्टर थे। 1911 में जब प्लेग फैला, सब भाग गए, लेकिन वे नहीं भागे। वे कुएं में चूना डलवाते, मरने वालों की लाश दफन करवाते और बच गए लोगों का इलाज करवाते।” मेरी मां इंद्राणी देवी की स्कूली शिक्षा कानपुर में ही पूरी हुई थी। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद कॉलेज गईं तो वहां कहा गया- अछूत की लड़की को नहीं पढ़ाएंगे। मेरे पिता ने उन्हें लखनऊ भेज दिया। चार साल यहां हॉस्टल में रहकर मां ने उच्च शिक्षा पूरी की, लेकिन यहां भी उनके साथ छुआछूत का व्यवहार हुआ।” चेन्नई में स्वयं के साथ हुए छूआछूत का संस्मरण सुनाया मीरा कुमार ने स्वयं के साथ हुए छूआछूत का संस्मरण सुनाया। कहा कि मैं बाबू जी की बेटी हूं, फॉरेन सर्विस में रही हूं, कांग्रेस में इतने समय से हूं, फिर भी नहीं बच पाई। बताया- “मैं चेन्नई गई थी। वहां एक नेता ने अपने घर पर मुझे नाश्ते पर बुलाया। मेरे साथ चार और लोग भी थे। वहां पहुंचे तो अंदर से कुछ आवाज आ रही थी। मेरे साथ के लोग खड़े हो गए, बोले कि बहन, यहां से चलो, हम एक मिनट भी यहां नहीं रुकेंगे। अंदर कोई महिला बोल रही थी कि सब अछूत बैठे हैं। इन्हें खिलाने के बाद हमें सब प्लेट तोड़नी होगी। हम नहीं खाएंगे, मैंने कहा कि बैठ जाओ, और जगह तुम सुनते नहीं हो, तो वहां खा लेते हो। इतने प्रेम से बुलाकर कोई तुमको डोसा, हलुआ, इडली, सांभर खिला रहा है, तो खा लो। प्लेट भी वो अपनी तोड़ेंगे, तुम्हें क्यों चिंता हो रही है। ” अभी छूआछूत पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है। 1978 का बनारस कांड और रविदास मंदिर का जवाब मीरा कुमार ने 24 जनवरी 1978 की घटना का जिक्र करते हुए बताया कि “बाबू जी को बनारस में संपूर्णानंद की मूर्ति अनावरण के लिए बुलाया गया। अनावरण के दौरान वहां अपमानजनक व्यवहार हुआ, विरोध में नारेबाजी हुई। वे चुपचाप लौट आए। इस पर राज्यसभा-संसद में बहस हुई। निंदा प्रस्ताव पारित किया गया। लेकिन मेरे बाबू जी ने कुछ नहीं बोला। मेरी मां ने भी पूछा कि आप कुछ बोल क्यों नहीं रहे हैं? एक साल बाद 1979 मेरे बाबू जी ने मां से कहा कि बनारस वाली घटना का जवाब मैंने सोच लिया है। मां हैरान थी कि एक साल बाद जवाब सोचा। फिर पलट कर पूछा कि क्या जवाब सोचा है। बाबू जी ने जवाब दिया- मैंने गंगा तट पर जमीन खरीदी है, वहां बहुत बड़ा रविदास मंदिर बनाऊंगा। जो बनारस ने मुझे दिया, उसके बदले में मेरा यह भेंट है।” उन्होंने मंदिर का जिक्र करते हुए कहा, “इस मंदिर में उच्च विचारों की पूजा होती है। महान संतों की वाणी संगमरमर पर लिखी है। चारों कोनों में अलग-अलग धर्मों के प्रतीक- मंदिर, मस्जिद, चर्च, बौद्ध विहार सब बने हैं।” महिलाओं के लिए काशी विश्वनाथ मंदिर खोलने का प्रसंग भी सुनाया मीरा कुमार ने बताया कि आजादी के बाद मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश के लिए आंदोलन शुरू हुआ। इसे लेकर “बाबू जी मंदिर मुक्ति आंदोलन चला रहे थे। वे सद्भाव के साथ महिलाओं के लिए मंदिर खोल रहे थे। महिलाओं के लिए काशी विश्वनाथ मंदिर को भी खोलने बाबू जी बनारस पहुंच गए। कुछ लोग विरोध कर रहे थे। हालांकि उनकी संख्या बहुत कम थी। सुबह–सुबह बाबूजी के पास फोन आया कि क्या करें? विरोधियों ने मंदिर जाने वाली गलियों में घर की स्त्रियों को लेटा दिया है। उनको लांघ कर तो हम नहीं जा सकते हैं। बाबू जी ने कहा कि स्त्री का सम्मान करना, ईश्वर के दर्शन से बढ़कर है, लौट आओ।” “अभी बहुत कुछ करना बाकी है” अंत में मीरा कुमार ने सभा से सवाल किया, “अभी भी मुसीबत है, तकलीफ पहुंचती है। मैं जहां जाती हूं, दलित भाइयों से पूछती हूं- छुआछूत खत्म हुई? वे कहते हैं हां, हमने हैंडपंप अलग कर लिया। अभी बहुत कुछ करना बाकी है।” उन्होंने कांग्रेस के पुरोधाओं और युवा कार्यकर्ताओं से आह्वान किया, “आप आगे बढ़िए। इंकलाब लाइए। समाज को बदलिए। मेरा सच मीठा नहीं, कड़वा है।” उन्होंने सभा से सवाल किया, “क्या आप इस अधूरी लड़ाई को लड़ोगे?” भीड़ से ‘हां’ की गूंज सुनकर उन्होंने कहा, “फिर यही बाबू जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।” प्रो. रतनलाल ने जगजीवन राम की राजनीति पर रोशनी डाली मुख्य वक्ता प्रो. रतन लाल ने बाबू जगजीवन राम के राजनीतिक सफर पर रोशनी डाली और उनके द्वारा किए गए ऐतिहासिक कार्यों का जिक्र किया। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे बाबू जी की जीवनी को पढ़ें और उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारें। कार्यक्रम को कांग्रेस प्रभारी अविनाश पांडे, प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने भी संबोधित किया। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने अतिथियों के साथ बाबू जगजीवन राम के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। ---------------------- ये खबर भी पढ़ें- UP में 21 फीसदी दलित कितने बड़े गेमचेंजर?:सपा संविधान को मुद्दा बनाएगी; कांग्रेस बाबू जगजीवन राम के सहारे ‘मायावती ने दलितों का सिर्फ इस्तेमाल किया। फायदा उठाकर उसे छोड़ दिया। आज भी दलित और कमजोर तबका समाज के किनारे पड़ा है।’ - अजय राय, प्रदेश अध्यक्ष, कांग्रेस, डेट- 2 अप्रैल ‘अंबेडकर जयंती को हम गांव के स्तर पर मनाएंगे। संविधान पर जिस तरीके का संकट है, उस पर चर्चा करेंगे।’ - अखिलेश यादव, राष्ट्रीय अध्यक्ष, सपा, डेट- 3 अप्रैल इन दो बयानों से साफ है कि 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में 21% दलित वोटर कितने बड़े गेमचेंजर होंगे। पहले कांशीराम जयंती, अब जगजीवन राम और अम्बेडकर जयंती मनाकर कांग्रेस-सपा दलितों को साधने की तैयारी कर रही है। क्या कांग्रेस और सपा बसपा के वोट बैंक में सेंधमारी में कामयाब रहेगी? 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