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    पितृपक्ष पर आनंद घाट पर उमड़ी भीड़:पुरोहित ने बताया पितरों के श्राद्ध की तिथियों का महत्व, गूंजे मंत्र

    7 hours ago

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    उन्नाव। पितृपक्ष में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और तर्पण का सिलसिला जारी है। गंगा तटों पर बुधवार सुबह से ही श्रद्धालु स्नान और पिंडदान कर अपने पितरों को याद कर रहे हैं। शुक्लागंज के आनंद घाट और बालू घाट पर भी चौथे दिन श्रद्धालुओं ने गंगा स्नान के बाद विधि-विधान से श्राद्ध और तर्पण किया। घाट पुरोहित पंडित मकर्जध्वज तिवारी ने पितृपक्ष में अलग-अलग तिथियों के अनुसार श्राद्ध करने के विधान और उनके महत्व की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पितृपक्ष में जिस व्यक्ति के पितर की मृत्यु तिथि ज्ञात होती है, उसका श्राद्ध उसी तिथि के अनुसार किया जाता है। पितृपक्ष की चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी समेत अलग-अलग तिथियों पर संबंधित तिथि में दिवंगत हुए पूर्वजों का श्राद्ध करने की परंपरा है। ऐसे में परिवार के लोग अपने पूर्वज की मृत्यु तिथि के अनुसार गंगा तट या घर पर श्राद्ध कर्म करते हैं। पंडित मकर्जध्वज तिवारी के अनुसार कई बार परिवार के लोगों को अपने पूर्वज की मृत्यु की निश्चित तिथि की जानकारी नहीं होती है। ऐसी स्थिति में भी पितरों के श्राद्ध के लिए अलग-अलग विधान बताए गए हैं। उन्होंने बताया कि जिन माताओं की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती, उनका श्राद्ध पितृपक्ष की नौमी तिथि को करने की परंपरा है। वहीं जिन पिता या बुजुर्गों की मृत्यु तिथि मालूम नहीं होती, उनके लिए अमावस्या के दिन श्राद्ध करने का विधान बताया गया है। उन्होंने कहा कि पितृपक्ष में तिथि का विशेष महत्व माना गया है। जिन लोगों को अपने पितरों की तिथि पता है, वे उसी तिथि में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। वहीं तिथि की जानकारी नहीं होने पर निर्धारित तिथि पर श्राद्ध करने की परंपरा है। इसका उद्देश्य पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना और उनका स्मरण करना है। गंगा तटों पर पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए घाटों पर भी चहल-पहल बनी हुई है। लोग गंगा स्नान के बाद पुरोहितों के मार्गदर्शन में तर्पण और श्राद्ध कर्म कर रहे हैं। सुबह से ही घाटों पर धार्मिक अनुष्ठानों का सिलसिला जारी है।
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