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    Prabhasakshi NewsRoom: France में Macron के खिलाफ विद्रोह! Marine Le Pen ने ठोकी राष्ट्रपति पद की दावेदारी, कई और यूरोपीय देशों में भारी बवाल

    1 day ago

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    फ्रांस में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के खिलाफ गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा है। महंगाई, आर्थिक बदहाली और सरकार से बढ़ती नाराजगी के बीच देश हिंसा और अराजकता की चपेट में है। जगह-जगह आगजनी, तोड़फोड़ और लूटपाट के बीच हजारों गिरफ्तारियां हो रही हैं। इसी उथल-पुथल ने राष्ट्रपति पद की दावेदार मरीन ले पेन को बड़ा सियासी मौका दे दिया है। उन्होंने मैदान में उतरकर कानून-व्यवस्था बहाल करने और फ्रांस को फिर मजबूत बनाने का दावा ठोक दिया है। उधर, फ्रांस से इटली, अल्बानिया, स्पेन और पुर्तगाल तक सड़कों पर उमड़ता जनाक्रोश बता रहा है कि यूरोप में संकट अब सिर्फ अर्थव्यवस्था का नहीं, सत्ता और सियासत का भी बन चुका है।फ्रांस में जनाक्रोश, हिंसा और सत्ता के सामने चुनौतीहम आपको बता दें कि सप्ताहांत में फ्रांस समेत कई यूरोपीय देशों में महंगाई, आर्थिक संकट और सरकार की नीतियों के खिलाफ बड़े प्रदर्शन हुए। फ्रांस में शनिवार को सड़कों पर उतरे लोगों की संख्या को लेकर सरकार और प्रदर्शन आयोजकों के आंकड़ों में बड़ा अंतर रहा। सरकार ने करीब 4.10 लाख लोगों के प्रदर्शन में शामिल होने की बात कही, जबकि आयोजकों के मुताबिक यह संख्या लगभग आठ लाख थी। प्रदर्शनों के दौरान देशभर में 1,300 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया।इसे भी पढ़ें: France Protests: नए उपद्रव की आशंका से Paris के प्रमुख संग्रहालय बंद, 70000 पुलिसकर्मी तैनातकई शहरों में प्रदर्शन हिंसक हो गए। पेरिस में पुलिस ने आंसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया, जबकि मार्सेई में सड़क पर अवरोधक जलाए गए और बोर्डो में दुकानों व इमारतों को नुकसान पहुंचाया गया। ल्योन में भी पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए आंसू गैस छोड़ी। इससे पहले हुए प्रदर्शनों के दौरान लिमोज के ऐतिहासिक सिटी हॉल और ल्योन के पर्यटन कार्यालय में आग लगा दी गई थी। मार्सेई में नगर प्रशासन की इमारत पर हमला हुआ, जबकि पेरिस में कई महंगी दुकानों में लूटपाट और वाहनों में आगजनी की घटनाएं हुईं।हालात पर काबू पाने के लिए सरकार ने करीब 70 हजार पुलिसकर्मियों को तैनात किया और कई शहरों में सख्त पाबंदियां लगाईं। अधिकारियों के मुताबिक, शनिवार को हुई झड़पों में 53 पुलिसकर्मी घायल हुए। सरकार ने हिंसा के लिए कट्टरपंथी प्रदर्शनकारियों को जिम्मेदार ठहराया, जबकि वामपंथी नेता जां-लुक मेलांशों ने पुलिस की कार्रवाई और मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाए। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि बढ़ते करों, महंगाई और आर्थिक दबाव ने आम लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। बेरोजगारी, गरीबी और भविष्य को लेकर चिंता से युवा भी परेशान हैं। लगातार बढ़ता यह असंतोष अब मैक्रों सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।ले पेन का दांव: अव्यवस्था को बनाया चुनावी मुद्दादूसरी ओर, फ्रांस में जारी अशांति के बीच दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपना अभियान शुरू करते हुए कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय आत्मविश्वास बहाल करने का वादा किया। उन्होंने आव्रजन पर सख्ती, सीमाओं पर नियंत्रण, विदेशी अपराधियों के निष्कासन और गिरोहों तथा मादक पदार्थों के कारोबार के खिलाफ कठोर कार्रवाई का संकल्प लिया।ले पेन ने आर्थिक मोर्चे पर कारोबारियों के लिए करों में कटौती, नौकरशाही घटाने, उद्योग और नवाचार को बढ़ावा देने तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता में निवेश का समर्थन किया। उन्होंने सेवानिवृत्ति की आयु में और वृद्धि का विरोध भी किया। हम आपको यह भी बता दें कि एक जनमत सर्वेक्षण में ले पेन को 32 से 33.5 प्रतिशत समर्थन के साथ आगे बताया गया, जबकि मेलांशों 17 प्रतिशत पर थे। हालांकि, ले पेन स्वयं यूरोपीय संसद की निधियों के गबन के मामले में दोषसिद्धि के बाद अपील कर रही हैं। उनकी पार्टी ने जॉर्डन बार्देला को दोबारा अध्यक्ष चुना है और उन्हें संभावित प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया है।इटली से अल्बानिया तक, सड़कों पर यूरोप का असंतोषउधर, यूरोप के दूसरे देशों में भी सप्ताहांत के प्रदर्शन सरकारों के लिए चेतावनी बनकर उभरे। इटली के मिलान, रोम, ट्यूरिन, नेपल्स, बोलोनिया और फ्लोरेंस में हजारों युवा सड़कों पर उतरे। कुछ स्थानों पर पत्थर, बोतलें और पटाखे फेंके गए। पुलिस के मुताबिक, आठ शहरों में नौ लोगों को गिरफ्तार किया गया और 371 लोगों को कुछ समय के लिए हिरासत में लिया गया, जिनमें 110 नाबालिग थे।प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने मिलान में 500 अतिरिक्त सैनिक भेजने और हिंसा में शामिल नाबालिगों के खिलाफ सख्त दंड का ऐलान किया। रोम में प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने कोलोसियम में घुसने की कोशिश की, जबकि एक अलग युद्ध-विरोधी मार्च के दौरान पुलिस से झड़प हुई। मेलोनी ने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए, लेकिन नागरिकों की सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता।वहीं अल्बानिया की राजधानी तिराना में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ छात्रों के नेतृत्व में प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री एदी रामा के इस्तीफे की मांग भी उठाई। पुलिस ने आंसू गैस, वाटर कैनन और रबर की गोलियों का इस्तेमाल किया। सरकारी इमारतों, बैंकों और दुकानों को निशाना बनाए जाने की खबरें आईं। सरकार के समर्थन से जुड़े एक महंगे तटीय विकास प्रोजेक्ट को लेकर पहले से ही असंतोष बना हुआ था।स्पेन और पुर्तगाल में पेंशन और मकानों का संकटइसके साथ ही स्पेन में हजारों पेंशनभोगियों और अन्य प्रदर्शनकारियों ने सार्वजनिक पेंशन व्यवस्था की सुरक्षा, महंगाई के अनुरूप पेंशन बढ़ाने और महिलाओं तथा पुरुषों के बीच पेंशन के अंतर को कम करने की मांग की। स्पेन में बढ़ती कीमतों के बीच आवास संकट भी बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। घरों की कीमतें और किराये आम लोगों की पहुंच से बाहर होते जा रहे हैं।उधर, पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में हजारों लोगों ने महंगे किराये और आवास की कमी के खिलाफ प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने रोसियो चौक पर 100 से अधिक तंबू लगाए, जिन्हें रविवार तड़के पुलिस ने हटा दिया। इस दौरान कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया और मामूली चोटें लगने की खबरें आईं। प्रदर्शनकारी उस प्रस्तावित कानून का विरोध कर रहे हैं, जिससे मकान मालिकों के लिए किरायेदारों को बेदखल करना आसान हो सकता है और नए किरायों पर लगी सीमाएं हट सकती हैं। हम आपको बता दें कि पुर्तगाल में 2017 के बाद से मकानों की कीमतें दोगुने से अधिक हो चुकी हैं और नए किरायों में भी लगभग इतनी ही वृद्धि दर्ज की गई है। बैंक ऑफ पुर्तगाल के अनुसार, देश में करीब तीन लाख मकानों की कमी है।आर्थिक संकट से राजनीतिक विस्फोट तकदेखा जाये तो यूरोप की सड़कों पर उठती आवाजों का संदेश स्पष्ट है। जनता केवल सरकारों के खिलाफ नाराजगी जाहिर नहीं कर रही, बल्कि वह अपने भविष्य, रोजगार, शिक्षा, आवास और आर्थिक सुरक्षा को लेकर जवाब मांग रही है। फ्रांस में मैक्रों विरोधी असंतोष के बीच ले पेन और मेलांशों जैसे नेताओं की राजनीतिक दावेदारी तेज होना इसी गहरे ध्रुवीकरण का संकेत है।बहरहाल, हिंसा और तोड़फोड़ को जनआक्रोश का पर्याय नहीं माना जा सकता। शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन आगजनी और लूटपाट आम नागरिकों की सुरक्षा तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाती हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि यूरोपीय सरकारों के समक्ष कानून-व्यवस्था बनाए रखना और आर्थिक-सामाजिक शिकायतों का ठोस समाधान करने की दोहरी चुनौती है। यदि इन शिकायतों और सवालों को केवल पुलिस कार्रवाई से दबाने की कोशिश हुई, तो मौजूदा असंतोष आने वाले चुनावों में सत्ता के समीकरण बदल सकता है।
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