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    बौखलाए ट्रंप ने अब भारत को कौन सा नया झटका दिया? TCS-Infosys को PERM से बाहर करने पर मचा बवाल

    5 hours ago

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    अमेरिका में नौकरी कर रहे भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स के लिए ट्रंप सरकार का नया फैसला कितना बड़ा झटका है? क्या Infosys, TCS, विप्रो, HCL और कॉग्निजेंट जैसी कंपनियों के जरिए ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे भारतीयों का रास्ता अब लंबा हो जाएगा। क्या जिन लोगों का फर्म यानी कि पीईआरएम प्रोसेस अभी शुरू नहीं हुआ है उनका ग्रीन कार्ड प्रोसेस अटक सकता है?ट्रंप सरकार ने Infosys, Tata, विप्रो, HCL और कॉग्निजेंट जैसी बड़ी कंपनियों को एक प्रोग्राम से सस्पेंड कर दिया है। इसी प्रोग्राम से यह कंपनियां अपने एंप्लाइज का ग्रीन कार्ड प्रोसेस शुरू करती हैं। तो, क्या अमेरिका में काम कर रहे हर भारतीय का वीजा खतरे में है? तो जवाब है नहीं। पूरे मामले को गहराई से समझने के लिए पहले ग्रीन कार्ड को समझिए। मान लीजिए एक भारतीय इंजीनियर Infosys में काम करता है या किसी XYZ कंपनी में काम करता है और अमेरिका में पोस्टेड है। वह वहीं हमेशा के लिए बसना चाहता है। इसके लिए उसकी कंपनी को उसका ग्रीन कार्ड प्रोसेस शुरू करना होता है।इसे भी पढ़ें: Donald Trump ने Satya Nadella को किया सम्मानित, Microsoft के काम की सराहना कीग्रीन कार्ड मिलने पर कोई भी विदेशी अमेरिका में अस्थाई तौर पर रह सकता है और काम कर सकता है। लेकिन यह प्रोसेस लंबा है। इसके कई स्टेज होते हैं। इस प्रोसेस में पहला स्टेज अहम है। यानी कि पीईआरएम फुल फॉर्म जाने तो प्रोग्राम इलेक्ट्रॉनिक रिव्यू मैनेजमेंट। यह अमेरिकी लेबर डिपार्टमेंट का प्रोसेस है। इस प्रोसेस में कंपनी को पहले यह दिखाना होता है कि इस नौकरी के लिए कोई सही या योग्य अमेरिकी एंप्लई नहीं मिला है। साथ ही विदेशी एंप्लई को नौकरी देने से अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरी या उनकी सैलरी पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा। इसके लिए कंपनी पहले उस नौकरी की सही सैलरी तय करवाती है। इसे प्रिवेलिंग वेज कहते हैं। इसके बाद कंपनी नौकरी का विज्ञापन निकालती है और अमेरिकी लोगों को आवेदन करने का मौका देती है। अगर इस प्रोसेस के बाद भी कोई योग्य अमेरिकी कर्मचारी नहीं मिलता है तो कंपनी अमेरिकी लेबर डिपार्टमेंट में आवेदन करती है। विभाग यानी कि डिपार्टमेंट अगर इस आवेदन को मंजूरी दे देता है तो कंपनी विदेशी कर्मचारी के लिए अगले इमीग्रेशन यानी कि अमेरिका में नौकरी और रहने की कानूनी प्रोसेस में आगे बढ़ सकती है। तो अब भारतीय कंपनियों के पास क्या ऑप्शन बच जाता है?इसे भी पढ़ें: ट्रंप को जिताने वाले मस्क अब राहुल से हाथ मिला मोदी को हटाएंगे? Starlink-अंबानी और कारोबारी खीज की असल कहानी समझेंभारतीयों पर क्या असर पड़ सकता है?  सस्पेंड की गई कंपनियां इस दौरान नए परम आवेदन दाखिल नहीं कर पाएंगी। खबरों के मुताबिक इसका असर उनके पहले से पेंडिंग एप्लीकेशन पर भी पड़ सकता है। यानी जिन कर्मचारियों का मामला अभी परम तक पहुंचा ही नहीं उनका प्रोसेस रुक सकता है या लटक सकता है। वे अपनी प्रायोरिटी डेट भी हासिल नहीं कर पाएंगे। अमेरिका हर साल एंप्लॉयमेंट बेस्ड यानी कि नौकरी के आधार पर मिलने वाले ग्रीन कार्ड की संख्या लिमिटेड रखता है। आवेदन करने वाले ज्यादा होते हैं इसलिए अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है। प्रायोरिटी डेट तय करती है कि आप लाइन में कहां खड़े हैं। 
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