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    उदन्त मार्तण्ड से AI तक:200 साल की हुई हिंदी पत्रकारिता, पर क्या आज भी बचा है 'गणेश शंकर विद्यार्थी' वाला जज्बा?

    10 hours ago

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    हिंदी पत्रकारिता ने अपने सफर के 200 साल पूरे कर लिए हैं। इस ऐतिहासिक पड़ाव पर शनिवार को सीएसजेएम यूनिवर्सिटी (CSJMU) में एक बड़ा मंथन हुआ। मौका था हिंदुस्तानी एकेडमी प्रयागराज और रामसहाय राजकीय महाविद्यालय द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का। विद्वानों ने दो टूक कहा कि आज संसाधन तो बढ़ गए हैं, लेकिन पत्रकारिता की वह पुरानी 'धमक' और 'असर' कहीं खो गया है। तकनीक के दौर में पत्रकारिता के सामने साख का संकट संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए सीएसजेएमयू के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक ने मौजूदा दौर की चुनौतियों पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि, आज के दौर में मीडिया के सामने बाजारवाद और तकनीक (AI) की बड़ी दीवार है। उन्होंने आगाह किया कि भविष्य में तकनीक तो बढ़ेगी, लेकिन अगर इसमें मानवीय संवेदनाएं और नैतिक मूल्य नहीं बचे, तो पत्रकारिता अपनी आत्मा खो देगी। पत्रकारिता का असली धर्म सत्य और निष्पक्षता ही रहना चाहिए। जब संसाधनों की कमी थी, तब पत्रकारिता ज्यादा प्रभावशाली थी भोपाल से आए पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने हिंदी पत्रकारिता की विकास यात्रा की तुलना करते हुए एक कड़वी सच्चाई सामने रखी। उन्होंने कहा कि जब 'उदन्त मार्तण्ड' शुरू हुआ था, तब साधन सीमित थे, संघर्ष बड़ा था, लेकिन उस समय की पत्रकारिता समाज को दिशा देती थी। आज हमारे पास हर तरह की डिजिटल सुविधा है, लेकिन समाज पर पत्रकारिता का प्रभाव पहले जैसा नहीं दिखता। वहीं, इतिहासकार अनूप कुमार शुक्ल ने कानपुर के गौरवशाली पत्रकारिता इतिहास को याद किया। उन्होंने बताया कि कैसे गणेश शंकर विद्यार्थी के 'प्रताप' ने देश में राष्ट्रीय चेतना जगाई थी। वह दौर त्याग और बलिदान का था, जिसने हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी। ग्राउंड जीरो की रिपोर्टिंग,1924 बनाम आज तकनीकी सत्र में वरिष्ठ पत्रकार फिरोज नकवी ने आज की 'सनसनीखेज' पत्रकारिता पर निशाना साधा। उन्होंने 1924 के दिल्ली दंगों का उदाहरण देते हुए बताया कि उस वक्त भगत सिंह ने ग्राउंड जीरो से जो रिपोर्टिंग की थी, उसका मकसद जनचेतना था, न कि आज की तरह टीआरपी (TRP) बटोरना। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि हिंदी पत्रकारिता का एक प्रामाणिक और मुकम्मल इतिहास अभी लिखा जाना बाकी है। महिलाओं का संघर्ष और ब्रिटिश पाबंदियां चर्चा के दौरान वरिष्ठ लेखक अरविंद कुमार सिंह ने बताया कि आजादी से पहले पत्रकारिता करना कितना जोखिम भरा था। ब्रिटिश हुकूमत ने 'प्रताप' जैसे अखबारों पर कई बार पाबंदियां लगाईं क्योंकि वे सच बोलने से नहीं डरते थे। उन्होंने पत्रकारिता में सरोजिनी नायडू और विजयलक्ष्मी पंडित जैसी महिलाओं के योगदान को भी याद किया, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी आवाज बुलंद रखी। दोपहर तक चले इस सत्र में शोधार्थियों ने 'क्रांतिकारी पत्रकारिता' पर अपने पर्चे पढ़े। अंत में सभी इस बात पर सहमत दिखे कि सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में भी पत्रकारिता की बुनियाद केवल 'विश्वसनीयता' पर ही टिकी रह सकती है। कार्यक्रम का संचालन डॉ. सुमन शुक्ला ने किया और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. आलोक पांडे ने दिया।
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