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    BHU में 40 साल बाद स्थापित हुआ अत्याधुनिक तारामंडल:6 माह का चैप्टर 1 माह में हो जायेगा समाप्त, त्योहारों की तिथियों का भेद होगा समाप्त

    1 hour ago

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    बीएचयू आधुनिक और वैदिक पद्धतियों से अंतरिक्ष विज्ञान के रहस्यों को उजागर करने की ओर मजबूती से कदम बढ़ाएगा। अंतरिक्ष विज्ञान संबंधी आधुनिक अध्ययन को वैदिक रीति से धार दिया जाएगा। इसके लिए बीएचयू के ज्योतिष विभाग में तारा मंडल को 40 साल बाद पुनः स्थापित किया गया। इस बार खास बात यह है कि अत्याधुनिक मशीन का प्रयोग किया जा रहा है। जिससे त्योहारों के तिथियों का भेद खत्म होगा ही साथ ही जिस स्थान या समय का ग्रह एवं आकाशीय स्थिति देखना चाहते हैं, सरलता से उसका ज्ञान होगा। सबसे ज्यादा फायदा शोध छात्रों को होगा जो आकाशीय ज्ञान में कुछ नया करना चाहते हैं। इस प्रोजेक्ट के निदेशक प्रोफेसर शत्रुघ्न त्रिपाठी ने बताया कि यह प्रोजेक्ट जनवरी में मिला था जिसकी लागत एक करोड रुपए थी जिसमें तीन तरह के यंत्रों को स्थापित किया जाना था जिसमें तारामंडल को स्थापित कर दिया गया है। एक सप्ताह के अंतर्गत टेलीस्कोप भी लगा दिया जाएगा, उसके बाद पारंपरिक यंत्रों का निर्माण होगा। उन्होंने बताया कि इसके लिए प्रतिदिन छात्रों को तारामंडल कैसे संचालित किया जाएगा, इसका ज्ञान दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि हम लोगों ने अपने ही विभाग में देश के विभिन्न ज्योतिषाचार्य के साथ मिलकर त्योहारों के भेद को खत्म करने के लिए बैठक की और हमने यह तय किया था कि विभिन्न राज्यों में त्योहारों की जो दो तिथियां हो रही हैं उसको भी समाप्त किया जाए यह लग जाने के बाद हम पूरी तरह से सफल होंगे और जो हमारे पत्रा या पंचांग बनेंगे वह भी पूरी तरह से शुद्ध बनेंगे। 6 माह का चैप्टर 1 माह में हो जायेगा समाप्त प्रोफेसर शत्रुघ्न त्रिपाठी ने कहा - गोल परिभाषा का चैप्टर 6 माह में छात्रों को पढ़ाया जाता था। लेकिन यह लग जाने के कारण 1 माह में ही छात्रों को इसका अध्ययन हो जा रहा है इसके लग जाने से काफी फायदा भी हो रहा है। उन्होंने बताया कि इसमें हम छात्रों को सूर्य के बदलाव की स्थिति, ग्रहों के चाल,खगोलीय घटनाएं,ग्रहण का ज्ञान सहित अन्य ज्योतिष गणित का प्रारम्भिक ज्ञान पढ़ाया जाता है। जो अब स्टूडेंट्स देख कर समझ जायेंगे। अब जानिए कैसा जलाया जायेगा तारामंडल प्रोफेसर शत्रुघ्न त्रिपाठी ने कहा - तारामंडल मशीन को संचालित करना एक बेहद सटीक और तकनीकी प्रक्रिया है। आधुनिक डिजिटल तारामंडल मशीनों को चलाने के लिए मुख्य रूप से सॉफ्टवेयर और ऑप्टिकल प्रोजेक्टर के तालमेल की आवश्यकता होती है। 1. सिस्टम पावर-अप और इनिशियलाइजेशन - सबसे पहले, मुख्य नियंत्रण कक्ष से पावर सप्लाई शुरू की जाती है। इसमें प्रोजेक्टर लैंप, कंप्यूटर सर्वर और साउंड सिस्टम शामिल होते हैं। आधुनिक मशीनों को गर्म होने के लिए कुछ मिनटों की आवश्यकता होती है ताकि प्रोजेक्टर के बल्ब या लेजर अपनी पूरी चमक पर आ सकें। 2. सॉफ्टवेयर और कैलिब्रेशन - आजकल के तारामंडल डिजिटल फिश-आई लेंस या मल्टी-प्रोजेक्टर सिस्टम का उपयोग करते हैं। सॉफ्टवेयर लॉन्च - ऑपरेटर कंप्यूटर पर स्काई-सिमुलेशन सॉफ्टवेयर (जैसे SkyExplorer या Digistar) खोलता है। संरेखण - मशीन यह सुनिश्चित करती है कि डोम (गुंबद) पर दिखने वाली इमेज पूरी तरह से सटीक हो। इसमें 'ब्लेंडिंग' तकनीक का उपयोग होता है ताकि दो प्रोजेक्टर के बीच की रेखा दिखाई न दे। 3. खगोलीय डेटा सेट करना - मशीन को "जलाने" या चलाने का मतलब है उसे एक विशेष समय और स्थान पर सेट करना जैसे - स्थान और समय ऑपरेटर दुनिया के किसी भी कोने और किसी भी समय (भूतकाल या भविष्य) का चुनाव कर सकता है। सितारों की चमक - सॉफ्टवेयर के माध्यम से तारों की तीव्रता और वायुमंडलीय प्रभाव (जैसे प्रकाश प्रदूषण) को नियंत्रित किया जाता है। 4. ऑप्टिकल स्टार बॉल- कई बड़े तारामंडलों में बीच में एक बड़ी "स्टार बॉल" होती है। इसमें सैकड़ों लेंस और बहुत शक्तिशाली लाइट सोर्स होते हैं। जब इसे ऑन किया जाता है, तो इसके भीतर के छोटे छिद्रों से प्रकाश निकलता है, जो गुंबद पर असली रात के आकाश जैसा अनुभव देता है। संस्कृति और विज्ञान के स्टूडेंट्स उठाएंगे इसका लाभ प्रोफेसर शत्रुघ्न त्रिपाठी ने बताया कि यूपी में पहली बार किसी विश्वविद्यालय में इतने बड़े स्तर पर लगाया जा रहा है। इसमें से संस्कृति के ही नहीं बल्कि विज्ञान के स्टूडेंट भी अध्ययन करने के लिए आ सकते हैं। इसके लिए फिजिक्स डिपार्टमेंट के प्रोफेसर अमित कुमार पाठक स्वयं बच्चों के साथ यहां पहुंच कर अध्ययन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि यह महामना की कल्पना थी जिसको अब चरितार्थ किया जा रहा है। इसके लिए एक डिप्लोमा कोर्स भी विभाग द्वारा शुरू किया जायेगा। महामना ने सबसे पहले निर्माण किया था ज्योतिष विभाग की स्थापना 1918 में महामना मदन मोहन मालवीय ने प्राची-प्रतीची ज्ञान-विज्ञान के समन्वय के उद्देश्य से की थी। विभाग ने दशकों से अध्ययन, अध्यापन और पंचांग प्रकाशन के माध्यम से समाजहित में कार्य किया है, परंतु प्रायोगिक सुविधाओं के अभाव में उन्नत शोध प्रभावित हो रहा था। 1982-85 के बीच तत्कालीन विभागाध्यक्ष प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा स्थापित लघु तारामण्डप और लौह यंत्र आज की तकनीकी आवश्यकताओं के अनुरूप अप्रासंगिक हो चुके हैं। लघु वेधशाला का वैज्ञानिक उपयोग कैसे होगा 12 प्वाइंट में समझें (1) ज्योतिष विभाग के छात्रों एवं भौतिकी विभाग M.A/M.SC के छात्रों के NEP के पाठ्यक्रम में निर्धारित विषय का प्रायोगिक अध्ययन संभव हो सकेगा। (2) प्राचीन परम्परा से गणितीय सूत्रों द्वारा साधित रवि-चन्द्र के मानों का आधुनिक यन्त्र (दूरदर्शक) से प्रयोग द्वारा प्राप्त परिणामों में अन्तर का ज्ञान संभव होगा। (3) IKS की परिकल्पना के अनुरूप सौर विकिरण एवं लम्बन तथा ग्रहण (रवि-चन्द्र) पर तुलनात्मक अध्ययन द्वारा नूतन तथ्यों का प्रकाशन संभव होगा। (4) खगोलीय परिवर्तन का आधुनिक यंत्रों से स्थिति ज्ञान कर प्राचीन ज्ञान परम्परा में प्रतिपादित विधि द्वारा मौसम आदि का पूर्वानुमान ज्ञात होगा। (5) प्राचीन पत्थर के यन्त्र से छाया वेध से प्राप्त रवि साधन के परिणाम को आधुनिक यंत्र (दूरदर्शक) से प्रायोगिक परिज्ञान कर परिणाम में अन्तर स्पष्ट किया जा सकेगा। 6) ग्रहसाधन (गणितीय) एवं वेधोपलब्ध (दूरदर्शक) ग्रह स्थिति में लगातार प्रयोगिक परीक्षण से अन्तर जानकर उस अन्तर के कारण एवं प्रायोगिक भूल (Experimental Error) को नवीन शोधपत्रों व पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित किया जा सकेगा। (7) सूर्य या चन्द्रग्रहण का प्रत्यक्ष प्रदर्शन कर प्राचीन परम्परा एवं आधुनिक परम्परा से अध्ययन वा शोधरत छात्रों को दोनों में समन्वय दिखाकर नूतन शोध हेतु प्रोत्साहित किया जा सकेगा। (8) अन्तरिक्ष, आकाशगंगा, तारे, उल्का, पात आदि जैसे खगोलीय विषयों पर प्रायोगिक अध्ययन के साथ तुलनात्मक अध्ययन भी संभव हो सकेगा। (9) एक स्थान पर प्राचीन एवं नवीन यंत्रों तथा आकाशीय ज्ञान हेतु तारा मण्डप जैसे यंत्रों की सहायता से अंतर्विषयक शोधपत्र एवं अभिनव परियोजना हेतु तथ्यात्मक नये विषय भी प्राप्त हो सकेंगे । (10) प्राचीन-आधुनिक वेधप्राप्त परिणामों के आधार पर नूतन यन्त्र निर्माण कर उनका पेटेंट कराना भी सरल हो सकेगा। (11) तारामण्डप द्वारा आकाशीय ज्ञान करके खुले आकाश में खगोलीय परिवर्तन के द्वारा प्राचीन संहिता शास्त्रोक्त विधि से आपदा, जलवायु परिवर्तन एवं मौसम का ज्ञान संभव हो सकेगा। (12) अन्तरिक्ष विज्ञान (भौतिकी विभाग) में वर्णित (लिखित) विषयों को प्रायोगिक आधार पर परीक्षण करते हुये उनके प्रायोगिक अध्ययन से विषय को समझने में मदद मिलेगी।
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