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    सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को निर्देश, प्रदर्शन के नाम पर Delhi Metro और ट्रेन सेवाएं पूरी तरह न रोकें

    नयी दिल्ली, नौ अक्टूबर उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को केंद्र को निर्देश दिया कि 10 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के विरोध प्रदर्शन के कारण मेट्रो और दिल्ली आने वाली ट्रेन की आवाजाही पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जाए। अदालत ने कहा कि सब कुछ ठप नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि भले ही कानून लागू करने वाली एजेंसियों को अनियंत्रित गतिविधियों को रोकने के लिए कदम उठाने का अधिकार है, लेकिन नागरिकों को बेवजह परेशान नहीं किया जाना चाहिए।प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के मद्देनजर 57 मेट्रो स्टेशन बंद किए जाने और दिल्ली आने वाली ट्रेन को रद्द करने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। निर्वाचन आयोग के कामकाज में कथित अनियमितताओं को लेकर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कॉजपा और कुछ छात्र संगठनों ने प्रदर्शन का आह्वान किया है। पीठ ने कहा, ‘‘हमारे सामने एकमात्र मुद्दा यह है कि क्या कुछ स्टेशनों से मेट्रो ट्रेन और रेल सेवाओं को पूरी तरह बंद करने के फैसले पर फिर से विचार करने की जरूरत है।’’ पीठ ने केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि मेट्रो और अन्य ट्रेन की आवाजाही पर पूरी तरह रोक लगाने और उसे नियंत्रित करने में अंतर है।पीठ ने कहा कि सॉलिसिटर जनरल ने अधिकारियों से प्रतिबंध के फैसले पर फिर से विचार करने और मेट्रो ट्रेन तथा अन्य रेल सेवाओं को उचित नियमन के साथ चलने की अनुमति देने का आग्रह करने पर सहमति जताई है, ताकि लोगों को किसी तरह की असुविधा न हो। अदालत में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल के नेतृत्व में कई वरिष्ठ वकीलों की दलीलें सुनने के बाद प्रधान न्यायाधीश ने आदेश दिया, ‘‘इस आश्वासन के मद्देनजर हम स्पष्ट करते हैं कि मेट्रो ट्रेन की आवाजाही पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जाएगी।’’ प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि संभावित खतरे से निपटने के लिए लगाई जाने वाली पाबंदियां जरूरत से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘आपको कुछ चीज़ों को रोकना होगा।उन्हें रोकने के लिए सिर्फ़ उतनी ही कार्रवाई करें जितनी जरूरी हो।’’ साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि एहतियाती कार्रवाई से लोगों की आवाजाही पूरी तरह नहीं रुकनी चाहिए। पीठ ने केंद्र को निर्देश दिया कि मेट्रो ट्रेन और अन्य रेल सेवाओं की आवाजाही के संबंध में अधिकारियों द्वारा लिए गए फैसले का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए। पीठ ने केंद्र से कहा कि वह उचित तरीके से फैसले ले, ताकि यह पक्का किया जा सके कि ‘‘आम जनता को होने वाली परेशानी कम से कम हो।’’ सुनवाई के दौरान पीठ ने दिल्ली मेट्रो के कई स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार बंद किए जाने तथा ट्रेन को रद्द किए जाने पर गंभीर चिंता जताई।पीठ ने कहा, ‘‘मक्खी मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।’’ पीठ ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानून लागू कराने वाली एजेंसियों को एहतियाती कदम उठाने का अधिकार है, लेकिन ये कदम खतरे के अनुपात में होने चाहिए और आम नागरिकों को बेवजह परेशानी नहीं होनी चाहिए। प्रधान न्यायाधीश ने सुनवाई की शुरुआत में सॉलिसिटर जनरल मेहता से कहा, ‘‘हमारी मुख्य चिंता इन मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश द्वार पूरी तरह बंद किए जाने को लेकर है। हमें इस पर गंभीर चिंता है।’’ अदालत ने कहा कि उसकी चिंता प्रदर्शनकारियों या किसी व्यक्ति विशेष को लेकर नहीं, बल्कि उन हजारों यात्रियों को लेकर है, जो काम, शिक्षा और अन्य जरूरी कार्यों के लिए गुरुग्राम, ग्रेटर नोएडा और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के अन्य हिस्सों से हर दिन दिल्ली आते जाते हैं।प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘इनमें छात्र, कर्मचारी और बुजुर्ग शामिल हैं, जो सार्वजनिक परिवहन से सफर करते हैं। हम इस शहर के आम नागरिकों की ओर से बात कर रहे हैं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हर किसी के पास कार नहीं है और न ही सभी के पास निजी वाहन की सुविधा है। लोग सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर हैं।ऐसा नहीं किया जा सकता।’’ शुरुआत में सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि परामर्श में कुछ मेट्रो स्टेशनों से गुजरने वाली ट्रेन की संख्या कम करने की बात कही गई थी, न कि उन्हें पूरी तरह बंद करने की। हालांकि, जब सॉलिसिटर जनरल ने उस प्रावधान को पढ़कर सुनाया, जिसमें कहा गया था कि शनिवार सुबह नौ बजे से स्थिति सामान्य होने तक चिह्नित मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार बंद रहेंगे, तो पीठ ने इस विरोधाभास पर सवाल उठाया। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि जब उसी परामर्श में ट्रेन की आवाजाही की आवृत्ति कम करने का जिक्र है, तो ऐसे कदम को स्वीकार करना मुश्किल होगा।प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि अदालत के कर्मचारियों, क्लर्कों, कैंटीन कर्मियों और अन्य कर्मचारियों को अपने कार्यस्थल तक पहुंचने में परेशानी हो सकती है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों के पास निजी वाहन नहीं हैं, उन्हें विशेष रूप से मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। मेहता ने अदालत को आश्वासन दिया कि वह सरकार से विचार-विमर्श करेंगे और बदलती स्थिति को देखते हुए प्रतिबंधों को नियंत्रित करने के साथ-साथ समय-समय पर उनकी समीक्षा भी की जा सकती है।प्रधान न्यायाधीश ने अधिकारियों से सड़कों को बंद करने और बैरिकेड लगाने के फैसले की भी समीक्षा करने को कहा। उन्होंने निर्देश दिया कि उन क्षेत्रों की पहचान की जाए, जहां प्रतिबंध लगाना वास्तव में जरूरी है और जहां तक संभव हो, यातायात का निर्बाध प्रवाह सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने का मतलब लोगों की सुरक्षा करना है, न कि केवल सरकारी संपत्ति की रक्षा करना।उन्होंने कहा कि अधिकारियों को सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों की जरूरतों का भी ध्यान रखना चाहिए। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘नागरिकों को बेवजह परेशान नहीं किया जाना चाहिए। हम बस इतना ही चाहते हैं।’’ वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने भी शहर भर में बड़े पैमाने पर बैरिकेड लगाए जाने पर चिंता जताते हुए कहा कि निजी वाहनों से यात्रा करने वाले लोगों को भी दिल्ली के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाने से रोका जा रहा है।मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) महासचिव एम. ए. बेबी की ओर से पेश हुए सिब्बल ने रेल सेवाओं पर प्रस्तावित प्रतिबंधों का मुद्दा भी उठाया। सुनवाई के दौरान एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस के जवान लोगों को प्रदर्शन में शामिल होने से हतोत्साहित करने के लिए मस्जिदों में गए थे। उन्होंने कहा कि ये आरोप शपथपत्र पर लगाए गए हैं और इस संबंध में अदालत में पेश की गई एक तस्वीर तथा वीडियो का भी हवाला दिया।मेहता ने यह मुद्दा उठाए जाने के तरीके पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यह न्याय पाने की वास्तविक कोशिश के बजाय लोगों को भड़काने का प्रयास है। हालांकि, प्रधान न्यायाधीश ने संबंधित अधिकारियों का पक्ष सुने बिना आरोपों पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। पीठ की ओर से जताई गई चिंताओं पर जवाब देते हुए मेहता ने कहा कि सरकार प्रतिबंधों की समीक्षा करेगी।हालांकि, उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था की पृष्ठभूमि स्पष्ट करने की कोशिश की।

    Supreme Court का Kerala को निर्देश, सबसे ऊंचे हाथी रमन की मेडिकल रिपोर्ट करें पेश

    सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केरल सरकार को फटकार लगाई क्योंकि उसने राज्य के सबसे ऊंचे हाथी, रमन की कस्टडी लेने के कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया था। कोर्ट ने हाथी की ताज़ा मेडिकल रिपोर्ट भी मांगी। कोर्ट को बताया गया कि रमन अपने देखभाल करने वाले के साथ ही रहा क्योंकि वह 'मस्त' की स्थिति में था। यह हाथियों में होने वाली एक खास स्थिति है जिसमें टेस्टोस्टेरोन का स्तर तेज़ी से बढ़ जाता है और उसे कहीं और नहीं ले जाया जा सकता था। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने कहा कि राज्य ने हाथी की देखभाल के बारे में पहले दिए गए निर्देशों का पालन नहीं किया है। बेंच ने यह भी पूछा कि क्या अधिकारी रमन की सेहत पर नज़र रख रहे हैं और केरल सरकार को निर्देश दिया कि वे हाल की मेडिकल रिपोर्ट रिकॉर्ड पर रखें।इसे भी पढ़ें: MP High Court के आदेश से 14% हुआ OBC Quota, 13% रोके गए पदों पर अनारक्षित भर्ती होगीसुनवाई के दौरान, देखभाल करने वाले पक्ष ने कोर्ट को बताया कि रमन के साथ प्यार और देखभाल से व्यवहार किया गया। जस्टिस दत्ता ने कड़े शब्दों में जवाब दिया, प्यार, देखभाल और सुप्रीम कोर्ट के रोक के आदेशों को नज़रअंदाज़ करके पैसे कमाने का मकसद। हम अच्छी तरह समझते हैं कि प्यार और स्नेह क्या होता है। हम आपकी बात नहीं सुनेंगे।" बेंच ने राज्य के वकील से यह भी पूछा क्या आप हाथी की हालत पर नज़र रख रहे हैं या नहीं? पिछली मेडिकल रिपोर्ट का मतलब है कि आपने 24 जून के बाद उसकी जाँच नहीं की है? इसके बाद कोर्ट ने राज्य सरकार को रमन की ताज़ा मेडिकल रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया। बेंच ने कहा सुनवाई की अगली तारीख पर, राज्य सरकार हाथी की देखभाल के मामले में 9 जून, 2026 के कोर्ट के आदेश का पूरी ईमानदारी और निष्ठा से पालन करेगी।इसे भी पढ़ें: मक्खी मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, केंद्र और दिल्ली पुलिस को मेट्रो और ट्रेनों पर लगी पूर्ण रोक हटाने का SC ने दिया निर्देश9 जून को सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार को आदेश दिया था कि वह रमन को अपनी कस्टडी में ले और उसे किसी सही रिहैबिलिटेशन सेंटर में रखे। कोर्ट ने कहा कि बेज़ुबान जानवरों की भलाई सबसे ज़रूरी है। कोर्ट ने यह भी देखा कि रमन का कमर्शियल इस्तेमाल किया गया था और उसे धार्मिक जुलूसों और रस्मों में इस्तेमाल किया जाता था। यह आदेश जयकृष्ण मेनन की अवमानना ​​याचिका पर आया था। मेनन ने कहा था कि हाथी माता अमृतानंदमयी मठ का है और उसे सिर्फ़ देखभाल के लिए कुछ समय के लिए कृष्णनकुट्टी को सौंपा गया था। उस आदेश में बेंच ने कहा था, यह वाकई दुखद है कि जिस हाथी (रमन) की बात हो रही है जो केरल राज्य का सबसे लंबा हाथी भी है। उसका कमर्शियल इस्तेमाल किया गया, जबकि ऐसे इस्तेमाल पर रोक का आदेश था और यह सब इस कोर्ट के सामने दिए गए एक वचन के बावजूद हुआ।

    दुश्मन के सबमरीन की खैर नहीं, INS मांग्रोल होगा नौसेना में शामिल

    आईएनएस मांग्रोल 12 अक्टूबर 2026 को मुंबई के नेवल डॉकयार्ड में भारतीय नौसेना में शामिल होगा. कोचीन शिपयार्ड द्वारा निर्मित यह स्वदेशी एंटी-सबमरीन जहाज तटीय सुरक्षा बढ़ाएगा. वाइस एडमिरल संजय वत्सायन समारोह की अध्यक्षता करेंगे.

    Ishan Kishan के देसी अंदाज पर फिदा हुए क्रिकेट फैंस

    भारत और वेस्टइंडीज के बीच दूसरे टी20 मुकाबले से पहले ईशान किशन का देसी अंदाज सोशल मीडिया पर छा गया है. स्टार स्पोर्ट्स के वीडियो में वह कहते नजर आए, “एक कचौड़ी, दो समोसा, ईशान पर है पूरा भरोसा.” उनका यह मजेदार डायलॉग फैन्स को खूब पसंद आ रहा है. रांची में होने वाले मुकाबले से पहले ईशान चर्चा में हैं. वह 2026 में टी20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शानदार फॉर्म में हैं.

    INDIA Bloc की बैठक में शामिल नहीं हुआ Shiv Sena UBT, जानें क्या है पूरा मामला

    सूत्रों के मुताबिक, शिवसेना (UBT) ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को बताया है कि उसके प्रतिनिधि शुक्रवार रात राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ INDIA ब्लॉक के नेताओं की बैठक में शामिल नहीं हो पाएंगे, क्योंकि उन्हें महाराष्ट्र MLC चुनाव से जुड़े पहले से तय कामों में व्यस्त रहना है। हालांकि, पार्टी ने विपक्षी गठबंधन और इस मुद्दे पर उसके अभियान को अपना पूरा समर्थन दिया है। INDIA ब्लॉक के नेता, वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' में कथित गड़बड़ियों को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के सिलसिले में राष्ट्रपति से रात 8 बजे मिलने वाले हैं। सूत्रों के अनुसार, राष्ट्रपति कार्यालय ने शुक्रवार सुबह इस मुलाकात की पुष्टि की।इसे भी पढ़ें: J&K के Kishtwar में PDP Leader Abdul Kabir गिरफ्तार, Burhan Wani को शहीद बता कर खड़ा किया था विवादखरगे को लिखे एक पत्र में, शिवसेना (UBT) के नेताओं संजय राउत और अरविंद सावंत ने कहा कि वे अपनी पार्टी की ओर से आपकी लीडरशिप में INDIA ब्लॉक और राहुल गांधी जी के नेतृत्व वाले मोर्चे को पूरी और बिना किसी शर्त के अपना समर्थन देना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हम भारत के चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त और BJP सरकार में उन लोगों को बेनकाब करने और हटाने के लिए उठाए जा रहे हर कदम और कोशिश का मज़बूती से समर्थन करते हैं, जो हमारे लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थानों को कमज़ोर कर रहे हैं।अपनी गैर-मौजूदगी के बारे में बताते हुए दोनों नेताओं ने कहा कि महाराष्ट्र में होने वाले MLC चुनावों के सिलसिले में पहले से तय कार्यक्रमों की वजह से, हम आज रात 8:00 बजे राष्ट्रपति भवन में माननीय राष्ट्रपति जी से मिलने के लिए मौजूद नहीं रह पाएंगे। उन्होंने आगे कहा कि हमारी गैर-मौजूदगी के लिए हमें माफ़ किया जाए। कृपया माननीय राष्ट्रपति तक INDIA ब्लॉक की इस मुहिम के प्रति हमारा पूरा समर्थन पहुंचाएं। लोकतंत्र और संविधान को बचाने की इस ऐतिहासिक लड़ाई में हमारी पार्टी गठबंधन के साथ है।इसे भी पढ़ें: Nagaon Lok Sabha Bypoll: BJP प्रत्याशी देवाशीष शर्मा बदरुद्दीन अजमल से 1.46 लाख मतों से आगेराष्ट्रपति से मिलने वाले विपक्षी प्रतिनिधिमंडल में खड़गे, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, TMC प्रमुख ममता बनर्जी, CPI(M) के महासचिव MA बेबी और RJD नेता तेजस्वी यादव के शामिल होने की उम्मीद है। महाराष्ट्र में अपने कार्यक्रमों के कारण बैठक से दूर रहने के बावजूद, शिवसेना (UBT) ने कहा कि वह इस मुद्दे पर INDIA गठबंधन के साथ पूरी तरह से खड़ी है।

    TCS और Wipro समेत IT कंपनियों पर अमेरिकी Green Card रोक का भारत ने किया विरोध

    नयी दिल्ली, नौ अक्टूबर भारत ने शुक्रवार को अमेरिका के उस फैसले की आलोचना की, जिसमें टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज और विप्रो जैसी बड़ी वैश्विक एवं भारतीय आईटी कंपनियों के लिए अहम ग्रीन-कार्ड प्रक्रिया कार्यक्रम पर रोक लगा दी गई है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस कदम से दोनों देशों के साझा लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में मदद नहीं मिलेगी। इसके साथ ही, भारत ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस द्वारा विदेशी पेशेवरों को ‘बंधुआ मज़दूर’ बताए जाने को पूरी तरह ‘‘निराधार और अत्यंत अपमानजनक’’ करार दिया।अमेरिका में विदेशी कर्मचारियों की संख्या कम करने की व्यापक कोशिशों के तहत, ट्रंप प्रशासन ने आठ बड़ी आईटी कंपनियों के लिए ‘स्थायी श्रम प्रमाणन’ (पीईआरएम) कार्यक्रम को निलंबित कर दिया और कई विश्वविद्यालयों में जांच शुरू कर दी। यह निर्णय भारत और अमेरिका के रिश्तों में जारी तनाव के बीच लिया गया। जिन कंपनियों पर कार्रवाई हो रही है, उनमें इन्फोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, विप्रो, एचसीएल टेक्नोलॉजीज, माइक्रोसॉफ्ट, एडोब, कैपजेमिनी और कॉग्निजेंट शामिल हैं।पीईआरएम को अमेरिका में स्थायी निवास और नागरिकता पाने का एक रास्ता माना जाता है। अमेरिका के इस कार्यक्रम को रोकने के फ़ैसले का असर हज़ारों भारतीय प्रौद्योगिकी पेशेवरों पर पड़ने की उम्मीद है, जो एच1बी वीज़ा पर अमेरिका आने के बाद वहाँ स्थायी रूप से रहने के लिए नियोक्ता प्रायोजित ग्रीन कार्ड पर निर्भर रहते हैं। अपनी प्रतिक्रिया में, माइक्रोसॉफ्ट ने कहा कि पिछले वित्त वर्ष में उसने जो 6,000 एच1-बी वीज़ा आवेदन जमा किए थे, उनमें से 80 प्रतिशत मौजूदा कर्मचारियों का स्तर बढ़ाने या बदलने के लिए थे, न कि नए लोगों को नौकरी पर रखने के लिए।इसने कहा, ‘‘हमें अमेरिकी कार्यबल की ताकत और प्रतिभा पर भरोसा है। इसीलिए अमेरिका में माइक्रोसॉफ्ट के अधिकतर कर्मचारी अमेरिकी ही हैं। हम प्रशासन को और जानकारी देने के लिए तैयार हैं।’’ कंपनी ने कहा, ‘‘उदाहरण के लिए पिछले वित्त वर्ष में एच-1बी वीजा के लिए दाखिल किए गए लगभग 6,000 आवेदनों में से 80 प्रतिशत माइक्रोसॉफ्ट के मौजूदा कर्मचारियों की वीजा अवधि बढ़ाने या उनकी स्थिति में बदलाव के लिए थे।ये आवेदन नए लोगों को नौकरी पर रखने के लिए नहीं थे।’’ नए कर्मचारियों के लिए किए गए शेष आवेदन उन लोगों के लिए थे जो पहले से ही कानूनी रूप से अमेरिका में रह रहे थे और जिन्होंने कंपनी के लिए काम करने का फैसला किया। ऐसे लोग अमेरिकी कार्यबल का केवल एक प्रतिशत हिस्सा ही हैं। माइक्रोसॉफ्ट ने कहा, ‘‘वे हमारे देश में आने वाले नए लोग नहीं हैं।’’ कंपनी ने कहा कि माइक्रोसॉफ्ट एच-1बी वीजा के लिए केवल उन्हीं लोगों के आवेदन दाखिल करती है, जो इस वीजा श्रेणी के कड़े मानकों पर खरे उतरते हैं।विदेश मंत्रालय ने कहा, ‘‘यह भी साफ़ होना चाहिए कि प्रतिभा गतिशीलता दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए फ़ायदेमंद है। इससे भारतीयों के लिए तो मौके बनते ही हैं, साथ ही यह अमेरिकी कंपनियों को बेहतरीन प्रतिभा, नवोन्मेष, अनुसंधान, उत्पादकता, प्रतिस्पर्धात्मकता और नौकरी के मौके पैदा करने में भी मदद करता है, तथा इसके अलावा अमेरिका में शेयर धारकों की संपत्ति भी बढ़ाता है।’’ इसने कहा, ‘‘इसलिए, यह दोनों देशों के लिए बहुत अधिक आपसी लाभ वाला क्षेत्र है और हमें उम्मीद है कि इस प्रक्रिया से जुड़े सभी पक्ष इस बात को समझेंगे। अमेरिका की ओर से घोषित किए गए कदम दोनों देशों की साझा महत्वाकांक्षाओं को आगे नहीं बढ़ाते हैं।’’ भारत ने दिल्ली ने अमेरिका में काम कर रहे विदेशी पेशेवरों के बारे में वेंस की टिप्पणियों पर भी कड़ी आपत्ति जताई।विदेश मंत्रालय ने कहा, ‘‘हमने इस संदर्भ में अमेरिकी उपराष्ट्रपति की कुछ टिप्पणियां भी देखी हैं। हमारा मानना ​​है कि ऐसी बातें बेबुनियाद हैं और इस तथ्य की अनदेखी करती हैं कि अमेरिका में भारतीय पेशेवर वहां की अर्थव्यवस्था और नवोन्मेष तंत्र में उच्च शिक्षित और कुशल योगदानकर्ता हैं।’’ इसने एक बयान में कहा, ‘‘सच तो यह है कि खुद अमेरिका का इतिहास उन पीढ़ियों के प्रवासियों से बना है, जिनकी मेहनत, उद्यम और नयी सोच ने इसके विकास और समृद्धि में योगदान दिया है।’’ बयान में कहा गया, ‘‘ऐसी शब्दावली का इस्तेमाल करना, जो दर्दनाक ऐतिहासिक और औपनिवेशिक विरासत की याद दिलाती हो, बेहद अपमानजनक है।’’ विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह इस मामले से जुड़ी गतिविधियों पर लगातार नजर रखेगा। अमेरिका के श्रम मंत्री कीथ सोंडरलिंग ने बृहस्पतिवार को नए उपायों की घोषणा करते हुए कहा, ‘‘हम इन कंपनियों से जुड़े किसी भी नए स्थायी श्रम प्रमाणन आवेदन को स्वीकार नहीं करेंगे और न ही किसी लंबित आवेदन पर कोई कार्रवाई करेंगे।’’ वेंस ने विदेशी कर्मचारियों को भर्ती करने वाली आईटी कंपनियों की आलोचना करते हुए कहा, ‘‘मुझे यकीन है कि यहाँ मौजूद हर कोई उस खेल को समझता है, जो खेला जा रहा है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘आप देश के बाहर से बंधुआ मज़दूरों को लाते हैं, अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकालते हैं और अगर आप एक कॉर्पोरेशन हैं, तो अमेरिकी कर्मचारियों की मज़दूरी कम करके और उनकी जगह ऐसे लोगों को रखकर बहुत सारा पैसा कमाते हैं, जिन्हें शायद शुरू से ही अमेरिका में नहीं होना चाहिए था।

    स्टारडम से दूर थे नाना, आखिरी सांस तक याद रहा बचपन का घर, बोले पड़ोसी

    करोड़ों लोगों के स्टार नाना पाटेकर अपने पुराने घर और पड़ोसियों को कभी नहीं भूले. माहिम की सोसायटी में आज भी गणपति और नाना से जुड़ी उनकी यादें जिंदा हैं.

    J&K के Kishtwar में PDP Leader Abdul Kabir गिरफ्तार, Burhan Wani को शहीद बता कर खड़ा किया था विवाद

    जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान हिजबुल मुजाहिद्दीन कमांडर बुरहान वानी को ‘शहीद’ बताने वाले पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के नेता अब्दुल कबीर को गिरफ्तार कर लिया गया। किश्तवाड़ के उपायुक्त पंकज शर्मा ने कहा, ‘‘उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है और इस संबंध में कानूनी कार्रवाई जारी है।’’ इससे पहले अब्दुल कबीर ने बुरहान वानी को ‘‘शहीद’’ कहकर नया विवाद खड़ा कर दिया था। इसके साथ ही उन्होंने भाजपा के कुछ नेताओं पर मारे गए आतंकवादी के घर जाने और उसके परिवार को आर्थिक मदद देने का आरोप लगाते हुए सवाल उठाए थे।हम आपको याद दिला दें कि कश्मीर घाटी में कभी आतंकवाद का चेहरा रहा बुरहान वानी आठ जुलाई 2016 को दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले के कोकरनाग इलाके में सुरक्षा बलों के साथ हुई मुठभेड़ में मारा गया था। कबीर ने पार्टी कार्यक्रम से इतर पत्रकारों से कहा, ‘‘बुरहान वानी के साथ जो हुआ मैंने उस पर कोई खास बात नहीं की थी। मेरे कहने का मतलब यह था कि जब बुरहान वानी शहीद हुआ या मारा गया, तब उस समय हमारे भाजपा नेता उसके घर गए थे और उसके परिवार को मुआवजा दिया था। इसकी क्या वजह थी? यह आप खुद समझ सकते हैं।’’ जब उनसे पूछा गया कि क्या एक आतंकवादी को ‘‘शहीद’’ कहना सही है, तो कबीर ने कहा कि किसी व्यक्ति के लिए इस्तेमाल की जाने वाली शब्दावली अलग विषय है।इसे भी पढ़ें: Kashmir में Terrorism पर सबसे बड़ा प्रहार! Kulgam से Kupwara तक Security Forces ने कसा जबरदस्त शिकंजाउन्होंने कहा, ‘‘यह हमारी अपनी बात है। हम किसी को शहीद कहें, मारा गया कहें या कोई और शब्द इस्तेमाल करें—यह एक अलग बात है। हमें आजादी है। हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं।’’ यह पूछे जाने पर कि क्या बुरहान वानी को शहीद कहना उनकी निजी राय है, कबीर ने सहमति जताते हुए कहा, ‘‘हां, यह मेरी निजी राय है।’’ कबीर ने यह भी दावा किया कि जब पीडीपी भाजपा के साथ गठबंधन सरकार में थी, तब उसने भाजपा को पूरी तरह से अपने चंगुल में रखा हुआ था।उन्होंने कहा, ‘‘2014 में जब जम्मू-कश्मीर में भाजपा हमारे साथ गठबंधन सरकार में थी, तब महबूबा मुफ्ती ने उन्हें सरकार में सिर उठाने का मौका तक नहीं दिया। आप जानते हैं कि बुरहान वानी के मामले में क्या हुआ। आप यह भी जानते हैं कि नेशनल कॉन्फ्रेंस द्वारा बेची गई बिजली परियोजना पर उस समय कोई सवाल नहीं उठा सका।’’ उन्होंने कहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भाजपा को अनुच्छेद 370 को हटाने की बात तो दूर, उस पर चर्चा तक करने की इजाजत नहीं दी थी। पीडीपी नेता ने आरोप लगाया कि भाजपा ने उनकी पार्टी की पीठ में छुरा घोंपा और सरकार गिरा दी।इस बीच, पीडीपी ने इस पूरे विवाद से खुद को अलग करने की कोशिश की है। पार्टी प्रवक्ता वीरेंद्र सिंह सोनू ने कहा कि कबीर पार्टी के एक नेता हैं, न कि कोई पदाधिकारी। उन्होंने कहा, ‘‘यह उनकी निजी राय है, पार्टी का आधिकारिक रुख नहीं।’’ वहीं, पीडीपी के किश्तवाड़ जिलाध्यक्ष शेख नासिर ने कहा कि कबीर ने पार्टी कार्यक्रम के दौरान कोई विवादित बात नहीं कही थी, बल्कि बाद में पत्रकारों से अलग से बातचीत में यह टिप्पणी की थी। दूसरी ओर, भाजपा नेता और विधानसभा में विपक्ष के नेता सुनील शर्मा ने पीडीपी की मानसिकता पर सवाल उठाते हुए कबीर की गिरफ्तारी को सही ठहराया है।

    25 करोड़ के बजट में बनी फिल्म ने कमाए 330 करोड़ रुपये, मलयालम सिनेमा की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर बनी ‘बेथलेहम कुदुंबा यूनिट’

    निविन पॉली और ममिता बैजू की फिल्म ‘बेथलेहम कुदुंबा यूनिट’ ने 25 करोड़ रुपये के बजट में दुनियाभर में 330.93 करोड़ रुपये कमाकर मलयालम सिनेमा की सबसे ज्यादा कमाई वाली फिल्म का रिकॉर्ड बनाया।

    तुमको भी ठोंकेगे, अंसारुल्लाह ने अब सऊदी के यारों को खुल्ला धमकाया

    तुर्की और पाकिस्तान के हुक्मरानों कान खोल कर सुन तुम्हारा भी वही अंजाम होगा जो सऊदी के बादशाहों का हो रहा है। यमन की सना से जैसे ही यह आवाज उठी जनता का जोश हाई हो गया। यमन की राजधानी सना की सड़कों पर 7 अक्टूबर को हथियारों का वो भयानक सैलाब उमड़ा जिसने पूरे मिडिल ईस्ट से लेकर इस्लामाबाद और अंकारा तक सन्नाटा पसार दिया। हजारों लाखों सशस्त्रूती लड़ाकों ने सना के चौराहे पर शक्ति प्रदर्शन करते हुए जन लामबंदी का कड़ा ऐलान कर दिया। वहीं हूती सुप्रीम लीडर अब्दुल मलिक अलहुती ने टीवी पर लाइव आकर सीधे पाकिस्तान और तुर्की को खुली चेतावनी जारी कर दी कि वे सऊदी अरब के इस खूनी खेल में मोहरा बनने की ऐतिहासिक भूल ना करें। अल मसरा टीवी पर अपने बेहद आक्रामक भाषण में हूती ने दो टुक शब्दों में कहा कि सऊदी अरब के साथ पिछले सारे शांति वार्ता के रास्ते अब हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं। ना कूटनीति काम आई ना सीज फायर काम आया। सऊदी अरब ने यमन के एयरपोर्ट्स, आर्थिक संसाधनों और आयात निर्यात की नाकेबंदी करके यमनी आवाम का गला घोटा है। पर अब पाकिस्तान और तुर्की के दम पर जंग को भड़का रहा है। अलहूति ने पाकिस्तान और तुर्की की जनता और वहां की उन आवाजों की तारीफ की जो इस जंग का विरोध कर रही हैं। लेकिन साथ ही कड़ी शब्दों में चेतावनी भी दी कि मक्का डिफेंस एग्रीमेंट के नाम पर अगर पाकिस्तानी और तुर्की सेनाएं सऊदी अरब के इशारे पर यमन के खिलाफ मैदान में उतरी तो उनका अंजाम भी वही होगा जो पिछले 8 सालों में सऊदी गठबंधन का हुआ है। सड़कों पर उमड़े इस भारी बारूदी जमावड़े और हूतियों की इस ऑल आउट वार के ऐलान ने साफ कर दिया है कि बाब अल मंदेब से लेकर रियाद तक अब कोई शांति समझौता नहीं होने वाला। एक तरफ पाकिस्तान और तुर्की की सेनाएं मक्का पैक्ट के तहत तेजी से सऊदी अरब में अपनी तैनाती बढ़ा रही हैं। तो दूसरी तरफ यमन के पहाड़ों में अंसारुल्लाह ने अपनी मिसाइलों ड्रोंस की नोक सीधे इन तीनों देशों के गठबंधन की तरफ मोड़ दी। यमन की धरती पर अब एक ऐसा भयंकर और खूनी महासंग्राम छिड़ चुका है जिसमें पाकिस्तान और तुर्की की एंट्री ने पूरे इलाके को तीसरे विश्व युद्ध की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। पर सवाल यह है कि जिस हिसाब से अलहूदी ने पाकिस्तान और सऊदी को चेतावनी दी है। इसे भी पढ़ें: Riyadh के हवाई अड्डे पर हमले में Saudia एयरलाइंस कैप्टन समेत तीन नागरिकों की मौतGACA ने कहा कि इन हमलों में सऊदी के 3 नागरिकों की मौत हो गई (अल्लाह उन पर अपनी कृपा बनाए रखे) और सऊदी नागरिकों व अलग-अलग देशों के कई निवासी घायल हो गए; घायलों में मामूली चोट से लेकर गंभीर रूप से घायल लोग शामिल थे। सभी घायलों को तुरंत सही इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया। हमलों से कुछ संपत्ति का नुकसान भी हुआ।" अथॉरिटी ने बताया कि हमलों के बाद तय नियमों और इमरजेंसी रिस्पॉन्स प्लान के अनुसार इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीमों और संबंधित एजेंसियों ने तुरंत कार्रवाई की। बयान में आगे कहा गया GACA संबंधित अधिकारियों के साथ मिलकर नुकसान का आकलन करने, सुविधाओं की सुरक्षा की जांच करने और यात्रियों व कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा किंगडम के सिविल एविएशन सिस्टम की सुरक्षा बनाए रखने के लिए ज़रूरी कदम उठाने का काम कर रहा है।इसे भी पढ़ें: Vishwakhabram: Asim Munir ने Pakistan Parliament के फैसले को किया दरकिनार, बिना किसी से पूछे सऊदी अरब में भेजी सेनाGACA ने यह भी पुष्टि की कि एयरपोर्ट का कामकाज फिर से शुरू हो गया है और हवाई यातायात सामान्य हो गया है। इस बीच, सऊदी एयरलाइंस ने पुष्टि की कि इस घटना में उसके एक कर्मचारी की मौत हो गई और उसने मृतक कर्मचारी के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की। एयरलाइंस ने शुक्रवार को जारी अपने आधिकारिक बयान में कहा कि सऊदी एयरलाइंस पुष्टि करती है कि रियाद के किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हुई घटना में उसके एक कर्मचारी की मौत हो गई। एयरलाइंस उसके परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करती है। 

    कार्यवाहक पद की अनिश्चितता खत्म, Punjab में IPS Gaurav Yadav को मिला 2 साल का कार्यकाल

    पंजाब सरकार ने शुक्रवार को 1992 बैच के IPS अधिकारी गौरव यादव को रेगुलर डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस (DGP) नियुक्त किया, जिससे इस पद को लेकर लंबे समय से चली आ रही अनिश्चितता खत्म हो गई। एक आधिकारिक आदेश के अनुसार, यादव जुलाई 2022 से कार्यवाहक DGP के तौर पर काम कर रहे थे और रेगुलर DGP के तौर पर उनका कार्यकाल पद संभालने की तारीख से कम से कम दो साल का होगा। यह नियुक्ति पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के उस आदेश के कुछ दिनों बाद हुई है, जिसमें कोर्ट ने एक PIL पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को रेगुलर DGP की नियुक्ति पर सही फ़ैसला लेने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने कहा कि कामचलाऊ व्यवस्था अनिश्चित काल तक नहीं चलनी चाहिए और मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर तय की। याचिकाकर्ता ने कहा था कि जुलाई 2022 से यह पद अतिरिक्त प्रभार की व्यवस्था के ज़रिए चलाया जा रहा था।इसे भी पढ़ें: हमला कहां से होगा पता नहीं: Supreme Court बेंच से हटे जस्टिस नागू, दूसरी बेंच सुनेगी केसराज्य के गृह विभाग के आदेश के अनुसार, यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (UPSC) ने 1 जुलाई के अपने पत्र के ज़रिए, राज्य सरकार द्वारा भेजे गए पैनल में से तीन IPS अधिकारियों को DGP पद पर नियुक्ति के लिए उपयुक्त माना। राज्य सरकार द्वारा भेजे गए 14 सीनियर IPS अधिकारियों के पैनल में से UPSC द्वारा चुने गए तीन अधिकारियों में यादव का नाम भी शामिल था। UPSC पैनल में अन्य दो अधिकारी स्पेशल DGP शरद सत्य चौहान और सीनियर IPS अधिकारी हरप्रीत सिंह सिद्धू थे। आदेश में कहा गया है कि UPSC से मिले पैनल पर विचार करने के बाद यादव को राज्य पुलिस बल का प्रमुख नियुक्त किया गया। नियमों के तहत, जब कोई राज्य रेगुलर DGP की नियुक्ति के लिए अधिकारियों की सूची भेजता है, तो UPSC की एम्पैनलमेंट कमेटी तीन अधिकारियों का पैनल वापस भेजती है, जिनमें से एक को चुना जाता है।इसे भी पढ़ें: Supreme Court: जस्टिस शील नागू पंजाब सरकार की याचिका की सुनवाई से अलग हुएचार्ज संभालने के बाद, यादव ने मुख्यमंत्री भगवंत मान से मुलाकात की और उन्हें राज्य में आंतरिक सुरक्षा की स्थिति और कानून-व्यवस्था के बारे में जानकारी दी। पंजाब पुलिस ने एक्स पर बताया कि यादव ने पुलिस बल के प्रमुख, यानी डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस (DGP) का पद संभाल लिया है। एक्स पर एक पोस्ट में यादव ने कहा कि आज मैंने पंजाब के माननीय मुख्यमंत्री एस भगवंत मान से मुलाकात की और उन्हें राज्य में आंतरिक सुरक्षा की स्थिति और कानून-व्यवस्था के बारे में जानकारी दी। बैठक में पंजाब के मुख्य सचिव भी मौजूद थे। उन्होंने आगे कहा कि पंजाब पुलिस शांति, सद्भाव और जन-सुरक्षा बनाए रखने और एक सुरक्षित व नशा-मुक्त पंजाब बनाने में मदद करने के लिए प्रतिबद्ध है।

    पूर्व UN मानवाधिकार प्रमुख Navanethem Navi Pillay को 2026 के Nobel Peace Prize का ऐलान

    ओस्लो, नौ अक्टूबर भारतीय मूल की दक्षिण अफ्रीकी विधिवेत्ता नवनेथम ‘नवी’ पिल्लई को नोबेल शांति पुरस्कार देने की शुक्रवार को घोषणा की गई। संयुक्त राष्ट्र की पूर्व मानवाधिकार प्रमुख पिल्लई ने शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून को बढ़ावा देने के प्रयासों के लिए शुक्रवार को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार देने की घोषणा की गई। इनके काम ने नरसंहार और यौन हिंसा से संबंधित अंतरराष्ट्रीय कानून को आकार देने में मदद की।वह अंतरराष्ट्रीय अदालत में एक ऐसे मामले में न्यायाधीश के रूप में भी कार्यरत हैं, जिसमें गाम्बिया ने म्यांमा पर नरसंहार रोधी संधि के उल्लंघन का आरोप लगाया है। तेईस सितंबर, 1941 को डरबन में तमिल मूल के भारतीय माता-पिता के घर जन्मीं पिल्लई का बचपन रंगभेद के दौर में बीता। उन्होंने आगे चलकर रंगभेद विरोधी कार्यकर्ताओं का बचाव करने तथा मानवाधिकारों और समानता को बढ़ावा देने के क्षेत्र में अपना करियर बनाया।इंस्टीट्यूट फॉर अफ्रीकन वुमेन इन लॉ द्वारा प्रकाशित परिचय के अनुसार, पिल्लई के पिता बस चालक थे और परिवार का भरण-पोषण करने के लिए कई काम करते थे, जबकि उनकी मां अपने आठ बच्चों की देखभाल करती थीं। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद, उनके माता-पिता शिक्षा को बहुत महत्व देते थे और इस बात पर जोर देते थे कि उनके बेटों की तरह बेटियों को भी शिक्षा मिलनी चाहिए। पिल्लई ने नेटाल विश्वविद्यालय से पढ़ाई की और बाद में हार्वर्ड विश्वविद्यालय से कानून में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की।इंस्टीट्यूट फॉर अफ्रीकन वुमेन इन लॉ के अनुसार, 1967 में पिल्लई दक्षिण अफ्रीका के नेटाल प्रांत में वकालत शुरू करने वाली पहली अश्वेत महिला बनीं। उन्होंने कई दशकों तक रंगभेद विरोधी कार्यकर्ताओं का बचाव किया और राजनीतिक बंदियों के साथ किए जाने वाले व्यवहार को उजागर किया। साउथ अफ्रीकन हिस्ट्री ऑनलाइन के अनुसार, 1973 में उन्होंने राजनीतिक कैदियों को कानूनी सलाहकार की सेवाएं प्राप्त करने का अधिकार दिलाने में मदद की।उन्होंने रंगभेद विरोधी कार्यकर्ताओं का प्रतिनिधित्व भी किया और बंदियों के साथ यातना तथा एकांत कारावास के इस्तेमाल की ओर ध्यान आकर्षित किया। पिल्लई दक्षिण अफ्रीका के संविधान में समानता के अधिकार को शामिल कराने के प्रयासों में भी शामिल रहीं। वूमेन्स नेशनल कोएलिशन की सदस्य के रूप में उन्होंने उस अभियान में योगदान दिया, जिसके परिणामस्वरूप संविधान में भेदभाव पर रोक लगाने वाला समानता संबंधी प्रावधान शामिल किया गया।साउथ अफ्रीकन हिस्ट्री ऑनलाइन के साथ एक साक्षात्कार में पिल्लई ने बताया कि किस तरह अलग-अलग राजनीतिक, नस्ली और धार्मिक पृष्ठभूमि की महिलाओं ने समानता को बढ़ावा देने और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए मिलकर काम किया। बाद में उनका करियर दक्षिण अफ्रीका के उच्च न्यायालय, रवांडा के लिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक अदालत तक पहुंचा। उन्होंने रवांडा न्यायाधिकरण में न्यायाधीश और अध्यक्ष के रूप में काम किया तथा 2008 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त रहीं।अगस्त 2013 में श्रीलंका की यात्रा के दौरान पिल्लई ने चेतावनी दी थी कि देश में तेजी से निरंकुश शासन की प्रवृत्ति बढ़ती दिखाई दे रही है और गृहयुद्ध समाप्त होने के चार साल बाद भी वहां कानून का शासन कमजोर हो रहा है। उन्होंने कहा था कि यात्रा के दौरान उनसे मिलने वाले लोगों को उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था। उन्होंने धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमलों को लेकर भी चिंता जताई थी।उत्तरी शहर जाफना में उन्होंने तमिल परिवारों से मुलाकात की, जिन्होंने अपने लापता परिजनों, सेना द्वारा जमीन अधिग्रहण और बुनियादी सुविधाओं की कमी के बारे में बताया। पिल्लई ने कहा था कि वह उन लोगों के साथ हो रहे व्यवहार पर ध्यान देती रहेंगी, जिनसे उन्होंने मुलाकात की थी। श्रीलंका सरकार ने उत्पीड़न के आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि पिल्लई को अपनी इच्छा से किसी से भी मिलने की अनुमति दी गई थी।उनके न्यायिक करियर के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक रवांडा के लिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण में उनका काम रहा। वहां वह जीन-पॉल अकायेसू के खिलाफ ऐतिहासिक मामले की सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों में शामिल थीं। पूर्व महापौर अकायेसू को 1994 के रवांडा नरसंहार के दौरान मानवता के खिलाफ अपराधों और नरसंहार के लिए प्रत्यक्ष एवं सार्वजनिक रूप से उकसाने का दोषी ठहराया गया था।न्यायाधिकरण के फैसले ने स्थापित किया कि यदि आवश्यक मंशा मौजूद हो, तो बलात्कार और यौन हिंसा को नरसंहार के कृत्यों के रूप में माना जा सकता है। इन्हें मानवता के खिलाफ अपराध भी माना जा सकता है। नॉर्वे की नोबेल समिति ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका के लिए पिल्लई की सराहना की।समिति ने नरसंहार के लिए उकसाने के मामले में न्यायाधिकरण के काम को भी रेखांकित किया। अकायेसू मामले में न्यायाधिकरण ने उन्हें नरसंहार के लिए प्रत्यक्ष और सार्वजनिक रूप से उकसाने का दोषी ठहराया, जिससे अंतरराष्ट्रीय आपराधिक कानून में एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम हुई। संगठन के आधिकारिक इतिहास के अनुसार, पिल्लई ने 1992 में जेसिका न्युविर्थ और फेरियल घराही के साथ मिलकर ‘इक्वैलिटी नाउ’ की स्थापना की थी।यह अंतरराष्ट्रीय महिला अधिकार संगठन महिलाओं के अधिकारों को आगे बढ़ाने और भेदभावपूर्ण कानूनों एवं प्रथाओं को चुनौती देने के लिए काम करता है। सितंबर 2025 में, पिल्लई की अध्यक्षता वाले स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि इजराइली अधिकारियों और सुरक्षा बलों ने गाजा में फलस्तीनियों के खिलाफ नरसंहार किया था। हालांकि इजराइल ने रिपोर्ट के निष्कर्षों को खारिज कर दिया था।नोबेल पुरस्कार की घोषणा करते हुए नॉर्वे की नोबेल समिति ने सार्वभौमिक कानूनी सिद्धांतों के प्रति पिल्लई की प्रतिबद्धता की सराहना की। समिति ने कहा कि उन्होंने राष्ट्रों और राष्ट्रीय नेताओं को जवाबदेह ठहराया तथा हिंसा और संघर्ष के पीड़ितों में आशा जगाई। समिति ने उन्हें अपने समय की सबसे सम्मानित अंतरराष्ट्रीय विधिवेत्ताओं में से एक बताया और इस बात पर जोर दिया कि शांति बनाए रखने तथा हिंसा के बिना संघर्षों का समाधान करने के लिए कानून का शासन आवश्यक है।समिति ने कहा, “शांति के लिए न्याय जरूरी है।” उसने दलील दी कि स्थायी शांति की नींव कानूनी सिद्धांतों पर होनी चाहिए, न कि शक्तिशाली देशों की इच्छा या शक्ति के नाजुक संतुलन पर। नोबेल शांति पुरस्कार पहली बार 1901 में दिया गया था। इस तरह 2026 में इस पुरस्कार की 125वीं वर्षगांठ है।