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    बृजभूषण के बदले सुर, बगावत या नई पिच की तैयारी:अखिलेश को 'कृष्ण का वंशज' बताया; BJP की बढ़ेगी टेंशन, आखिर नाराजगी क्यों

    23 hours ago

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    अयोध्या के सोहावल में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 10 जुलाई को कहा था- ठीक 7 दिन बाद भाजपा के कद्दावर नेता और 6 बार के सांसद रहे बृजभूषण शरण सिंह ने बयान दिया था- यह कोई पहला मौका नहीं है। बृजभूषण शरण सिंह के पिछले 2 साल के बयान सियासी विरोधाभासों से भरे हैं। कभी वे पीएम मोदी को अपना सर्वोच्च नेता बताते हैं, तो कभी सीएम योगी को नेता मानने से साफ इनकार कर देते हैं। कभी वे सपा मुखिया अखिलेश यादव को 'धार्मिक इंसान और श्रीकृष्ण का वंशज' बताने लगते हैं, तो कभी अपनी ही पार्टी और राम मंदिर ट्रस्ट पर 'चढ़ावे की चोरी' का सनसनीखेज आरोप लगा देते हैं। क्या वे भाजपा से अलग होकर सियासत की किसी नई पिच पर बैटिंग की तैयारी में हैं? बृजभूषण के इन 'विद्रोही' बयानों की पूरी क्रोनोलॉजी पढ़िए… एक ही महंत के दोनों शिष्य रहे बृजभूषण सिंह और योगी आदित्यनाथ, दोनों गोरखपुर पीठ के पूर्व पीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ के शिष्य रहे हैं। यहां तक कि जब एक बार लोकसभा में तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ भावुक होकर रो पड़े थे, तब बगल में बैठे बृजभूषण सिंह ने ही उन्हें रुमाल दिया था। इसके बावजूद जब-तब उनके बयानों से यह संदेश जाता है कि उनके और सीएम योगी के रिश्तों में तल्खी है। ‘नेता भविष्य के राजनीतिक एजेंडे के इर्द-गिर्द बयान देता है’ वरिष्ठ पत्रकार आनंद राय कहते हैं- बृजभूषण सिंह और योगी आदित्यनाथ दोनों राजनीति में हैं। राजनीति में कौन-सा बयान कितना फायदेमंद है, हर नेता का बयान उसके राजनीतिक एजेंडे के इर्द-गिर्द रहता है। इन बयानों से यह संकेत भी मिलते हैं कि भविष्य में उनके क्या राजनीतिक उद्देश्य होंगे। बृजभूषण शरण सिंह हमेशा बड़े महाराज (महंत अवैद्यनाथ) का बहुत सम्मान करते रहे हैं। अब उनके और सीएम योगी के बीच क्या व्यक्तिगत अदावत (बैर) है, यह कभी खुलकर सामने नहीं आया। 'पार्टी से अलग है बृजभूषण सिंह का कद' अयोध्या की राजनीति को करीब से देख चुके वरिष्ठ पत्रकार इंद्रभूषण पांडेय कहते हैं- बृजभूषण सिंह का राजनीतिक वजूद सिर्फ भाजपा से नहीं है। राजनीति में कुछ ऐसे लोग होते हैं, जिनका कद पार्टियों से बड़ा होता है। भाजपा को परिवारवाद के खिलाफ माना जाता है, जबकि उसी पार्टी ने बृजभूषण सिंह की पत्नी और बेटे तक को टिकट दिया। बृजभूषण सिंह उन नेताओं में से हैं जो सच बोल लेते हैं। हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों पर रोजा इफ्तार या नमाज नहीं हुई थी, यह सच है। यह भी सच है कि हनुमानगढ़ी का निर्माण मुस्लिम शासक नवाब शुजा-उद-दौला ने कराया था। बृजभूषण सिंह ने वही सच बोला है, जो गजेटियर और इतिहास में भी दर्ज है। जहां तक श्रीराम मंदिर न जाने की बात है, तो यह भी सच है कि राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख नेताओं में एक नाम बृजभूषण सिंह का भी रहा। प्राण-प्रतिष्ठा जैसे समारोह में उन्हें निमंत्रित न करके अपमानित किया गया। हिंदू धर्म में मान्यता है कि बिना शिखर और धर्मध्वजा के कोई मंदिर पूरा नहीं हो सकता। मंदिर के पूरा हुए बिना उसके अंदर मूर्ति कैसे स्थापित हो सकती है? यही कारण है कि देश के चारों शंकराचार्य भी आज तक श्रीराम मंदिर का दर्शन करने नहीं गए। ऐसे कई लोग हैं, जो इस मंदिर को धार्मिक रूप से अपूर्ण मानते हैं। नतीजे की चिंता किए बिना बोलने वाले नेताओं में हैं बृजभूषण भाजपा जहां यूजीसी और जाति जनगणना के मुद्दे पर फूंक-फूंककर कदम रख रही है, वहीं बृजभूषण इसके खिलाफ मुखर होकर राजपूत और सवर्ण कार्ड खेलते हैं। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह कहते हैं- बृजभूषण ने कभी आरक्षण का खुला समर्थन नहीं किया। उनका मानना है कि आरक्षण का फायदा जो लोग पा चुके हैं, उन्हें दोबारा नहीं मिलना चाहिए। जहां तक सवर्णों की आवाज उठाने की बात है, तो हर राजनीतिक व्यक्ति किसी न किसी समुदाय या वर्ग को साधकर ही आगे बढ़ता है। बृजभूषण हमेशा से सवर्ण राजनीति का समर्थन करते रहे हैं। उनके क्षेत्र में सवर्ण बड़ी संख्या में हैं भी, इसलिए व्यक्तिगत राजनीतिक लाभ के लिए भी वे ऐसा बयान देते हैं। हालांकि, यह भी सच है कि उनका समर्थन करने वाले सिर्फ सवर्ण ही नहीं हैं। उन्हें उनके क्षेत्र में रहने वाले हर जाति, वर्ग और संप्रदाय का समर्थन मिलता है। मुसलमानों में भी उनका प्रभाव है और वे उन्हें वोट भी करते हैं। बृजभूषण के बयान नए समीकरण का इशारा महिला पहलवानों के विवाद के बाद से बृजभूषण सिंह व्यक्तिगत तौर पर राजनीतिक हाशिए पर दिखते हैं। यह अलग बात है कि उनके दो बेटों में से एक विधायक और दूसरा सांसद है। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह कहते हैं- उनके मन में एक टीस है। वे इस पर खुलकर कह भी चुके हैं कि वह एक बार फिर जीतकर लोकसभा में जरूर जाएंगे, चाहे भाजपा के टिकट पर हो या निर्दलीय। इसका मतलब है कि बृजभूषण सिंह अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को फिर से स्थापित करना चाहते हैं। कोई भी राजनीतिक व्यक्ति हर दांव-पेच अपने समीकरण के हिसाब से चलता है। बृजभूषण भी एक अनुभवी नेता हैं, जो समीकरण बनाना जानते हैं। उनके बदलते बयान किसी नए सियासी समीकरण की ओर इशारा कर रहे हैं। भाजपा ने निकाला तो सपा में हुए थे शामिल बृजभूषण सिंह जब पहले भाजपा से नाराज होकर निकले थे, तब सपा ही उनका ठिकाना बनी थी। तब मुलायम सिंह यादव ने ही उन्हें पार्टी जॉइन कराई थी। जबकि, राम मंदिर आंदोलन के दौरान मुलायम सिंह ने ही उन्हें गिरफ्तार भी कराया था। 2022 के विधानसभा चुनाव में वह खुलकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर हमलावर दिखे थे। ऐसे में अब अचानक उनके बदलते सुरों से साफ है कि अगर वह भाजपा छोड़ते हैं, तो सपा को एक मजबूत सियासी विकल्प के रूप में चुन सकते हैं। सपा की तारीफ प्रेशर पॉलिटिक्स का हिस्सा सपा की तारीफ करना बृजभूषण की सोची-समझी रणनीति है, जिसे 'प्रेशर पॉलिटिक्स' भी कहा जा सकता है। साल- 2008 में जब भाजपा ने उन्हें निष्कासित किया था, तब वे सपा में ही गए थे। 2009 में सपा के टिकट पर सांसद बने थे। अखिलेश की तारीफ करके वह भाजपा आलाकमान को यह संदेश दे रहे हैं कि उनके लिए विकल्प खुले हैं। वरिष्ठ पत्रकार आनंद राय कहते हैं- बृजभूषण सिंह की सपा से तल्खी मुख्य रूप से विनोद सिंह उर्फ पंडित सिंह की वजह से थी। गोंडा में दोनों एक-दूसरे के धुर राजनीतिक विरोधी रहे हैं। मुलायम सिंह यादव चूंकि पंडित सिंह को तवज्जो देते थे, बृजभूषण इसीलिए मुलायम सिंह की मुखालफत करते थे। लेकिन, यह भी सच है कि उन्हीं मुलायम सिंह यादव ने भाजपा से निकाले जाने पर बृजभूषण को सपा में जगह दी। साथ ही लोकसभा का टिकट भी दिया था। क्यों नाराज हैं बृजभूषण? बृजभूषण सिंह 1991, 1999, 2004, 2009, 2014 और 2019 में कैसरगंज, गोंडा और बलरामपुर से सांसद बने। 1996 में अपनी पत्नी और 2024 में अपने बेटे को सांसद बनवाया। अपने बाहुबल और दबदबे के बावजूद उन्हें केंद्र या राज्य सरकार में कभी वह बड़ा राजनीतिक रुतबा या संगठन में ऊंचा पद नहीं मिला, जिसके वे खुद को हकदार समझते हैं। इसके ऊपर, पहलवानों के यौन शोषण प्रकरण के बाद उन्हें न केवल कुश्ती संघ से हटना पड़ा। फिर लोकसभा चुनाव- 2024 में टिकट भी नहीं मिला। भाजपा के लिए क्या है खतरा? बृजभूषण सिंह को भाजपा चाहकर भी नजरअंदाज नहीं कर सकती। इसके पीछे का सियासी गणित समझना जरूरी है। गोंडा, बस्ती, बहराइच और बलरामपुर जैसे जिलों की करीब 20 विधानसभा सीटों पर उनका सीधा प्रभाव है। वहीं, पूर्वांचल की लगभग 50 सीटों पर उनके समर्थकों और राजपूत बिरादरी में उनकी गहरी पैठ है। गोंडा जिले के नंदिनी कॉलेज में जनवरी में 'राष्ट्रकथा' के बहाने बृजभूषण सिंह अपनी ताकत का प्रदर्शन कर चुके हैं। यहां तक कि वे बिहार के राजपूत समाज में भी एक लोकप्रिय चेहरा हैं। बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने कई सीटों पर प्रचार भी किया था। बृजभूषण की नाराजगी से भाजपा को राजपूत वोटर्स का नुकसान उठाना पड़ सकता है। बृजभूषण भले ही इन सीटों पर अकेले दम पर जीत दिलाने का माद्दा न रखते हों, लेकिन वे भाजपा की हार की बड़ी वजह जरूर बन सकते हैं। इतिहास में 2002 में जब कल्याण सिंह ने भाजपा छोड़ी, तो वे खुद भले ही सिर्फ 5 सीटें जीत पाए थे। लेकिन, उन्होंने भाजपा के 97 उम्मीदवारों को हरवा दिया था। 2017 के चुनाव में यही काम शिवपाल यादव ने सपा के लिए किया था। --------------------------- यह खबर भी पढ़ें - हनुमानगढ़ी में कभी नमाज नहीं पढ़ी गई- बृजभूषण, गोंडा में बोले- मंदिर का निर्माण मुस्लिम व्यक्ति ने कराया था गोंडा में पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने हनुमानगढ़ी में नमाज पढ़े जाने के दावों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि वहां कभी नमाज नहीं पढ़ी गई और इस संबंध में किए जा रहे दावे गलत हैं। बृजभूषण शरण सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हनुमानगढ़ी से जुड़े बयान पर कहा, “नहीं, नहीं, नहीं, कभी नमाज नहीं पढ़ी गई थी। यह गलत है।” पढ़िए पूरी खबर…
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