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    5.85 की बिजली, कारपोरेशन ने 4.55 रुपए में बेची:टोरेंट की वजह से एक साल में 312 करोड़ की लगी चपत

    13 hours ago

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    उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन ने 5.85 प्रति यूनिट की बिजली खरीद कर आगरा की निजी टोरेंट पावर कंपनी को 4.55 रुपए प्रति यूनिट में बेची। इसकी वजह से पावर कारपोरेशन को एक साल में 312 करोड़ की चपत लगी। उत्तर प्रदेश विद्युत संघर्ष समिति ने इस मामले में सीएजी जांच की मांग की है। संयुक्त संघर्ष समिति के संयोजक शैलेंद्र दुबे ने कहा कि प्रदेश में आगरा और ग्रेटर नोएडा में बिजली सप्लाई कर रही निजी कंपनियों के वित्तीय लेखा-जोखा की भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) से जांच होनी चाहिए। बिजली वितरण जैसी जनसेवा में पारदर्शिता और जवाबदेही तय होनी चाहिए। इन कंपनियों के आय-व्यय, लाभ-हानि और सरकारी रियायतों का ऑडिट होना बेहद जरूरी है। दिल्ली HC के फैसले का हवाला संघर्ष समिति ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले को नजीर बताया है, जिसमें कोर्ट ने दिल्ली की निजी बिजली वितरण कंपनियों (बीएसईएस डिस्कॉम) के सीएजी ऑडिट का रास्ता साफ किया है। कोर्ट ने साफ माना है कि बिजली वितरण का सीधा असर करोड़ों उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ता है, इसलिए निजी कंपनियां ऑडिट का विरोध नहीं कर सकतीं। समिति ने मांग की है कि इसी निर्णय के आधार पर उत्तर प्रदेश में भी इन निजी बिजली कंपनियों की जांच सीएजी से करानी चाहिए। निजी कंपनी को फायदा पहुंचाने का बोझ आम आदमी पर कब तक संघर्ष समिति ने आंकड़ों के साथ आगरा का उदाहरण रखा। बताया कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में यूपी पावर कॉरपोरेशन ने टोरेंट पावर को लगभग 2400 मिलियन यूनिट बिजली सप्लाई की। कॉरपोरेशन ने यह बिजली टोरेंट को 4.55 रुपए प्रति यूनिट की रियायती दर पर दी। जबकि इसी अवधि में कॉरपोरेशन की खुद की औसत बिजली लगभग 5.85 प्रति यूनिट की दर से खरीदी। इस हिसाब से कॉरपोरेशन को अपनी लागत से करीब 1.30 रुपए प्रति यूनिट कम दर पर निजी कंपनी को बिजली देनी पड़ी। एक साल में इसकी वजह से सरकारी खजाने को लगभग 312 करोड़ रुपए का सीधा वित्तीय नुकसान हुआ है। पिछले 16 साल ये आगरा में ये खेल जारी है। 16 साल से पावर कारपोरेशन उठा रहा घाटा समिति ने सवाल उठाया क्या यही निजीकरण का असली मॉडल है? पिछले 16 वर्षों से आगरा अर्बन डिस्ट्रीब्यूशन फ्रेंचाइजी व्यवस्था के तहत पावर कारपोरेशन लगातार घाटा सहकर निजी कंपनी को सस्ती बिजली दे रहा है। इसके कारण सरकारी क्षेत्र को अब तक हजारों करोड़ रुपये की चपत लग चुकी है। इस भारी-भरकम घाटे का बोझ प्रदेश के आम उपभोक्ताओं पर टैरिफ बढ़ाकर और पावर कॉरपोरेशन के मत्थे मढ़कर डाला जा रहा है। जबकि निजी कंपनी लगातार अपनी तिजोरी भर रही है। ग्रेटर नोएडा में भी करार का उल्लंघन संघर्ष समिति ने इसी तरह ग्रेटर नोएडा की निजी बिजली कंपनी पर भी सवाल उठाए। कहा कि इस कंपनी ने समझौते के तहत बिजली उत्पादन प्लांट (पावर प्लांट) लगाने की जिम्मेदारी ली थी। पर इसे आज तक पूरा नहीं किया। समिति ने मांग की है कि कंपनी के सभी संविदात्मक दायित्वों, वित्तीय लेन-देन और उपभोक्ता हितों की सीएजी से निष्पक्ष जांच कराई जाए।
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