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    अमेरिका गल्फ देशों से सैनिकों को कम कर सकता है:ईरान जंग के चलते फैसला, यहां 20 सैन्य ठिकानों पर 40 हजार सैनिक तैनात

    14 hours ago

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    ईरान के साथ युद्ध के बाद अमेरिका फारस की खाड़ी (गल्फ) में अपनी सैन्य मौजूदगी कम करने पर विचार कर रहा है। वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, पेंटागन समीक्षा कर रहा है कि क्या अब गल्फ देशों में पहले जितने अमेरिकी सैनिक रखने की जरूरत है। इसकी बड़ी वजह युद्ध में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को हुआ भारी नुकसान है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान 200 से ज्यादा अमेरिकी सैन्य सुविधाएं क्षतिग्रस्त या तबाह हुई हैं। फिलहाल अमेरिका जॉर्डन से लेकर ओमान तक फैले करीब 20 सैन्य ठिकानों पर लगभग 40 हजार सैनिक तैनात रखता है। हालांकि, इस पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। पेंटागन, ज्वाइंट स्टाफ और अमेरिकी सेंट्रल कमांड मिलकर यह आकलन कर रहे हैं कि युद्ध के बाद मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य तैनाती कैसी होनी चाहिए। गल्फ में अमेरिका के सबसे बड़े सैन्य ठिकाने बहरीन में अमेरिकी नौसेना के फिफ्थ फ्लीट का मुख्यालय है। वहीं कुवैत, कतर, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और दूसरे गल्फ देशों में अमेरिका के बड़े सैन्य ठिकाने हैं। अमेरिका कई दशकों से इन सैन्य ठिकानों के जरिए मिडिल ईस्ट में अपने सैन्य अभियान चलाता रहा है और क्षेत्र के सहयोगी देशों की सुरक्षा में मदद करता रहा है। ईरानी हमलों के बाद बदली रणनीति ईरान के साथ युद्ध के दौरान अमेरिका के कई सैन्य ठिकाने मिसाइल और ड्रोन हमलों की जद में आए। मार्च में कुवैत के एक सैन्य ठिकाने पर हुए हमले में 6 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध में 200 से ज्यादा अमेरिकी मिलिट्री फैसिलिटी को नुकसान पहुंचा। इस दौरान कुल 18 अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई है। ईरान के हमलों से बचाव के लिए अमेरिकी सेना को 1000 से ज्यादा एयर डिफेंस इंटरसेप्टर मिसाइलें दागनी पड़ीं। इससे पैट्रियट और थाड जैसे एयर डिफेंस सिस्टम के मिसाइल भंडार पर दबाव बढ़ गया। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि भविष्य में ऐसे हमलों का खतरा कम करने के लिए सैनिकों और सैन्य उपकरणों की तैनाती पर दोबारा विचार करना जरूरी है। सैनिकों को दूसरी जगह भेजने पर विचार पेंटागन में इस समय कई प्रस्तावों पर चर्चा चल रही है। इनमें गल्फ देशों से कुछ सैनिकों और सैन्य उपकरणों को जॉर्डन, इजराइल या सऊदी अरब के रेड सी (लाल सागर) तट के करीब तैनात करने का सुझाव दिया गया है। अधिकारियों का मानना है कि ये इलाके ईरान की सीधी मिसाइल और ड्रोन पहुंच से अपेक्षाकृत ज्यादा सुरक्षित हो सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, सैनिकों की तैनाती को लेकर ट्रम्प सरकार के भीतर भी अलग-अलग राय है। एक पक्ष चाहता है कि अमेरिका मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी कम करे और संसाधनों का ज्यादा इस्तेमाल घरेलू सुरक्षा तथा चीन से मुकाबले पर करे। वहीं दूसरा पक्ष मानता है कि गल्फ देशों और इजराइल में मजबूत अमेरिकी सैन्य मौजूदगी बनाए रखना जरूरी है, ताकि क्षेत्र में अमेरिका का प्रभाव कायम रहे। इजराइल में सैन्य मौजूदगी बढ़ाने का भी प्रस्ताव एक प्रस्ताव में कुवैत समेत कुछ गल्फ देशों से सैनिकों और सैन्य उपकरणों को इजराइल के ओवदा एयरबेस भेजने की बात भी कही गई है। हालांकि, इस प्रस्ताव का प्रशासन के भीतर विरोध भी हो रहा है। कुछ अधिकारियों का कहना है कि इजराइल में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी बढ़ने से संवेदनशील खुफिया जानकारी की सुरक्षा पर खतरा बढ़ सकता है। गल्फ देशों पर भी पड़ेगा असर अगर अमेरिका गल्फ देशों से बड़ी संख्या में अपने सैनिक हटाता है, तो इसका सबसे ज्यादा असर वहां के सिक्योरिटी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर पड़ेगा। साथ ही, पूरे मिडिल ईस्ट के सुरक्षा समीकरण भी बदल सकते हैं। दशकों से सऊदी अरब, UAE, कतर, कुवैत, बहरीन और दूसरे खाड़ी देश अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिकी सैन्य मौजूदगी पर निर्भर रहे हैं। सैनिकों की संख्या कम होने पर इन देशों को अपनी सैन्य क्षमता बढ़ानी पड़ सकती है या नए सुरक्षा साझेदार तलाशने पड़ सकते हैं। हालांकि, अमेरिकी सैनिकों की संख्या कम होने का मतलब यह नहीं होगा कि दोनों पक्षों के सुरक्षा संबंध खत्म हो जाएंगे। हथियारों की खरीद, खुफिया जानकारी साझा करने और सैन्य सहयोग जैसी व्यवस्थाएं पहले की तरह जारी रह सकती हैं। सितंबर तक 3.6 लाख करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान पेंटागन का अनुमान है कि सितंबर के अंत तक ईरान युद्ध पर अमेरिका का खर्च 37.5 अरब डॉलर (करीब 3.6 लाख करोड़ रुपए) तक पहुंच सकता है। इस अनुमान में क्षतिग्रस्त सैन्य ठिकानों को दोबारा बनाने का खर्च शामिल नहीं है। इसलिए अमेरिका अब सिर्फ उनकी मरम्मत पर नहीं, बल्कि यह भी तय कर रहा है कि सभी ठिकानों को पहले की जगह फिर से बनाया जाए या कुछ को दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया जाए। अमेरिका ने गल्फ देशों में सैन्य ठिकाने क्यों बनाए? 1. तेल और गैस की सप्लाई सुरक्षित रखने के लिए: दुनिया के बड़े हिस्से को तेल और गैस फारस की खाड़ी से मिलती है। अमेरिका चाहता है कि इन समुद्री रास्तों में कोई बाधा न आए। 2. ईरान की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए: 1979 की ईरानी क्रांति के बाद से अमेरिका और ईरान के रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं। गल्फ में मौजूद सैन्य ठिकाने अमेरिका को ईरान की सैन्य गतिविधियों पर नजर रखने में मदद करते हैं। 3. सहयोगी देशों की सुरक्षा के लिए: सऊदी अरब, UAE, कुवैत, कतर और बहरीन लंबे समय से अमेरिका के रणनीतिक साझेदार रहे हैं। अमेरिकी सैन्य ठिकाने इन देशों की सुरक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं। 4. मिडिल ईस्ट में सैन्य अभियानों के लिए: इराक, अफगानिस्तान और ISIS के खिलाफ अभियानों में अमेरिका ने इन्हीं सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल किया है। ----------------------------- यह भी पढ़ें….. ट्रम्प का ईरान पर सबसे बड़े आर्थिक प्रतिबंधों का ऐलान: बोले- जो देश मदद करेंगे, उन पर भी एक्शन लेंगे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी आर्थिक कार्रवाई का ऐलान किया है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
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