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    वेस्ट को मिल सकता है यूपी का तीसरा डिप्टी सीएम:भाजपा विधायक बोले- पश्चिम को अलग प्रदेश होना चाहिए, सीएम से मिलना आसान नहीं

    1 hour ago

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    यूपी में योगी मंत्रिमंडल 2.0 के विस्तार को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। पार्टी के अंदरखाने में संगठनात्मक फेरबदल की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है। माना जा रहा है कि भाजपा अगले एक महीने के अंदर प्रदेश संगठन की नई टीम घोषित कर सकती है, जिसमें जिला कमेटियों से लेकर क्षेत्रीय अध्यक्षों तक बड़े बदलाव संभव हैं। सूत्रों के मुताबिक मंत्रिमंडल विस्तार में कई मौजूदा मंत्रियों की छुट्टी हो सकती है। विधानसभा चुनाव और पंचायत चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा नए सामाजिक समीकरणों के आधार पर टीम को संतुलित करने की तैयारी में है। संभावना जताई जा रही है कि करीब 15 विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों को मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि पार्टी तीसरे डिप्टी सीएम पद पर भी फैसला ले सकती है। माना जा रहा है कि पूर्वांचल के प्रभाव को संतुलित करने के लिए पश्चिमी यूपी से किसी नेता को राज्य का तीसरा उपमुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। इसके साथ ही ब्राह्मण वर्ग की नाराजगी को साधने के लिए भाजपा पश्चिमी यूपी की संगठनात्मक कमान किसी ब्राह्मण चेहरे को सौंपने पर भी विचार कर रही है। अब आइए समझते हैं कि बीजेपी पश्चिमी यूपी से अपना तीसरा डिप्टी सीएम क्यों बना सकती है? पढ़िए पूरी रिपोर्ट… पहले जानिए पार्टी में अभी की क्या स्थिति है? पहले पार्टी की मौजूदा स्थिति पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश की सत्ता और संगठन दोनों में पूर्वांचल का प्रभाव ज्यादा है। वर्तमान में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी तीनों पूर्वांचल क्षेत्र से आते हैं। ऐसे में सरकार और संगठन दोनों का पावर सेंटर पूर्वांचल में सिमटा हुआ माना जा रहा है। हालांकि, दूसरे उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक अवध क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, फिर भी पश्चिम और ब्रज क्षेत्र के लोग खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। इसी कड़ी में भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए पश्चिम उत्तर प्रदेश में बड़ा राजनीतिक संतुलन साधने की तैयारी में जुटी है। क्षेत्रीय और जातीय असंतुलन के उठते सवालों के बीच पार्टी सोशल इंजीनियरिंग के जरिए पश्चिम को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी के सामने एक चुनौती यह भी मानी जा रही है कि पश्चिम यूपी में ऐसे प्रभावशाली नेताओं की कमी महसूस की जा रही है, जो नौकरशाही के सामने मजबूती से अपनी बात रख सकें और उसे मनवा सकें। पहले भूपेंद्र चौधरी के प्रदेश अध्यक्ष रहने के दौरान पश्चिम संगठन का अहम केंद्र था, लेकिन अब वह स्थिति नहीं रही। पार्टी सूत्रों का कहना है कि ऐसी परिस्थितियों में पश्चिम और अवध को राजनीतिक रूप से सशक्त करने की तैयारी की जा रही है। इसी कड़ी में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी को भी कोई बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है। पश्चिम यूपी को नहीं मिलती पर्याप्त तवज्जो एक भाजपा विधायक ने बिना नाम छापे की शर्त पर दैनिक भास्कर से कहा- हर छोटी-मोटी बात के लिए लखनऊ जाना संभव नहीं है। वहां भी मुख्यमंत्री से मिलना आसान नहीं होता। पश्चिम यूपी में नौकरशाही विधायकों को इसलिए महत्व नहीं देती, क्योंकि यहां ऐसे नेता नहीं हैं जो सीधे फोन पर मुख्यमंत्री से मुद्दा रख सकें। जबकि पूर्वी यूपी में ऐसे नेता पर्याप्त हैं। इसलिए अब जरूरी है कि पश्चिम को उसका उचित हक मिले। पश्चिम यूपी बने अलग प्रदेश दूसरे भाजपा विधायक ने दैनिक भास्कर से कहा- कायदे में तो पश्चिम यूपी को एक अलग प्रदेश होना चाहिए। यहां का कुल रेवेन्यू पूर्वी यूपी पर खर्च हो रहा है। अगर अगले दो महीने में स्थिति नहीं बदली, तो मैं पश्चिम उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने का मुद्दा पार्टी के मंच और सार्वजनिक रूप से उठाना शुरू करूंगा। पश्चिम के रेवेन्यू पर पहला अधिकार खुद पश्चिम का होना चाहिए, लेकिन इसके बावजूद इसे राजनीतिक रूप से उपेक्षित किया जा रहा है। 2 ब्राह्मण नेता बनेंगे क्षेत्रीय अध्यक्ष वहीं, प्रदेश में ब्राह्मणों के बढ़ते आक्रोश को शांत करने के लिए भाजपा पश्चिम यूपी यानी जाट लैंड की बागडोर किसी ब्राह्मण नेता के हाथों में सौंप सकती है। एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने बताया- पार्टी यूपी के 6 क्षेत्रों में से दो क्षेत्रों में ब्राह्मण क्षेत्रीय अध्यक्ष नियुक्त कर सकती है। पश्चिम यूपी की संगठनात्मक जिम्मेदारी किसी ब्राह्मण नेता को सौंपना लगभग तय माना जा रहा है, जबकि इस बारे में कई नामों पर चर्चाएं हैं। ……………..
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