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    रणवीर सिंह ने कास्टिंग काउच का सामना किया:पिता ने घर-गाड़ी बेची, थिएटर में झाड़ू-पोंछा लगाया, धुरंधर से बॉलीवुड के बड़े स्टार बने

    2 hours ago

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    बचपन से अमिताभ बच्चन जैसा बनने का सपना देखने वाले रणवीर सिंह का सफर संघर्ष, जुनून और आत्मविश्वास की मिसाल है। फिल्मों में जगह बनाने के दौरान उन्हें कास्टिंग काउच का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने समझौता करने से इनकार कर दिया। स्ट्रगल के दिनों में वह पृथ्वी थिएटर में झाड़ू-पोंछा लगाने और छोटे-मोटे काम करते रहे। इस दौरान उनके पिता ने सपना पूरा करने के लिए घर और गाड़ी बेच दी। लंबी मेहनत के बाद उन्हें बैंड बाजा बारात से बॉलीवुड में डेब्यू मिला, जिससे उन्हें पहचान मिली। उतार-चढ़ाव के बाद धुरंधर ने उनके करियर को नई ऊंचाई पर पहुंचाया और उन्हें बड़ा स्टार बना दिया। आज की सक्सेस स्टोरी में आइए जानते हैं रणवीर सिंह के करियर और निजी जीवन से जुड़ी बातें। अमिताभ बच्चन जैसा बनना चाहता था रणवीर सिंह ने ABP के साथ बातचीत में बताया था- बचपन से ही मेरा सपना एक्टर बनने का था। मैं अमिताभ बच्चन जैसा बनना चाहता था। उनकी फिल्में जैसे शहंशाह, तूफान और अजूबा देखकर मुझे प्रेरणा मिलती थी। मैं छोटा और थोड़ा मोटा बच्चा था, लेकिन जब कोई पूछता कि बड़े होकर क्या बनोगे, तो मैं बिना सोचे कहता था-“हीरो बनूंगा।” मैं बाकी बच्चों की तरह बाहर खेलने नहीं जाता था। मैं घर में बैठकर वीसीआर पर फिल्में देखता था, म्यूजिक सुनता था और फिल्मी मैगजीन पढ़ता था। मेरी दादी ने मुझे सबसे ज्यादा प्रोत्साहित किया। वह मुझे अमिताभ बच्चन की फिल्में दिखाती थीं और कहती थीं कि तुझे बड़ा होकर इनके जैसा बनना है। वहीं से यह सपना पक्का हो गया। सात साल की उम्र में मैंने पहली बार गार्डन में परफॉर्म किया था। मैंने अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘हम’ के गाने ‘जुम्मा चुम्मा’ पर डांस किया था। वही मेरा पहला स्टेज अनुभव था। एडवरटाइजिंग कंपनी में कॉपीराइटर के तौर पर काम किया पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने एडवरटाइजिंग कंपनी में कॉपीराइटर के तौर पर काम किया, क्योंकि मुझे लिखने का शौक था। स्कूल में एक प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था, जिसमें हमें प्रोडक्ट के लिए विज्ञापन बनाना था और मैं पहले स्थान पर आया था। मुझे नाम और टैगलाइन सोचने में मजा आया, तभी लगा कि इसे प्रोफेशन बना सकता हूं। फिर पता चला कि यह काम करने वालों को कॉपीराइटर कहते हैं, इसलिए मैंने यह बनने का तय किया। कुछ दिन काम किया, लेकिन दिल नहीं लगा। उसके बाद मैं अमेरिका गया और वहां से एक्टिंग की पढ़ाई करके लौटा, ताकि बॉलीवुड में सपना पूरा कर सकूं। एक्टिंग क्लास में सिर्फ एक सीट बची थी मैं क्लासेस के लिए देर से रजिस्टर कर रहा था, इसलिए ज्यादातर क्लासेस भर चुकी थीं। सिर्फ एक क्लास ‘एक्टिंग वन’ में एक सीट बची थी। मैंने वही एडमिशन ले ली। पहले दिन प्रोफेसर ने कहा कि उन्हें यह नहीं जानना कि हम कौन हैं या कहां से आए हैं। हर स्टूडेंट को स्टेज पर जाकर गाना, डांस या कुछ और परफॉर्म करना होगा। मैं स्टेज पर गया और मेरे पास बस एक ही चीज थी- फिल्म “दीवार” का डायलॉग। चार-पांच साल से मैंने एक्टिंग नहीं की थी। कॉलेज और स्कूल में मुझे बेस्ट एक्टर के अवॉर्ड मिलते थे, लेकिन काफी समय से वो छूट गया था। फिर भी मैंने पूरी ईमानदारी और जज्बे के साथ डायलॉग बोला। क्लास में बैठे अमेरिकन स्टूडेंट्स को मेरी भाषा समझ नहीं आई, लेकिन मेरे इमोशन और एनर्जी ने उन्हें छू लिया। सबने रिएक्ट किया। उन्हें समझ नहीं आया मैं क्या कह रहा हूं, लेकिन कुछ तो था उस परफॉर्मेंस में। फिल्मी बैक ग्राउंड नहीं, फिर भी हीरो बनने की जिद चार साल अमेरिका में बिताने के बाद 2007 में मैं मुंबई लौट आया। वापस आते ही बचपन का सपना फिर जाग गया कि फिल्मों में हीरो बनना है। यह रास्ता आसान नहीं था, क्योंकि मेरा कोई फिल्मी बैकग्राउंड नहीं था, लेकिन मैंने ठान लिया था कि मुझे यही करना है। मैं मुंबई के बांद्रा इलाके में पला-बढ़ा हूं, जहां सलमान खान, आमिर खान और शाहरुख खान जैसे बड़े सितारे रहते हैं। लेकिन वहां रहना और उनके जैसा बनना अलग बातें हैं। संघर्ष के शुरुआती दिनों में शाद अली ने मेरा साथ दिया मेरे संघर्ष के शुरुआती दिनों में मेरे दोस्त शाद अली ने मेरा साथ दिया। उस समय वह अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘झूम बराबर झूम’ कर रहे थे और विज्ञापनों का निर्देशन भी कर रहे थे। मैंने उनसे नौकरी मांगी, तो उन्होंने मुझे असिस्टेंट डायरेक्टर रख लिया। मुझे लगा यह अच्छा मौका है, क्योंकि इससे मैं सेट पर जाकर एक्टर्स और कास्टिंग डायरेक्टर्स से मिल सकूंगा और इंडस्ट्री में पहचान बना सकूंगा। करीब डेढ़ साल तक मैंने असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम किया। इस दौरान मैंने क्राउड कंट्रोल, कास्टिंग और प्री-प्रोडक्शन जैसे कई काम किए। मैं पूरी तरह असिस्टेंट डायरेक्टर की तरह काम कर रहा था। असिस्टेंट डायरेक्टर की नौकरी छोड़ दी फिर मैंने बड़ा फैसला लिया और असिस्टेंट डायरेक्टर की नौकरी छोड़ दी। डेढ़ साल काम करने के बाद जब मैंने खुद को देखा, तो आंखों के नीचे काले घेरे थे और पेट भी निकल आया था। तब मुझे लगा कि इस हालत में मैं एक्टर नहीं बन पाऊंगा। इसके बाद मैंने पूरा ध्यान फिर से एक्टिंग पर लगाया। यूनिवर्सिटी में थिएटर की पढ़ाई की थी और कुछ नाटक किए थे, लेकिन वह बीच में छूट गया था। अब मैंने दोबारा एक्टिंग सीखनी शुरू की। मुझे लगा कि पश्चिमी ड्रामा की ट्रेनिंग मिल गई है, अब भारतीय एक्टिंग भी सीखनी चाहिए। इसलिए मैंने इंडियन एक्टिंग क्लासेस जॉइन कीं और स्टेज पर काम शुरू किया। शाद अली ने मुझे सलाह दी थी कि फिल्मों में आने से पहले थोड़ा ड्रामा और थिएटर करना चाहिए। उन्होंने कहा-“तेरी वेस्टर्न ट्रेनिंग हो गई है, अब थोड़ी देसी ट्रेनिंग ले ले।” उनकी बात मानकर मैंने किशोर नमित कपूर के एक्टिंग स्कूल में दाखिला लिया। मां की चिता पर रोना था वहां जो ट्रेनिंग मिली, वो काफी फिल्मी थी। पहले ही टेस्ट में सिचुएशन दी गई- “मां की चिता पर रोना।” अब सोचो, इससे ज्यादा फिल्मी क्या हो सकता है! रोते-रोते नीचे देखना और फिर ऊपर देखना, आंखों में अंगारे। पूरी तरह फिल्मी स्टाइल में एक्टिंग सिखाई जाती थी। मैं थोड़ा फ्रस्ट्रेट हो गया था। मैंने शाद को मैसेज किया- “यह कहां भेज दिया आपने? मेरी जो एक्टिंग है, वो भी खराब हो जाएगी।” लेकिन उन्होंने कहा- “शुरू किया है तो पूरा कर।” मैंने कोर्स पूरा किया, लेकिन लगा कि अब मुझे और रियल, हार्डकोर एक्टिंग सीखनी चाहिए। तभी मैंने तय किया कि थिएटर करना है। इसके बाद मैंने लंबा वक्त पृथ्वी थिएटर में बिताया। मैं रोज सुबह 8 बजे से पहले पहुंच जाता था और रात 11 बजे तक वहीं रहता था। मुझे हिंदी ड्रामा में काम करना था और मैं बाकी स्ट्रगलर्स की तरह वहीं डटा रहता था। मकरंद देशपांडे मुझे देखते ही निकल जाते थे उन दिनों मैं मकरंद देशपांडे के थिएटर ग्रुप में काम पाने की कोशिश कर रहा था। लेकिन जैसे ही मैं उनसे मिलने जाता, वो मुझे देखकर निकल जाते थे। शायद उन्हें पहले से पता चल जाता था कि कोई लड़का काम मांगने आने वाला है। फिर मैंने खुद ही रास्ता निकाला। पता चला कि उनके रिहर्सल सुबह 8 बजे शुरू होते हैं, तो मैं 7:30 बजे पहुंच जाता था। कमरे का ताला खोलता, फैन ऑन करता, झाड़ू लगाता और एक्टर्स के लिए चाय-नाश्ता लाता। रिहर्सल में दिव्या जगदाले, निवेदिता भट्टाचार्य और यशपाल शर्मा जैसे कलाकार काम कर रहे थे। मुझे देखकर सब हैरान थे और पूछते थे कि यह लड़का कौन है और किसने बुलाया है। मकरंद सर सोचते थे कि उनके असिस्टेंट ने बुलाया होगा, असिस्टेंट सोचता था कि मकरंद सर ने बुलाया होगा और बाकी लोग समझते थे कि कोई नया बंदा होगा। लेकिन सच यह था कि मैं खुद ही वहां पहुंच जाता था। एक्टर्स के लिए चाय-समोसे लाता था मैं चुपचाप बैठकर रिहर्सल देखता, एक्टर्स को क्यू देता, चाय-समोसे लाता और जब सब खत्म हो जाता, तो सफाई करता- झाड़ू लगाता, लाइट और फैन बंद करता। सेट तोड़ना, पेंटिंग करना, बढ़ई का काम, कारपेंटर, पेंटर, लोडर और सेट वर्कर जैसे कई काम किए। यही मेरे संघर्ष का सबसे कठिन दौर था। मैं उस समय थिएटर ग्रुप में नौकरी करता था। साल 2008 के आसपास मैं थिएटर में छोटे-मोटे रोल कर रहा था। पृथ्वी थिएटर में 1 साल 8 महीने बिताने के बाद मैंने फिल्मों में किस्मत आजमाने का फैसला किया। उस समय बॉलीवुड में स्ट्रगलर के लिए पोर्टफोलियो या बायोडाटा तैयार करना जरूरी होता है। पढ़ाई और स्ट्रगल के दौरान पिता ने घर-गाड़ी बेच दी मैं सिंधी परिवार में पैदा हुआ। मेरे पिता जगजीत सिंह भभनानी ने मेरे सपने के लिए बहुत कुछ दांव पर लगाया। मेरी पढ़ाई और स्ट्रगल के दौरान उन्हें बड़ा घर बेचना पड़ा। हम छोटे घर में शिफ्ट हो गए। उन्होंने अपनी कार बेच दी और बस में सफर करने लगे, सिर्फ इसलिए कि मैं एक दिन फिल्मों में सपना पूरा कर सकूं। मेरे पास पोर्टफोलियो बनवाने के लिए पैसे नहीं थे। फिर भी मैंने आठ महीने मेहनत करके अच्छा पोर्टफोलियो तैयार किया। मैंने बॉडी बनाई, ट्रेनर रखा और सप्लीमेंट्स लिए। यह सब मेरे पिता ने जैसे-तैसे मैनेज किया। मैं हर चीज में बेस्ट चाहता था, चाहे फोटोग्राफर, शूट या प्रिंटिंग हो। प्रिंटिंग के लिए मैं रात 12 बजे से सुबह 8 बजे तक बैठा रहता था, ताकि डिस्काउंट मिल सके। मैं हर पोर्टफोलियो खुद जाकर प्रिंट करवाता था। शुरुआत में मुझे फिल्मों में काम नहीं मिला, लेकिन टीवी से वीजे बनने और विज्ञापनों में मॉडलिंग के ऑफर आने लगे। लेकिन मैंने तय कर लिया था कि मुझे सिर्फ हीरो बनना है, इसलिए मैंने वे सारे ऑफर मना कर दिए। कास्टिंग काउच का सामना करना पड़ा मेरे स्कूल के एक दोस्त ने, जो खुद भी स्ट्रगल कर रहा था, मुझे एक आदमी से मिलवाया। उसने कहा कि वह काम दिला सकता है। मैंने उसे फोन किया, तो उसने शाम 8 बजे अंधेरी वाले घर आने को कहा। मैं वहां पहुंचा। अंदर जाते ही मुझे अजीब लगा। कमरा छोटा था और दीवारों पर भद्दी पेंटिंग्स और अटपटी बातें लिखी थीं। मैंने उसे पोर्टफोलियो दिया, लेकिन उसने ठीक से देखा नहीं और एक तरफ रख दिया। तभी मुझे समझ आ गया कि कुछ ठीक नहीं है। फिर उसने कहा कि मुझे स्मार्ट और सेक्सी बनना पड़ेगा, तभी आगे बढ़ पाऊंगा। इसके बाद वह गलत बातें करने लगा और मुझसे गलत मांगें करने लगा। तब मुझे साफ समझ आ गया कि यह सही जगह नहीं है। मैंने तुरंत मना किया और वहां से निकल गया। जाते समय उसका रिएक्शन ऐसा था जैसे मैं उसका दिल तोड़कर जा रहा हूं, लेकिन मुझे पता था कि मैंने सही फैसला लिया। लेकिन इंडस्ट्री में एंट्री आसान नहीं थी। 2006-2007 में रिसेशन था, फिल्में कम बन रही थीं, खासकर न्यू कमर्स के लिए। स्ट्रगलिंग एक्टर्स अपने रास्ते खोज रहे थे। मैं भी 8 महीने तक अलग-अलग जगहों पर ऑडिशन देता रहा। अली अब्बास जफर ने यशराज में एंट्री कराई फिर मेरे दोस्त अली अब्बास जफर ने मेरे लिए रास्ता बनाया। उस समय वे यशराज फिल्म्स में असिस्टेंट डायरेक्टर थे। बाद में उन्होंने मेरे साथ फिल्म ‘गुंडे’ भी बनाई। मैंने उनसे कहा कि वे मेरे लिए रास्ता बना दें। उन्होंने मेरा पोर्टफोलियो यशराज के वाइस प्रेसिडेंट अक्षय विधानी को दे दिया। मैंने बस यही चाहा था कि कोई मेरा ऑडिशन दिला दे, क्योंकि मुझे भरोसा था कि मौका मिला तो मैं खुद संभाल लूंगा। इसके बाद मैं यशराज की कास्टिंग डायरेक्टर शानू शर्मा से मिला। शानू ने 16 साल की उम्र में मेरा पार्टी में डांस देखकर कहा था कि तेरे में कुछ बात है। उस समय उन्हें भी नहीं पता था कि वे आगे चलकर कास्टिंग में आएंगी। उन्होंने मुझे मौका दिलाने में मदद की। फिर एक दिन उन्होंने मैसेज करके बताया कि आदित्य चोपड़ा मुझसे मिलना चाहते हैं। यह सुनकर मुझे यकीन नहीं हुआ, क्योंकि मैं सोचता था कि यशराज सिर्फ बड़े स्टार्स के साथ काम करता है। लेकिन उन्होंने कहा कि वे नए चेहरे को लॉन्च करना चाहते हैं और मुझे YRF के इन-हाउस कास्टिंग डिवीजन में ऑडिशन देना चाहिए। ऑडिशन में बार-बार नर्वस रहा था मैं गया, क्योंकि मुझे लगा यही वह मौका है जिसका मैं लंबे समय से इंतजार कर रहा था। शुरू में ऑडिशन मैंने अनुष्का शर्मा के साथ दिया। लेकिन बाद के ऑडिशनों में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाया, क्योंकि मैं नर्वस हो गया था। फिर आदित्य चोपड़ा ने बुलाकर कहा कि मैं पहली बार बहुत अच्छा लगा था, लेकिन बाद में कमजोर पड़ गया। ‘बैंड बाजा बारात’ के लिए चुन लिया गया फिर एक मीटिंग में उन्होंने बताया कि पहले ऑडिशन में ही उन्हें लगा था कि मेरे अंदर कुछ खास है। उन्होंने कहा कि वे मेरे लंबे करियर की संभावना देखते हैं और कुछ बातें याद रखने को कहा। यह सुनकर मैं भावुक हो गया। बाहर आकर रो पड़ा और मम्मी व शानू को फोन किया। आखिरकार मुझे ‘बैंड बाजा बारात’ के लिए चुन लिया गया। पहली ही फिल्म से धमाकेदार सफर शुरू हुआ बैंड बाजा बारात 2010 में रिलीज हुई थी। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल रही, लेकिन रणवीर सिंह के जोश और ऊर्जा से भरे अभिनय को दर्शकों और आलोचकों ने सराहा। इसी फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट मेल डेब्यू का अवॉर्ड मिला। इसके बाद उन्होंने लेडीज वर्सेस रिकी बहल और लूटेरा जैसी फिल्मों में अभिनय क्षमता दिखाई। खास तौर पर लूटेरा में उनके अभिनय और अंदाज की तारीफ हुई, हालांकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बड़ी हिट नहीं बन पाई। वर्सेटाइल एक्टर के रूप में स्थापित कर दिया 2013 में गोलियों की रासलीला: राम-लीला ने रणवीर के करियर को नई ऊंचाई दी। यह उनकी बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्मों में से एक थी। इस फिल्म में उनकी और दीपिका पादुकोण की केमिस्ट्री को दर्शकों ने पसंद किया और उनकी परफॉर्मेंस ने उन्हें वर्सेटाइल एक्टर के रूप में स्थापित कर दिया। इसके बाद उन्होंने बाजीराव मस्तानी और पद्मावत जैसी बड़ी फिल्मों में शानदार काम किया। इन फिल्मों ने कमाई के साथ आलोचनात्मक सराहना हासिल की। बार-बार खुद को साबित करने की कोशिश रणवीर का करियर हमेशा लगातार सफलता से भरा नहीं रहा। 2019 के बाद जयेशभाई जोरदार और सर्कस जैसी फिल्मों से उन्हें उतनी बॉक्स ऑफिस सफलता नहीं मिली, जितनी उम्मीद थी। आलोचना के बावजूद उन्होंने अलग-अलग किरदार निभाकर खुद को बार-बार साबित करने की कोशिश की। धुरंधर करियर की सबसे बड़ी हिट फिल्म बनी कुछ लोगों ने उनके अभिनय को कभी-कभी ओवर-द-टॉप कहा, लेकिन रणवीर ने इन आलोचनाओं को ताकत बनाया और अभिनय में बदलाव लाते रहे। 2025 में रिलीज हुई धुरंधर उनके करियर की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड तोड़ कमाई की। इसके बाद आई ‘धुरंधर: द रिवेंज’ ने भी उनकी सफलता को आगे बढ़ाया और जबरदस्त कमाई कर रही है। ____________________________________________ पिछले हफ्ते की सक्सेस स्टोरी पढ़िए... तापसी पन्नू बोलीं- फिल्में फ्लॉप हुईं, पनौती कहा गया:हीरोइन बनने पर संदेह था, कंटेंट-ड्रिवन फिल्मों से इंडस्ट्री में अपनी अलग जगह बनाई दिल्ली के एक साधारण परिवार से निकलकर इंजीनियरिंग करने वाली तापसी पन्नू ने कभी नहीं सोचा था कि वह ग्लैमर इंडस्ट्री में पहचान बनाएंगी। मॉडलिंग से शुरुआत कर उन्हें साउथ फिल्म इंडस्ट्री में मौका मिला, लेकिन वहां लंबे समय तक सिर्फ ग्लैमरस किरदारों तक सीमित रहीं। कई फिल्मों के फ्लॉप होने पर उन्हें पनौती कहा गया, जिससे आत्मविश्वास को गहरा झटका लगा।पूरी खबर पढ़ें..
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