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    बुलंदशहर के अहार में कृष्ण-रुक्मिणी विवाह की मान्यता:जहां कृष्ण ने रुक्मिणी को साथ ले जाकर रचाया था विवाह, आज भी जिंदा हैं कथा से जुड़ी आस्थाएं

    26 minutes ago

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    देशभर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जा रहा है। मंदिरों में कान्हा के जन्म की तैयारियां हैं, लेकिन बुलंदशहर के अहार की पहचान कृष्ण जन्म की नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह से जुड़ी स्थानीय मान्यता के कारण अलग है। गंगा किनारे बसे इस क्षेत्र में कई ऐसे मंदिर, कुंड और प्राचीन पेड़ हैं, जिन्हें स्थानीय लोग कृष्ण-रुक्मिणी की कथा से जोड़कर देखते हैं। दिल्ली से करीब 125 किलोमीटर और बुलंदशहर से करीब 45 किलोमीटर दूर अहार गंगा किनारे बसा है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, प्राचीन काल में इसे कुंदनपुर कहा जाता था और यह राजा भीष्मक की राजधानी थी। उनकी बेटी रुक्मिणी भगवान श्रीकृष्ण की भक्त थीं। अहार का अवंतिका देवी मंदिर और उसके पीछे स्थित रुक्मिणी कुंड आज भी इस कथा की याद दिलाते हैं। कहा जाता है कि रुक्मिणी मां अवंतिका देवी की पूजा करने के लिए सुरंग के रास्ते मंदिर आती थीं। जब उनका विवाह शिशुपाल से तय किया गया तो उन्होंने श्रीकृष्ण को संदेश भेजकर उन्हें अपना पति बनाने की इच्छा जताई। मान्यता है कि इसके बाद श्रीकृष्ण कुंदनपुर पहुंचे और रुक्मिणी को अपने साथ ले गए। बाद में दोनों का विवाह हुआ। अहार में आज भी इस पूरी कथा से जुड़ी कई धार्मिक मान्यताएं लोगों की आस्था का हिस्सा हैं। अवंतिका देवी मंदिर और रुक्मिणी कुंड से जुड़ी कथा अहार स्थित अवंतिका देवी मंदिर को स्थानीय लोग कृष्ण-रुक्मिणी की कथा का महत्वपूर्ण स्थल मानते हैं। मान्यता है कि रुक्मिणी यहां मां अवंतिका देवी की पूजा करने आती थीं। मंदिर के पीछे स्थित रुक्मिणी कुंड को भी उनकी कहानी से जोड़कर देखा जाता है। स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित कथा के अनुसार, रुक्मिणी मंदिर तक पहुंचने के लिए सुरंग का इस्तेमाल करती थीं। यही वजह है कि मंदिर और कुंड आज भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र बने हुए हैं। शिशुपाल से विवाह तय हुआ तो कृष्ण को भेजा संदेश स्थानीय मान्यता के अनुसार, राजा भीष्मक की बेटी रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल से तय किया जा रहा था। रुक्मिणी भगवान श्रीकृष्ण को अपना पति मानती थीं। उन्होंने कृष्ण तक अपना संदेश पहुंचाकर उनसे विवाह करने की इच्छा जताई। कथा के मुताबिक, रुक्मिणी के संदेश के बाद श्रीकृष्ण कुंदनपुर पहुंचे और उन्हें अपने साथ ले गए। बाद में दोनों का विवाह हुआ। इसी घटना को अहार से जोड़कर यहां के लोग सदियों से धार्मिक आस्था के रूप में देखते आए हैं। त्रिलोकीनाथ और लक्ष्मीनारायण मंदिर भी कथा से जुड़े अहार में मौजूद त्रिलोकीनाथ मंदिर और लक्ष्मीनारायण मंदिर को भी स्थानीय लोग श्रीकृष्ण-रुक्मिणी की कथा से जोड़ते हैं। इन स्थलों को लेकर अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। अहार में कथा से जुड़े कई स्थानों का एक-दूसरे से संबंध बताया जाता है। यही वजह है कि जन्माष्टमी और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां आने वाले श्रद्धालु मंदिरों में दर्शन के साथ इन स्थानों को भी देखते हैं। गांवों के नाम भी विवाह की रस्मों से जोड़कर देखे जाते हैं अहार क्षेत्र के मौहरसा, बामनपुर और दरावर समेत कई गांवों के नामों को भी स्थानीय लोग श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह की रस्मों से जोड़कर देखते हैं। इन गांवों को लेकर अलग-अलग स्थानीय मान्यताएं हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों के बीच सुनाई जाती रही हैं। गंगा किनारे मौजूद प्राचीन खिन्नी और कदम के पेड़ों को भी कृष्ण-रुक्मिणी विवाह की कथा से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक आस्था के कारण ये स्थान स्थानीय लोगों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। जन्माष्टमी पर गंगा स्नान, फिर अवंतिका देवी के दर्शन जन्माष्टमी के मौके पर अहार में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। लोग गंगा में स्नान करने के बाद मां अवंतिका देवी के मंदिर पहुंचकर दर्शन और पूजा-अर्चना करते हैं। पर्व के दौरान मंदिर और आसपास का क्षेत्र धार्मिक गतिविधियों से गुलजार रहता है। देशभर में जहां जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया जाता है, वहीं अहार की धरती पर कृष्ण-रुक्मिणी के विवाह से जुड़ी स्थानीय मान्यताएं लोगों की आस्था को एक अलग पहचान देती हैं। मंदिर, कुंड, पेड़ और गांवों से जुड़ी ये कथाएं आज भी यहां की धार्मिक परंपरा और लोकविश्वास का हिस्सा बनी हुई हैं।
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