Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    Prabhasakshi NewsRoom: Strait of Hormuz Crisis को लेकर 40 देशों ने किया गहरा मंथन, कूटनीति से समाधान निकालने की कोशिश

    2 hours from now

    1

    0

    पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य का बंद होना अब एक वैश्विक संकट का रूप ले चुका है। इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर रुकावट के कारण न केवल ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है बल्कि खाद्य और औषधि आपूर्ति पर भी गंभीर असर पड़ रहा है। इसी पृष्ठभूमि में ब्रिटेन की पहल पर चालीस से अधिक देशों ने एक उच्चस्तरीय बैठक में भाग लेकर इस संकट से निपटने के उपायों पर विचार किया।ब्रिटेन की विदेश मंत्री युवेट कूपर ने इस बैठक की अध्यक्षता करते हुए कहा कि ईरान द्वारा जलडमरूमध्य को बाधित करना वैश्विक अर्थव्यवस्था को बंधक बनाने जैसा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस स्थिति का असर केवल यूरोप तक सीमित नहीं है, बल्कि एशिया, अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों में भी ईंधन, उर्वरक और गैस की आपूर्ति प्रभावित हो रही है। इससे पेट्रोल की कीमतों, खाद्य लागत और आर्थिक स्थिरता पर व्यापक प्रभाव पड़ रहा है।इसे भी पढ़ें: ईरान के प्रतिशोध की आग में जलेगा अमेरिका! B1 पुल के विनाश के बाद Iran ने जारी की 8 खाड़ी पुलों की 'हिट-लिस्ट'हम आपको बता दें कि इस बैठक में भारत, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, इटली, कनाडा, जापान और खाड़ी देशों सहित कई देशों ने भाग लिया। इन देशों ने संयुक्त रूप से यह मांग की कि ईरान जलमार्ग को अवरुद्ध करने के प्रयास तुरंत बंद करे और अंतरराष्ट्रीय नौवहन को सुरक्षित बनाया जाए। हालांकि इस बैठक में अमेरिका शामिल नहीं हुआ, जिसने इस संघर्ष की शुरुआत की थी।बैठक में यह भी चर्चा हुई कि क्या संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से एक मानवीय समुद्री गलियारा बनाया जा सकता है ताकि गरीब देशों तक उर्वरक और आवश्यक वस्तुएं पहुंच सकें और खाद्य संकट को टाला जा सके। इसके अलावा अगले सप्ताह सैन्य स्तर पर भी चर्चा प्रस्तावित है, जिसमें समुद्री खदानों को हटाने और फंसे हुए जहाजों को निकालने की संभावनाओं पर विचार होगा।हम आपको बता दें कि इस संकट का सबसे बड़ा प्रभाव ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ा है। यह जलडमरूमध्य विश्व के तेल और गैस के बड़े हिस्से की आपूर्ति का मार्ग है। इसके बंद होने से ईंधन की कीमतों में तेजी आई है, जिससे परिवहन लागत बढ़ी है और इसका सीधा असर खाद्य आपूर्ति पर पड़ा है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो खाद्य मुद्रास्फीति दोगुनी हो सकती है।कृषि क्षेत्र भी इससे बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। उर्वरक और ईंधन की कीमतों में वृद्धि से किसानों की लागत बढ़ गई है। डेयरी और बागवानी क्षेत्रों में पहले से ही दबाव देखा जा रहा है। ग्रीनहाउस और पशुपालन इकाइयों में गैस आधारित ऊर्जा पर निर्भरता होने के कारण लागत और बढ़ रही है। इसके अलावा, ईरान से होने वाले कुछ महत्वपूर्ण खाद्य आयात भी प्रभावित हुए हैं। पिस्ता और केसर जैसी वस्तुओं की आपूर्ति में झटका लगा है, क्योंकि इनका वैश्विक उत्पादन बड़े पैमाने पर ईरान पर निर्भर है।औषधि क्षेत्र पर भी इसका असर दिखने लगा है। हालांकि अभी तक दवाओं की भारी कमी की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन कीमतों में वृद्धि संकेत दे रही है कि आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो रही है। दवाओं के उत्पादन में उपयोग होने वाले रसायनों की आपूर्ति में देरी और परिवहन बाधाओं के कारण भविष्य में स्थिति और गंभीर हो सकती है।उधर, भारत ने भी इस मुद्दे पर अपनी चिंता व्यक्त की है। ब्रिटेन द्वारा आयोजित बैठक में भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने भाग लेते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत इस संकट में अपने नाविकों को खोने वाला एकमात्र देश है, जिससे इस समस्या का मानवीय पक्ष भी उजागर होता है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार कम से कम तीन भारतीय नाविक होरमुज जलडमरूमध्य में हमलों का शिकार हुए। भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि समाधान युद्ध या टकराव में नहीं, बल्कि बातचीत और कूटनीति में है। लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि भारत अब केवल शांति की अपील तक सीमित नहीं रहना चाहता। वह अपने हितों की रक्षा के लिए सक्रिय रणनीतिक कदम उठा रहा है।विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भी इस मुद्दे पर भारत की स्थिति को दोहराते हुए कहा कि भारत लगातार ईरान और अन्य देशों के संपर्क में है ताकि भारतीय जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित की जा सके। उन्होंने बताया कि हाल के दिनों में छह भारतीय जहाज सुरक्षित रूप से इस मार्ग को पार कर चुके हैं, जो भारत की सक्रिय कूटनीति का नतीजा है।साथ ही फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी सैन्य कार्रवाई को अव्यावहारिक बताते हुए कहा है कि इस समस्या का समाधान केवल बातचीत के माध्यम से ही संभव है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के पास समुद्री मिसाइल, ड्रोन और खदानों जैसी क्षमताएं हैं, जिससे सैन्य हस्तक्षेप जोखिम भरा हो सकता है।बहरहाल, होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट अब केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ा गंभीर अंतरराष्ट्रीय संकट बन चुका है। इससे निपटने के लिए देशों के बीच समन्वित कूटनीतिक प्रयास और दीर्घकालिक रणनीति अत्यंत आवश्यक है।
    Click here to Read more
    Prev Article
    भीषण हमलों के बीच 40 हिज्बुल्लाह लड़ाके ढेर, आई खौफनाक तस्वीरें
    Next Article
    भास्कर अपडेट्स:जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल ने गांदरबल मुठभेड़ की मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए

    Related विदेश Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment