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    'राम मंदिर सरकार नहीं, संतों के पास रहे':कैलाशानंद गिरि बोले- सरकार सिर्फ निगरानी करे; मंदिर में सबसे पहला दान मैंने किया

    11 hours ago

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    श्रीपंचायती अखाड़ा निरंजनी (हरिद्वार) के पीठाधीश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि महाराज ने कहा कि श्रीराम मंदिर में अगर कोई गड़बड़ी हुई है तो दोषियों की बख्शा नहीं जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के रहते श्रीराम जन्मभूमि से जुड़े किसी भी मामले की सच्चाई सामने आएगी। कैलाशानंद गिरि बीते दिनों निजी दौरे पर लखनऊ पहुंचे। यहां उनसे दैनिक भास्कर ने विशेष बातचीत की। इस बातचीत में उन्होंने श्रीराम मंदिर ट्रस्ट की जवाबदेही, मंदिर प्रबंधन, अलीगंज अग्निकांड के साथ सावन में शिव साधना पर भी विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने यह भी कहा कि श्रीराम मंदिर सहित सभी प्रमुख मंदिर संतों के पास रहने चाहिए। हां, निगरानी सरकार करती रहे। पढ़िए बातचीत के अंश… पढ़िए सवाल-जवाब… सवाल- अयोध्या में श्रीरामलला के मंदिर के हालिया प्रकरण को लेकर आपका क्या कहना है? जवाब- देखिए, मुझे लगता है कि श्रीराम जन्मभूमि शिलापूजन से लेकर प्रतिष्ठा महोत्सव तक मैं उस पूरे कार्यक्रम का प्रमुख साक्षी रहा। जिस दिन प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव हुआ, मैं उस दिन भी वहां प्रधानमंत्रीजी के साथ प्रमुख रूप से उपस्थित था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लक्ष्य श्रीराम जन्मभूमि था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लक्ष्य काशी विश्वनाथ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लक्ष्य केदारनाथ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लक्ष्य बद्रीनाथ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लक्ष्य उज्जैन महाकाल लोक का लोकार्पण था। हमें लगता है कि अगर वहां कोई गड़बड़ी हुई है, तो उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथजी बहुत कर्मठ हैं। वह एक अच्छे शासक के रूप में स्थापित हैं। उनकी तरफ से जो SIT बनाई गई, मुझे लगता है उसकी जांच के माध्यम से हर चीज समाज के सामने प्रकट होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नवरत्नों में से एक रत्न नृपेंद्र मिश्राजी हैं। नृपेंद्र मिश्रा श्रीराम जन्मभूमि निर्माण समिति के चेयरमैन हैं। प्रधानमंत्री के साथ वह लंबे समय से हैं। खराब आदमी प्रतिष्ठित व्यक्ति के साथ नहीं रह सकता हमें लगता है, जिनको हम बहुत दिनों से जानते हैं। हमारे आश्रम में भी बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जो हमारे साथ बहुत समय से रहते हैं। कोई भी खराब आदमी किसी श्रेष्ठ व्यक्ति के साथ, बड़े व्यक्ति के साथ, प्रतिष्ठित व्यक्ति के साथ लंबे समय तक नहीं रह सकता। यह बात तो सत्य है। किसी संस्था में हो, चाहे वह सामाजिक हो, व्यावहारिक हो, आध्यात्मिक हो, राजनीतिक हो या मीडिया से संबंधित हो, मुझे लगता है कि कोई भी खराब व्यक्ति बहुत दिनों तक किसी संस्था में, किसी व्यक्ति के साथ नहीं रह सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नृपेंद्रजी हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश से लेकर गुजरात, गुजरात से लेकर भारत सरकार तक के कार्यकाल को नजदीक से देखा है, समझा है, जाना है। प्रधानमंत्री कोई गड़बड़ी कभी सहन नहीं करेंगे प्रधानमंत्री को नृपेंद्र मिश्रा के माध्यम से हर एक जानकारी दी गई होगी। प्रधानमंत्री की इस विषय पर योगीजी और नृपेंद्र मिश्रा से लगातार वार्ता हो रही होगी। क्योंकि प्रधानमंत्रीजी कदापि सहन नहीं करेंगे कि श्रीराम जन्मभूमि में किसी प्रकार की कोई गड़बड़ी हो, किसी प्रकार की कोई कमी हो। जब प्रधानमंत्री 11 दिनों का व्रत लेने जा रहे थे, तब भारत के श्रेष्ठ विद्वानों द्वारा जो नियमावली लिखी जा रही थी, उसमें मेरा भी उल्लेख हुआ। मेरे द्वारा कुछ नियमों में संशोधन और परिवर्तन भी हुआ। वह किसी एक राज्य का नहीं, किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि संपूर्ण सनातनियों की आस्था के केंद्र का निर्माण था। आस्था के देवता श्रीश्रीराम, सनातन धर्म की प्रत्यक्ष प्रतिमूर्ति हैं। केदारनाथ, बदरीविशालजी कॉरिडोर में करोड़ों लगा रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए मुझे लगता है कि काशी विश्वनाथ और श्रीराम जन्मभूमि अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। मैं उत्तराखंड में रहता हूं। केदारनाथजी और बदरीविशालजी के पास ही, बिल्कुल कॉरिडोर के साथ मेरा एक छोटा-सा आश्रम बन रहा है। प्रधानमंत्री लगभग 1500 से 2000 करोड़ रुपए वहां लगा रहे हैं। अब तो मुझे लगता है, भास्कर खुल्बे, जो बदरी-केदार निर्माण समिति के चेयरमैन हैं, वह भी नृपेंद्र जैसे ही हैं। अल्मोड़ा के रहने वाले हैं, हमारे उत्तराखंड के रहने वाले हैं। मुझे नहीं लगता कि इनके द्वारा जो सूचना प्रधानमंत्री को प्राप्त होगी, उसमें कहीं कोई कमी रह जाएगी। …और अगर कमी नहीं रही, तो प्रधानमंत्री निस्संदेह उसको पूरा करेंगे। जिसकी भावना, जिसकी इच्छा, जिसकी आवश्यकता समाज और सनातन युग को है। सवाल- अपने दिए हुए दान के बारे में ऐसी चीजें देख-सुनकर आमजनमानस की भावनाएं आहत हुई हैं? जवाब- जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया तो सबसे पहले हमारी तरफ से ₹11 लाख की धनराशि हमने भगवान श्रीराम के चरणों में अर्पित की। बड़े दिनेशजी, विश्व हिंदू परिषद के उस समय अंतरराष्ट्रीय संरक्षक थे और वर्तमान में भी अंतरराष्ट्रीय संरक्षक हैं। वह और चंपतराय जी दोनों हमसे बोले कि स्वामीजी, आप क्यों पैसे दे रहे हैं? मैंने कहा- देखो मैं भगवान शिव का सेवक हूं। शिव के आराध्य भगवान श्रीराम हैं। इससे अधिक मेरे पास कुछ नहीं है, पर मेरी तरफ से ₹11 लाख श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए मैं देता हूं। बड़े दिनेशजी ने कहा- नहीं, आपका पैसा नहीं चाहिए। मैंने पूछा- क्यों नहीं चाहिए? वह बोले- नहीं, आप नहीं देंगे। मैंने कहा- मेरा पैसा भगवती का है, महादेव का है। आप इस पैसे को रखिए। यह पैसा कुबेर का काम करेगा। …और कुबेर का काम उसने किया। मुझे लगता है, निस्संदेह आज देश के जनमानस, सनातनियों को पीड़ा है। वे आहत हैं। लेकिन, मुझे विश्वास है। मैं आपके माध्यम से पूरे देश और समाज को यह विश्वास दिलाना चाहता हूं कि नरेंद्र मोदीजी और योगी आदित्यनाथजी के रहते गड़बड़ी पर दंड मिलेगा। बिना किसी प्रशंसा के, बिना किसी मतलब के, तिलमात्र भी प्रशंसा किए बिना मैं यह बात कहना चाहूंगा कि श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के चंदे, दानपात्र या दान से जुड़े किसी भी प्रकरण में जो गड़बड़ी हुई है, निस्संदेह उसका पटाक्षेप होगा। उसकी स्पष्टता समाज के सामने आएगी और जो दोषी होगा, अगर कोई दोषी होगा, तो निस्संदेह उसे दंड मिलेगा। सवाल- नैतिकता के आधार पर जिम्मेदारों की तरफ से भी कोई पहल होनी चाहिए, जिससे उनकी निष्ठा बरकरार रहे? जवाब- मुझे लगता है कि जहां ट्रस्ट और ट्रस्टियों की बात आती है, वहां अभी तुरंत पद से इस्तीफा देना उचित नहीं होगा। मुझे लगता है कि मंदिर असुरक्षित जैसा महसूस होगा। अगर जांच में कोई बात आती है, तो प्रधानमंत्री और योगी जी के रहते जांच में किसी प्रकार की कोई सिफारिश नहीं होगी। जो स्पष्ट होगा, उसका स्पष्टीकरण जांच समिति इनके सामने रखेगी और उसके बाद अगर आवश्यकता होगी तो उन्हें इस्तीफा देना ही होगा। कोई भी हो लेकिन जब तक जांच पूरी न हो जाए और स्पष्ट न हो जाए कि दोषी कौन है, तब तक निर्णय नहीं होना चाहिए। हो सकता है हमारे बगल में कोई दोषी रहता हो और सजा मुझे मिल रही हो। अगर ऐसा समय आता है तो निस्संदेह मुझे लगता है कि वे पदमुक्त भी होंगे और होना भी चाहिए। लेकिन, जांच से पूर्व मुझे लगता है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ न्यास बहुत बड़ी संस्था है। आज दुनिया की सबसे बड़ी संस्थाओं में से एक बन गई है। इसलिए इतनी शीघ्र उसके पदाधिकारियों को पद से मुक्त करना शास्त्रीय दृष्टि से उचित नहीं होगा। सवाल- रुपए, सोना-चांदी के साथ दान में मिलीं वस्तुएं भी गायब हैं। किसी सिंडिकेट के तहत वहां यह सब हुआ है? जवाब- जो भी चांदी या सोना आया होगा, उसमें से बहुत-सी चांदी और सोना लगा भी है। बहुत सारे दरवाजों में चांदी लगाई गई है। पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि दरवाजों में लगी चांदी कहां से आई। कहीं वह दान में मिली चांदी तो नहीं लगी? अगर लगी है तो उसका मूल्यांकन होगा, उसका स्पष्टीकरण होगा। जो सोना लगा है, उसका भी स्पष्टीकरण होगा। मैंने पहले भी नृपेंद्र मिश्रा का नाम लिया। हो सकता है आज उनकी जगह कोई तीसरा, चौथा, पांचवां या कोई और व्यक्ति होता, जो प्रधानमंत्रीजी के साथ इतने लंबे समय से नहीं रहा होता, तो हमें कहीं-न-कहीं भय होता कि वह झूठ भी बोल सकता है। लेकिन, नृपेंद्र मिश्रा, भास्कर खुल्बे और संजय भावसार ये वे लोग हैं जो प्रधानमंत्री के अत्यंत करीबी हैं। ये कभी भी अपने राजा के सामने राजतंत्र को खराब नहीं होने देंगे। जैसा कहा गया है- "सचिव, वैद्य और गुरु यदि भयवश असत्य बोलें तो राज्य, धर्म और नीति तीनों का विनाश हो जाता है।" इसीलिए मैं इनके बारे में कह रहा हूं कि ये प्रधानमंत्री से कभी असत्य बात नहीं करेंगे। प्रधानमंत्री भी इनकी बातों पर विश्वास करके सत्यता के आधार पर जांच कराएंगे। रही बात श्रीराम जन्मभूमि की, तो वह सनातनियों की आस्था का मूल केंद्र है। अगर वहां कोई गड़बड़ी हुई है तो उसके बारे में हमें बहुत अधिक जानकारी नहीं है। हमने कभी दानपात्र के बारे में कोई बात नहीं की। हमने तो अपने ट्रस्ट के खाते से ₹11 लाख का चेक भगवान श्रीराम के चरणों में अर्पित किया। मैं कभी पूछने नहीं गया कि उन पैसों का क्या हुआ, क्योंकि वहां ₹11 लाख कोई विषय नहीं है। वहां तो ₹11 हजार करोड़ भी कम हैं। इसलिए मैं संपूर्ण सनातनियों को आश्वस्त करना चाहता हूं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ के रहते श्रीराम जन्मभूमि से जुड़ी किसी भी गड़बड़ी को नहीं छोड़ा जाएगा। सवाल- अनेक बड़े मंदिर और मठ हैं। दूसरे मंदिरों की व्यवस्थाओं को यहां (अयोध्या में) लागू किया जाना चाहिए? जवाब- आपने बिल्कुल सही बात कही। श्रीराम मंदिर के कारण आज अन्य मंदिरों और मठों पर भी प्रश्नचिह्न उठ सकता है। इसलिए केंद्र सरकार को एक बहुत सख्त नियमावली बनानी चाहिए, जिसमें राजसत्ता, धर्मसत्ता, न्यायपालिका और मीडिया इन चारों के प्रमुख लोगों को साक्षी बनाया जाए। श्रीराम जन्मभूमि वैष्णवों की है। काशी विश्वनाथ संन्यासियों का है। उज्जैन महाकाल शैव परंपरा का है। बदरीनाथ वैष्णवों का है और केदारनाथ संन्यासियों का। इन सभी प्रमुख धार्मिक स्थलों पर जब भी कोई बड़ा निर्णय हो, भारत के प्रमुख और निष्पक्ष लोगों को किसी न किसी रूप में उससे जोड़ा जाना चाहिए। हम जैसे संन्यासियों का एकमात्र उद्देश्य भगवान शिव और भगवती की सेवा है। हम बिना किसी अपेक्षा के गृहस्थों के घर जाते हैं, पूजा-पाठ करते हैं। कहीं दक्षिणा मिलती है, कहीं नहीं मिलती। जहां मिलती है, वहां भी उतने ही प्रसन्न रहते हैं और जहां नहीं मिलती, वहां भी उतने ही प्रसन्न रहते हैं। मंदिरों का संचालन सीधे सरकार के हाथ में न हो करीब डेढ़-दो महीने पहले गृह मंत्री के साथ मेरी लंबी चर्चा हुई थी। श्रीराम मंदिर और अनेक संतों के विषय में भी चर्चा हुई। मैंने उनसे भी यही कहा कि भारत के प्रमुख धार्मिक स्थलों पर वहां के स्थानीय अधिपतियों और कर्मठ संतों की भूमिका सुनिश्चित होनी चाहिए। मैं अभी परसों विश्व हिंदू परिषद के महामंत्री मिलिंद परांडे से भी यही बात कह रहा था कि केवल उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड ऐसे राज्य बचे हैं, जहां मंदिर पूरी तरह सरकार के अधीन नहीं हैं। मेरा मानना है कि मंदिर संतों के पास ही रहने चाहिए। सरकार निगरानी अवश्य करे कि कोई गड़बड़ी न हो, लेकिन मंदिरों का सीधा संचालन सरकार के हाथ में नहीं होना चाहिए। अगर आज हमारा आश्रम सरकार ले ले तो वहां प्रतिदिन हजारों लोगों का भोजन, गौशाला, गरीब ब्राह्मण बच्चों की शिक्षा, गरीब कन्याओं के विवाह और अनेक धार्मिक कार्य बंद हो जाएंगे। इसलिए सरकार अपनी भूमिका निगरानी तक रखे। श्रीराम जन्मभूमि प्राण प्रतिष्ठा में साधारण से साधारण लोगों को यजमान बनाया गया। वहां किसी जाति का भेद नहीं था। प्रधानमंत्री ने सबको साथ लेकर यह कार्य किया। भगवान श्रीराम ने भी जीवन भर सबको साथ रखा। इसलिए इन मठों से समाज और राष्ट्र निर्माण का कार्य होना चाहिए। जो भी दान या अनुदान आए, उसका कम-से-कम दस प्रतिशत समाज के कल्याण पर खर्च होना चाहिए। सवाल- अपने लखनऊ दौरे के विषय में बता दीजिए। कैसा शेड्यूल है आपका और क्या कोई विशेष प्रयोजन था यहां आने का? जवाब- लखनऊ में हमारे दो परिवार हैं। उनका गृह प्रवेश था, तो बुधवार (24 जून) को थोड़ी देर दोनों बच्चों के यहां हमें रहना था। यहां से हम लोगों को आज इंदौर जाना है। इंदौर से हमें उज्जैन जाना है। वहां बाबा महाकाल के दर्शन करने हैं। उसके बाद महादेव का पूजन करके वहां के सभी महात्माओं से मिलेंगे। फिर वहां से मुझे धार जाना है। धार के तारापुर में मेरी शिष्या सावित्री ठाकुरजी सुंदर-सा मंदिर बनवा रही हैं। उस मंदिर का शिलापूजन कर दिल्ली जाएंगे। सवाल- लखनऊ में बीते सोमवार हुए एक भीषण अग्निकांड में 15 लोगों की जान चली गई। इस पर आप कुछ कहेंगे? जवाब- सबसे पहले तो मैं महादेव से प्रार्थना करूंगा कि उनकी आत्मा को शांति मिले और उनके परिवार को दुख सहन करने की क्षमता भगवान प्रदान करें। यह अत्यंत ही वेदना-द्रवित दुख है और इस दुख का शमन करने के लिए कोई शब्द नहीं है। …क्योंकि जब हमें घटना की सूचना मिली। सोमवार की घटना थी, तो हमने सीएम आवास में किसी से बात की। योगीजी संयोग से आवास में नहीं थे, तो मैंने किसी प्रमुख जन से बात की। उन्होंने मुझे पूरी घटना बताई। मैंने कहा कि मैं महादेव से जरूर प्रार्थना करूंगा कि उनकी आत्मा को शांति मिले और ऐसी घटना दोबारा न हो, इसकी पुनरावृत्ति न हो। पर कुछ न कुछ कमियां रहती हैं और कुछ जो दैवी आपदा होती है। हमारे यहां इसे दैवी आपदा कहते हैं। "दैविक, भौतिक तापा, श्रीरामराज्य काहूहि न व्यापा।" क्योंकि लखनऊ लक्ष्मण की नगरी है, लक्ष्मणपुरी है। इस लक्ष्मणपुरी में सबकी रक्षा हो और सब संरक्षित रहें। सब सुरक्षित रहें और सब धर्मपरायण, अपनी-अपनी परंपराओं को मानने वाले लोग हैं। ईसाई भी हैं, सुन्नी भी हैं, सिख भी हैं, यहां बौद्ध भी हैं, क्रिश्चियन भी हैं, जैन भी हैं। यह सराहनीय है कि सभी धर्मों के लोग लखनऊ में रहते हैं। मैं केवल इतना कहूंगा कि जब मुझे इस घटना की सूचना मिली तो मुझे पता लगा कि मुख्यमंत्री इस घटना से बहुत द्रवित हैं और बहुत दुखी हैं। उनको बहुत आंतरिक दुख है। उन्होंने वह दुख आपके सामने प्रकट किया हो या अपने अंदर रखा हो, लेकिन मुझे लगता है कि इस पर वह जरूर कड़ी कार्रवाई करेंगे। अगर निर्माण में या भवन की देखरेख में कोई कमी रही होगी, तो जिन बच्चों की जान गई है...। निस्संदेह उनको वापस तो नहीं लाया जा सकता। लेकिन इसकी पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए योगी आदित्यनाथ जरूर कोई कड़ा कदम उठाएंगे। मेरी यही इच्छा है कि ऐसी पुनरावृत्ति दोबारा न हो। सवाल- सावन के लिए अपने संकल्प के बारे में और आम शिवभक्त के लिए उपासना की विधि बता सकते हैं? जवाब- हम यहां उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हैं और यह लक्ष्मण जी की लक्ष्मणपुरी है, लक्ष्मण की राजधानी है। यह बाबा विश्वनाथ की कृपा है उत्तर प्रदेश के ऊपर और बाबा विश्वनाथ जी से ही यह राज्य संरक्षित है। "गंगा तरंग रमणीय जटाकलापं, गौरी निरंतर विभूषित वामभागम्..." क्योंकि मैं हिमालय, केदार बाबा, बाबा विश्वनाथ और दीनबंधु दीनानाथ का उपासक हूं। मुझे महादेव की साधना करते हुए 37 वर्ष हो गए। इस जन्म में मेरा 50वां वर्ष चल रहा है और साधना का 38वां वर्ष आने वाला है। भगवान शिव की कठोर साधना तभी संभव हो पाती है जब हम लगभग 22, 23 और 24 तारीख के आसपास धीरे-धीरे जल और भोजन का त्याग करना प्रारंभ करते हैं। यदि अभी हम दिन में एक-दो लीटर पानी पी रहे होते हैं, तो उस समय हम 60 ml, 70 ml या 100 ml तक आ जाते हैं। फिर 28 और 29 तारीख को हम 10 से 15 ml पानी पर आ जाते हैं। 30 तारीख की सायंकाल तक हम केवल बूंदों पर आ जाते हैं। दो-दो, चार-चार बूंद पानी पीते हैं, जिससे कंठ में तरलता बनी रहे। 31 तारीख को सुबह 7 बजकर 36–40 मिनट के आसपास अपनी माई से मिलकर, उनसे प्रार्थना करके, भगवती के साथ बैठकर मां और बेटे की कुछ वार्ता होती है। एक महीने तक प्रतिदिन 19 से 22 घंटे साधना हम रोकर अपनी प्रार्थना प्रारंभ करते हैं और मां के चरणों में विनती करके स्वयं को भगवान की सेवा में समर्पित कर देते हैं। 31 तारीख को अधिकतम 8 बजे तक भगवान शिव के चरणों में सिद्धासन लगाकर बैठ जाते हैं। रात 11 बजकर 20 मिनट पर उठते हैं। प्रतिदिन इसी समय उठकर अपनी माई, कामराज गुरुजी और गंगा मैया के दर्शन और स्नान के लिए जाते हैं। लगभग 11 बजकर 36–40 मिनट पर गंगा जी पहुंचते हैं। 10 से 12 मिनट गंगा जी में पूजन और स्नान करते हैं। फिर हमारे शिष्य हमें उठाकर कक्ष में ले आते हैं। यह क्रम प्रतिदिन पूरे महीने 19 से 22 घंटे तक चलता रहता है। यह साधना सामान्य व्यक्ति के लिए इसलिए संभव नहीं है क्योंकि यह अत्यंत कठोर साधना है। महादेव ही साधना को पूर्ण कराते हैं और उन्हीं की कृपा से यह संभव होती है। हमारी पूजा बहुत विस्तृत होती है। उसमें प्रतिदिन 20 से 22 घंटे महादेव की साधना होती है। इसलिए सामान्य लोगों के लिए इसके लिए अभ्यास और महादेव की विशेष कृपा आवश्यक है। आमजन सावन में ऐसे करें साधना आपने बहुत अच्छा प्रश्न किया कि सामान्यजन क्या करें। सामान्यजनों के लिए तीन बातें महादेव को अत्यंत प्रिय हैं। सबसे पहली है- मानसिक पूजा। यदि बिल्वपत्र नहीं है, गंगाजल नहीं है, दूध, दही, घी, मधु, शक्कर, वस्त्र, फूल या अन्य पूजन सामग्री उपलब्ध नहीं है, तो भी कोई बात नहीं। आंखें बंद करें, हल्का-सा मुस्कुराएं, महादेव का ध्यान करें और अपने मन को उनके चरणों में समर्पित कर दें। शिव मानस पूजा में कुछ मंत्रों का स्मरण करें। "रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरम्..." "बिल्वपत्र रचितं पुष्पं च धूपं तथा दीपम्..." आंखें बंद करके इस स्तुति का स्मरण करें। इससे पूरी पूजा संपन्न हो जाती है। शास्त्रों ने इसे सबसे उत्तम पूजा कहा है। इससे बड़ी कोई पूजा नहीं है। दूसरी पूजा है- पंचोपचार। इसमें केवल गंगाजल, बिल्वपत्र, अक्षत, पुष्प और नमस्कार पर्याप्त हैं। यदि गंगाजल न हो, तो सामान्य जल में गंगा जी का आह्वान कर लें। "गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वति, नर्मदे सिंधु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।" इस मंत्र के द्वारा गंगाजी का आह्वान उस जल में किया जा सकता है। उसी जल से भगवान का स्नान कराएं। तीन बिल्वपत्र लेकर अर्पित करें। हम तो लगभग 30 हजार बिल्वपत्र महादेव को अर्पित करते हैं। प्रतिदिन लगभग 30 हजार के आसपास बिल्वपत्र अलग-अलग राज्यों से आते हैं। हमारे महादेव की सेवा के लिए जिन राज्यों में अच्छे बिल्वपत्र मिलते हैं, जैसे बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश के जंगल और हिमाचल के कुल्लू-मनाली के जंगल, वहां से सुंदर बिल्वपत्र लाए जाते हैं। हमारे 10, 20, 30, 40 लोग पूरे सावन इन जंगलों में रहते हैं। देखिए, हम तो महादेव के लिए पागल हैं। हमारा और कोई काम नहीं है। उन जंगलों में हमारे बच्चे रहते हैं और कोई ट्रेन से, कोई पैदल, कोई गाड़ी से बिल्वपत्र लेकर आता है। सामान्यजनों के लिए मैं आपके माध्यम से यही कहना चाहता हूं कि तीन बिल्वपत्र होते हैं और हर बिल्वपत्र में तीन पत्तियां होती हैं। भगवान शिव को इस तरह चढ़ाएं बिल्वपत्र बिल्वपत्र की तीनों पत्तियों पर श्रीराम नाम लिखें। तीनों पत्तियों पर तीन बार श्रीराम लिखकर महादेव को अर्पित करें। महादेव कहते हैं— "काशीवास, कालभैरव पूजन, कोटि कन्या महादान, एक बिल्वं शिवार्पणम्।" इस भाव और इस स्वरूप में यदि कोई बिल्वपत्र महादेव को अर्पित करता है तो भगवान कहते हैं कि उसे एक करोड़ कन्यादान के समान फल प्राप्त होता है। केवल एक बिल्वपत्र चढ़ाने से इतना बड़ा फल मिलता है। और यदि कोई बिल्वपत्र भी नहीं चढ़ा सकता, तो शास्त्र कहते हैं कि चढ़े हुए बिल्वपत्र का दर्शन कर लो या उसका स्पर्श कर लो। "दर्शनं बिल्वपत्रस्य, स्पर्शनं पापनाशनम्..." उसको देखने और छूने मात्र से भी व्यक्ति अघोर से अघोर पापों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। तीसरा मंत्र तीसरे बिल्वपत्र के लिए आता है— "त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रयायुधम्। त्रिजन्म पापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम्॥" श्रीराम नाम अंकित एक बिल्वपत्र महादेव को अर्पित करने से यदि तीन जन्मों तक भी हमसे ब्रह्महत्या जैसे महापाप हुए हों, तो भी हमें मुक्ति मिल जाती है। पुष्पों में चंपा और केतकी महादेव को प्रिय नहीं हैं। ये दोनों पुष्प महादेव को नहीं चढ़ाए जाते, वे इन्हें स्वीकार नहीं करते। इनके अलावा जितने भी सुगंधित और मौसमी फूल हैं, वे महादेव को प्रिय हैं। यह एक बहुत सूक्ष्म पूजा हुई। फिर एक विस्तृत पूजा होती है। हमारी पूजा सुबह से लेकर अगली सुबह तक चलती है और कभी पूरी होती ही नहीं। उसमें क्विंटलों फूल लगते हैं, टनों गंगाजल लगता है, टनों गुलाबजल लगता है, प्रतिदिन कई किलो चंदन लगता है। भगवान की अलग-अलग विधियों से पूजा होती है और हम परमात्मा को सबसे प्रिय वस्तु अर्पित करने का प्रयास करते हैं। लेकिन मैं इतना जरूर कहूंगा कि भगवान भोलेनाथ भोले-भाले, औढ़रदानी हैं। यदि कोई व्यक्ति भावपूर्वक नल के जल को भी गंगाजल मानकर एक लोटा अर्पित कर दे, तो महादेव उस पर भी कृपा कर देंगे, विशेषकर सावन में। ---------------------- ये खबर भी पढ़िए- राम मंदिर ट्रस्ट ने 4 जून को पकड़ी थी चोरी : चंपत राय झूठ बोलते रहे; 5 जून को आरोपी के घर मिला था रुपयों से भरा बैग अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावा चोरी की जानकारी ट्रस्ट महासचिव चंपत राय को पहले से ही थी, लेकिन उन्होंने आरोपियों पर समय रहते कार्रवाई नहीं की। बल्कि लोगों से झूठ बोलते रहे। बताया जा रहा है कि 4 जून को ट्रस्ट के पदाधिकारी को काउंटिंग रूम के टॉयलेट से नोटों के बंडल मिले थे। बंडल में करीब तीन से चार लाख रुपए थे। (पूरी खबर पढ़िए)
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