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    Prabhasakshi NewsRoom: Balendra Shah के फैसले से India Nepal Border Trade पर मँडराया खतरा, सीमावर्ती क्षेत्रों में हो रहे प्रदर्शन

    3 hours from now

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    नेपाल की नई सरकार का एक फैसला अब सीमावर्ती इलाकों में मुश्किलों का सबब बन चुका है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के नेतृत्व में लागू की गई सख्त कस्टम ड्यूटी व्यवस्था ने भारत नेपाल की खुली सीमा पर दशकों से चले आ रहे रोजमर्रा के जीवन को झकझोर कर रख दिया है। महज सौ नेपाली रुपए से अधिक के सामान पर पांच से अस्सी प्रतिशत तक कर वसूली की कठोर नीति ने न केवल व्यापार की रफ्तार तोड़ी है बल्कि आम लोगों की जिंदगी भी महंगी और मुश्किल बना दी है।देखा जाये तो यह फैसला भले राजस्व बढ़ाने और अवैध आयात रोकने के नाम पर लिया गया हो, लेकिन जमीन पर इसका असर एक तरह की आर्थिक घेराबंदी जैसा दिख रहा है। सीमावर्ती बाजारों में जहां कभी नेपाल से आने वाले ग्राहकों की भीड़ उमड़ती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा है। धारचूला से लेकर दार्जिलिंग तक दुकानदारों की बिक्री तेजी से गिर गई है और रोज कमाने खाने वाले मजदूर, रिक्शा चालक और छोटे व्यापारी सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं।इसे भी पढ़ें: Nepal के PM Balen Shah का बड़ा एक्शन, University Campus से Political Unions को हटाने का दिया फरमानहम आपको बता दें कि सालों से नेपाल के सीमावर्ती जिलों के लोग भारत आकर राशन, दवाइयां, कपड़े, बर्तन और शादी ब्याह का सामान खरीदते रहे हैं। यह व्यवस्था केवल व्यापार नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्तों का भी हिस्सा रही है। लेकिन अब हर खरीदारी एक गणित बन गई है। सौ रुपए की सीमा पार करते ही जेब पर भारी बोझ पड़ता है, जिससे लोग या तो सामान कम खरीद रहे हैं या बिल्कुल खरीदारी से बच रहे हैं।सबसे ज्यादा गुस्सा इस बात को लेकर है कि यह नियम आम लोगों के लिए बेहद कठोर है। हवाई यात्रा में जहां व्यक्तिगत उपयोग के सामान पर राहत मिलती है, वहीं जमीनी सीमा पर रहने वाले गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए कोई छूट नहीं है। यही वजह है कि यह नीति सीधे तौर पर जनता विरोधी नजर आ रही है।नेपाल सरकार का दावा है कि भारतीय बाजारों से खरीदारी के कारण स्थानीय व्यापार प्रभावित हो रहा था और राजस्व में नुकसान हो रहा था। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस समस्या का समाधान इतनी कठोर नीति हो सकता है। नेपाल के विपक्षी दलों ने इसे असंवेदनशील और जनता विरोधी फैसला बताते हुए तुरंत वापस लेने की मांग की है। यहां तक कि सत्ताधारी दल के भीतर से भी इस फैसले को अव्यवहारिक कहा जा रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, सीमा पर अब हालात ऐसे हैं कि सुरक्षा बल लाउडस्पीकर पर ऐलान कर रहे हैं कि किसी को कोई छूट नहीं मिलेगी। चाहे आम नागरिक हो, सरकारी कर्मचारी या किसी संस्था से जुड़ा व्यक्ति, सभी को कर देना होगा। यह सख्ती लोगों के आक्रोश को और भड़का रही है। रिपोर्टों के मुताबिक, उत्तराखंड के बनबसा में व्यापारियों का कहना है कि कुछ ही दिनों में कारोबार आधा रह गया है। पहले जहां रोज लाखों रुपए का सामान नेपाल जाता था, अब वह प्रवाह तेजी से घट गया है। धारचूला और टनकपुर में भी यही हाल है। ग्राहक अब महीने भर का राशन लेने की बजाय थोड़ी थोड़ी खरीदारी कर रहे हैं या चेतावनी मिलने पर खाली हाथ लौट रहे हैं।उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रमुख सीमा बाजार भी इससे अछूते नहीं हैं। सोनौली, रुपईडीहा, जोगबनी और रक्सौल जैसे बाजारों में ग्राहकों की संख्या तेजी से घटी है। शादी के मौसम में जहां रौनक होनी चाहिए थी, वहां व्यापारी मायूस बैठे हैं। छोटे कस्बों और हाट बाजारों में भीड़ गायब हो चुकी है क्योंकि लोग लंबी कतारों, जांच और अतिरिक्त शुल्क से बचना चाहते हैं। स्थानीय दुकानदारों का कहना है कि सौ रुपए की सीमा आज के महंगाई भरे दौर में मजाक से कम नहीं है। एक किलो अच्छी चाय या कुछ बिस्कुट के पैकेट ही इस सीमा को पार कर जाते हैं। इसके बाद लोगों को घंटों लाइन में लगकर कर देना पड़ता है, जो आम आदमी के लिए बेहद थकाऊ और अपमानजनक अनुभव बन चुका है।उधर, राजनीतिक स्तर पर भी यह मुद्दा अब विस्फोटक रूप ले चुका है। नेपाल में कुछ नेताओं ने इसे अघोषित नाकेबंदी तक करार दिया है और चेतावनी दी है कि यदि यह फैसला वापस नहीं लिया गया तो पूरे सीमा क्षेत्र में बड़े स्तर पर आंदोलन होगा। यह विवाद केवल आर्थिक नहीं बल्कि दोनों देशों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्तों की कसौटी बनता जा रहा है।बहरहाल, स्पष्ट नजर आ रहा है कि यह नीति जमीन पर भारी असंतोष पैदा कर चुकी है। अगर नेपाल सरकार ने समय रहते इस फैसले की समीक्षा नहीं की, तो यह आग केवल बाजारों तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि राजनीतिक और सामाजिक तनाव का बड़ा कारण बन सकती है।
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