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    सुलतानपुर के नंदकिशोर ने मिट्टी को बनाया ‘सोना’:रोज 20 हजार कुल्हड़ उत्पादन, 50 लोगों को मिला रोजगार

    2 hours ago

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    सुलतानपुर के देहली बाजार में नंदकिशोर कनौजिया अपनी मेहनत और सोच के दम पर मिट्टी को सोने में बदलने का काम कर रहे हैं। उन्होंने गांव में एक कुल्हड़ यूनिट की शुरुआत की है। यह आज न केवल पर्यावरण संरक्षण का उदाहरण बन चुकी है, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का जरिया भी बन रही है। इस यूनिट में रोजाना करीब 20 हजार कुल्हड़ तैयार किए जाते हैं। नंदकिशोर का कहना है कि इस पहल को शुरू करने का मुख्य उद्देश्य प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल को कम करना और पर्यावरण को सुरक्षित रखना है। यहां तैयार होने वाले कुल्हड़ अयोध्या, अमेठी, सुलतानपुर और लखनऊ समेत कई जिलों में भेजे जा रहे हैं। खास बात यह है कि इस यूनिट में करीब 50 लोग काम कर रहे हैं, जिससे गांव के लोगों को अपने घर के पास ही रोजगार मिल रहा है और उनकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो रही है। ऐसे आया आइडिया नंद इंटरप्राइजेज कुल्हड़ फार्म के संस्थापक नंदकिशोर कनौजिया ने पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए यह पहल शुरू की। उनका कहना है कि कुल्हड़ फार्म बनाने का मकसद प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना और लोगों को इसके नुकसान के बारे में जागरूक करना है। उन्होंने बताया, “आजकल चाय और अन्य गर्म पेय प्लास्टिक के कप में देने का चलन बढ़ गया है, जो सेहत के लिए ठीक नहीं है। गर्म चीजें प्लास्टिक में डालने से हानिकारक केमिकल निकलते हैं, जो शरीर को नुकसान पहुंचा सकते हैं। साथ ही प्लास्टिक कचरा पर्यावरण को भी खराब करता है।” “कुल्हड़ यानी मिट्टी के बर्तन पूरी तरह सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल होते हैं। इन्हें इस्तेमाल करने के बाद ये आसानी से मिट्टी में मिल जाते हैं। उनका प्रयास है कि ज्यादा से ज्यादा लोग कुल्हड़ का इस्तेमाल करें। उन्होंने लोगों से प्लास्टिक छोड़कर मिट्टी के बर्तनों को अपनाने की अपील की।” चाय उद्योग के बारे में जुटाई जानकारी नंदकिशोर कनौजिया ने बताया कि कुल्हड़ फार्म शुरू करने की जानकारी उन्हें सोशल मीडिया के जरिए मिली। उन्होंने अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री और लोगों के अनुभव देखकर इस काम की शुरुआत करने का फैसला लिया। शुरुआत में गोरखपुर से कारीगर इंद्रजीत को बुलाकर काम शुरू कराया गया। बाद में धीरे-धीरे स्थानीय लोगों को भी इस काम के लिए तैयार किया गया, जिससे आसपास के लोगों को रोजगार मिलने लगा। वर्तमान में इस कुल्हड़ फार्म से करीब 50 महिलाओं को रोजगार मिला है। 20 लाख निवेश, रोज बन रहे 20 हजार कुल्हड़ एमडी रविंद्र यादव ने बताया कि शुरुआत में करीब 3 लाख रुपए की लागत से 10 लोगों के साथ इस काम को शुरू किया था। धीरे-धीरे उन्होंने इस व्यवसाय में 15 से 20 लाख रुपए तक निवेश किया। आज इस काम से करीब 50 लोगों को रोजगार मिल रहा है। उन्होंने कहा कि शुरुआत में उतार-चढ़ाव जरूर आए, लेकिन उसे नुकसान नहीं बल्कि सीख के रूप में लिया। पहले जहां प्रतिदिन 5 से 6 हजार कुल्हड़ बनते थे, वहीं अब यह संख्या बढ़कर 20 हजार प्रतिदिन हो गई है। तैयार कुल्हड़ अयोध्या, अमेठी, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर और लखनऊ समेत कई जिलों में भेजे जा रहे हैं। मशीनों से बढ़ी उत्पादन क्षमता नंदकिशोर ने बताया, “कुल्हड़ निर्माण को चुनने के पीछे मुख्य उद्देश्य पर्यावरण को प्लास्टिक के दुष्प्रभाव से बचाना है। शुरुआत में खुर्जा (बुलंदशहर) से मशीन मंगवाई गई थी, जिसमें चार इलेक्ट्रॉनिक सांचे लगे थे। अब इस इकाई में 14 इलेक्ट्रिक कुल्हड़ मशीनें और दो मिट्टी पिसाई मशीन चालू हैं। ऐसे तैयार होते हैं कुल्हड़ कारीगर इंद्रजीत के अनुसार, “एक सांचे की मदद से 5–6 मिनट में एक कुल्हड़ तैयार हो जाता है। एक सांचा दिन के करीब 8 घंटे में लगभग 1800 से 2000 कुल्हड़ बना सकता है। तैयार होने के बाद कुल्हड़ों को तुरंत इस्तेमाल नहीं किया जाता, बल्कि पहले उन्हें 15–20 मिनट तक धूप में सुखाया जाता है।” "इसके बाद इन्हें भट्ठी में रखा जाता है, जहां करीब 6–7 घंटे तक पकाया जाता है। इस प्रक्रिया से कुल्हड़ मजबूत और टिकाऊ बनते हैं। कुल्हड़ बनाने में चिकनी और काली मिट्टी का मिश्रण इस्तेमाल किया जाता है, जिससे कुल्हड़ न सिर्फ मजबूत होते हैं बल्कि देखने में भी आकर्षक लगते हैं।"
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