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    सुपीरियर अदालतों पर ऑनलाइन गालियां हद पार करती हैं:हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया यूजर्स को सख्त कंटेम्प्ट एक्शन की चेतावनी दी

    2 hours ago

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    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया यूजर्स को ज्यूडिशियरी पर ऑनलाइन गालियां न देने की चेतावनी दी, जो फेयर कमेंट या किसी फैसले की सोची-समझी आलोचना के बचाव से आगे जाती हैं। जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की बेंच ने कहा कि अगर कोर्ट अपने कंटेम्प्ट जूरिस्डिक्शन में ऐसे पोस्ट पर संज्ञान लेता है तो इसके सख्त कानूनी नतीजे होंगे। कोर्ट ने कहा, "हम लोगों को भविष्य में सावधान रहने की याद दिलाना चाहते हैं, क्योंकि सोशल मीडिया पर ऐसे शब्द सर्कुलेट होते हैं, जो बहुत साफ तौर पर अपमानजनक होते हैं। साथ ही, जब भी हमारे कंटेम्प्ट जूरिस्डिक्शन में संज्ञान लिया जाता है तो कंटेम्प्ट करने वाले को कानून की सज़ा मिल सकती है, जिसे कोर्ट लगाने में संकोच नहीं करेगा।" बोलने की आजादी के नाम पर क्रिमिनल कंटेम्प्ट कोर्ट ने यह टिप्पणी इस बात पर गहरी चिंता के साथ कही कि बोलने की आज़ादी की आड़ में क्रिमिनल कंटेम्प्ट के मामले आजकल "सोशल मीडिया पर बहुत ज़्यादा हैं"। बेंच ने कहा कि इस तरह के वर्चुअल गलत इस्तेमाल बोलने की आज़ादी की हद पार करते हैं। मामला बस्ती डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में वकील हरि नारायण पांडेय के व्यवहार से जुड़े कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट्स एक्ट, 1971 की धारा 15 के तहत क्रिमिनल कंटेम्प्ट रेफरेंस पर विचार कर रही थी। बस्ती के तत्कालीन सिविल जज सीनियर डिवीजन अमित मिश्रा ने हाईकोर्ट को सन्दर्भ अधिवक्ता हरिनारायण पांडेय के खिलाफ आपराधिक अवमानना कार्यवाही चला कर उन्हें दंडित करने को भेजा था। कोर्ट ने बिना शर्त माफी को मान लिया हालांकि कोर्ट ने आखिरकार पांडेय की बिना शर्त माफी मान ली, लेकिन उसने कहा कि बोलने की आज़ादी के नाम पर सोशल मीडिया पर क्रिमिनल कंटेम्प्ट के बहुत सारे मामले हैं, जो हद पार करते हैं। ये बातें कहने का मौका तब आया, जब हाईकोर्ट की ओर से पेश हुए वकील ने कहा कि क्रिमिनल कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट होना "रोज़मर्रा की बात" बन गई है। बेंच ने अपने आदेश में कहा कि हाईकोर्ट के वकील की चिंता निश्चित रूप से गलत नहीं थी और इसमें बहुत समझदारी थी। बेंच ने कहा कि हालांकि वह इस मुद्दे पर ज्यूडिशियल नोटिस नहीं ले रही है, क्योंकि इसके नतीजे होंगे, लेकिन वह सोशल मीडिया पर क्रिमिनल कंटेम्प्ट के बहुत सारे मामलों पर ज्यूडिशियल ध्यान दे रही है। कोर्ट ने साफ़-साफ़ कहा कि मीडिया पर की गई गाली-गलौज किसी भी तरह से सही कमेंट या किसी फ़ैसले की सोची-समझी आलोचना के दायरे में नहीं आ सकती। केस के मेरिट के बारे में बेंच ने कहा कि अवमानना ​​करने वाला बेंच के सामने पेश हुआ और उसने अपनी बातों को सही नहीं ठहराया और माना कि जिस दिन यह बुरी घटना हुई, उस दिन वह अपने ही कारणों से बहुत परेशान था।
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