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    सबको माफ करते हुए अब जाओ...हरीश को मिली आखिरी विदाई:गाजियाबाद से हरीश राणा को एम्स शिफ्ट किया गया, सुप्रीम कोर्ट ने इच्छा मृत्यु की मंजूरी दी है

    4 hours ago

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    ‘सबको माफ करते हुए और सबसे माफी मांगते हुए अब जाओ...ठीक है…’ यह बातें बहन कुमारी लवली ने उस हरीश राणा के माथा पर हाथ फेरते हुए कहा, जिसे सुप्रीप कोर्ट ने इच्छा मृत्यु की इजाजत दी है। उन्होंने हरीश के माथे पर चंदन का टीका भी लगाया। इस दौरान हरीश के परिवार के सभी सदस्यों की आंखें नम हो गईं। उसके पिता ने परिवार के सभी सदस्यों से माफी मांगी। बोले, न चाहते हुए भी यह कदम उठाना पड़ा है। गाजियाबाबद में 13 साल से कोमा में पड़े हरीश राणा को इच्छा मृत्यु के लिए दिल्ली के एम्स में शिफ्ट किया गया है। उसे वहां लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखकर मेडिकल टीम आगे का प्रोसेस पूरा करेगी। परिवार ने घर से एम्स तक शिफ्टिंग की पूरी प्रक्रिया को गोपनीय रखा। पड़ोसी और सोसायटी में रहने वालों को भनक तक नहीं लगी। राज एम्पायर सोसायटी के पदाधिकारियों को भी नहीं बताया गया। एक करीबी ने बताया कि प्राइवेट गाड़ी से परिवार के लोग उन्हें ले गए। हरीश पिछले 13 साल से कोमा में है। इलाज के बाद भी वह सही नहीं हो सका। उसके इलाज में परिवार की आर्थिक स्थिति बद से बदतर हो गई। मां, बहन और भाई भावुक होकर रोने लगे हरीश राणा को जब गाजियाबाद स्थित किराए के फ्लैट से एम्स ले जाया गया तो उस समय हरीश की मां, छोटा भाई और बहन भावुक हो गए। मां निर्मला राणा और पिता अशोक राणा ने कहा कि हम सबसे माफी मांगते हैं, ऊपर वाले ने यह सब हमें देखने के लिए दिया। हम यही चाहते हैं कि हमारा बेटा जहां भी रहे, जिस परलोक में रहे हमेशा हम उसे भूल नहीं पाएंगे। हमारे करीबियों, रिश्तेदारों, डॉक्टरों, कोर्ट में हमारी पैरवी करने वाले वकीलों और सभी ने हमारा बहुत सहयोग किया। हम सभी के इस सहयोग के आभारी रहेंगे। एम्स में शिफ्ट होने के बाद बहन देर शाम अपने फ्लैट पर आईं। भाई और परिवार के लोगों ने कुछ नहीं बताया। अब एम्स में आगे की पूरी प्रकिया के बार उनके लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाए जाएंगे। जिसके बाद इच्छा मृत्यू दी जाएगी। ब्रह्मकुमारी परिवार से जुड़ा राणा परिवार ब्रह्मकुमारी परिवार से जुड़े राणा परिवार ने अपना दर्द दीदी से साझा किया तो उन्होंने एक वकील भेजा। राणा कहते हैं, 'हाईकोर्ट ने तो हमारी याचिका खारिज ही कर दी थी, पर सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी देकर हरीश पर बड़ा उपकार किया। हमसे उसकी पीड़ा देखी नहीं जाती, बेबसी ये है कि वह बता भी नहीं पाता कि उसे कहां-क्या तकलीफ है। हमारा तो बच्चा है, सेवा कर रहे हैं और जब तक सामर्थ्य है करते ही रहेंगे। कोर्ट के फैसले के बाद एम्स ने सभी तैयारी कर ली है। बस हमें तय करना है कि उसे आखिरी बार इस बिस्तर से उठाकर कब एम्स ले चलें। हम तो इसे पैसिव यूथेनेशिया भी नहीं बोलना चाहते। हम इसे भगवान की गोद में छोड़ रहे है। हम उसे ऐसे अनुभवी डॉक्टरों के पास छोड़ रहे हैं जो उसे घातक इंजेक्शन नहीं देंगे। बल्कि प्राकृतिक रूप से जीवन छोड़ने का रास्ता सुगम करेंगे। एम्स में अनुभवी डॉक्टरों की निगरानी में सिर्फ फूड पाइप हटाएंगे। हम उसे पानी पिलाते रहेंगे, जैसे कोई व्रत करता है। जब हरीश प्राण त्याग देगा तो बहुत सम्मान से घर लाएंगे और उसे अंतिम विदाई देंगे। मां के नहीं सूख रहे आंसू हरीश की मां चुप हैं। एकदम भावशून्य चेहरा। न खुशी कि बच्चे को मुक्ति मिल रही है और न गम कि आखिरी घड़ी आ पहुंची। हालांकि, कुछ बोलते ही फफक पड़ती हैं... कौन मां-बाप अपने बच्चे को इस स्थिति में ले जाना चाहेगा। जिसे जन्म दिया, पाल-पोसकर बड़ा किया। फिर से अबोध की तरह उसकी देखभाल करनी पड़ी तो उसमें मां को कष्ट कैसा। दुख तो बस इस बात का रहा कि इसने तो अपनी पीड़ा भी नहीं बताई। सुबह-शाम जब उसकी मालिश करती तो मैं उसे घर के किस्से सुनाती आज क्या-क्या हुआ? कई बार घंटों तक बस इंतजार करती कि एक बार बस पलक झपके ताकि मुझे लगे कि उसने सब सुन लिया। कभी उबासी लेता, कभी छींक आती या आंखों के आसपास की त्वचा फड़कती तो हमें उसी से उसके जिंदा होने का सुकून होता था। पिता भावुक होकर बोले- यह हमारे परिवार के लिए बहुत कठिन फैसला सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पिता अशोक ने कहा, हम सुप्रीम कोर्ट गए थे। मैं माननीय न्यायाधीश का धन्यवाद करता हूं। अभिवक्ताओं और डॉक्टरों का भी आभार व्यक्त करता हूं। आज हमें वही फैसला मिला है, जिसकी हम उम्मीद कर रहे थे। मेरी उम्र 62 साल है और मेरी पत्नी करीब 60 साल की हैं। हमने अदालत का रुख तब किया था, जब हमें एहसास हुआ कि हमारे बेटे की स्थिति असाध्य और लाइलाज है। कोई भी माता-पिता अपने बेटे के लिए ऐसा नहीं चाहेंगे, लेकिन मजबूरी में हमें यह फैसला लेना पड़ा। हम पिछले तीन साल से इस मामले को लेकर अदालत में प्रयास कर रहे थे। अब उसे एम्स ले जाया जाएगा। हरीश कभी पंजाब यूनिवर्सिटी का टॉपर रहा है। अशोक राणा ने कहा- कोई भी माता-पिता अपने बेटे के लिए ऐसा नहीं चाहेंगे, लेकिन मजबूरी में हमें यह फैसला लेना पड़ा। उन्होंने बताया, कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया है कि इसे किसी भी तरह से "पैसिव यूथेनेशिया यानी सक्रिय इच्छामृत्यु" नहीं कहा जाना चाहिए। सक्रिय इच्छामृत्यु का मतलब- किसी व्यक्ति के जीवन को समाप्त करने के लिए जानलेवा इंजेक्शन देना है। AIIMS के बोर्ड ने हरीश को ब्रेन डेड घोषित किया था। उसे वर्तमान में जो जिंदा रखने के लिए बाहरी लाइफ सपोर्ट या इलाज दिया जा रहा है, उसे रोक दिया जाए या हटा लिया जाए, ताकि उसकी प्राकृतिक रूप से मौत हो सके। इसके बाद पार्थिव शरीर को पूरे सम्मान के साथ घर लाया जाएगा। हरीश इस हाल में कैसे पहुंचे, वजह जानिए… दिल्ली में जन्मे हरीश राणा चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी से बीटेक कर रहे थे। साल 2013 में आखिरी सेमेस्टर की पढ़ाई के दौरान हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए। हादसे के बाद उनके पूरे शरीर में लकवा मार गया और वह कोमा में चले गए। तब से न वह बोल पा रहे हैं और न ही किसी चीज को महसूस कर पा रहे हैं। डॉक्टरों ने हरीश को क्वाड्रिप्लेजिया नाम की गंभीर बीमारी से पीड़ित बताया है। इस स्थिति में मरीज पूरी तरह फीडिंग ट्यूब (खाने-पीने की नली) और वेंटिलेटर के सहारे जिंदा रहता है। डॉक्टरों के मुताबिक इसमें ठीक होने की संभावना लगभग नहीं होती। पिछले 13 साल से लगातार बिस्तर पर पड़े रहने की वजह से हरीश के शरीर पर बेडसोर्स यानी गहरे घाव भी हो गए हैं। समय के साथ उनकी हालत और ज्यादा बिगड़ती जा रही है। परिवार के लिए उन्हें ऐसे देखना मानसिक रूप से बेहद कठिन हो गया है। ------ यह खबर भी पढ़ें… सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार इच्छामृत्यु की इजाजत दी:13 साल से कोमा में है बेटा, माता-पिता ने लगाई थी गुहार सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इच्छामृत्यु मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने 13 साल से कोमा में रह रहे 31 साल के युवक हरीश राणा को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की मंजूरी दे दी। गाजियाबाद के रहने वाले हरीश लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर हैं। पूरी खबर पढ़ें
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