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    बस्ती में दृष्टिबाधित मूर्तिकार रामपाल की अनोखी मूर्तिकला:तीनों भाई जन्म से दिव्यांग, कोलकाता में पिता ने 4 साल की उम्र में सिखाया हुनर; अब लाखों की कमाई

    4 hours ago

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    हौसले के आगे शारीरिक सीमाएं भी छोटी पड़ जाती हैं। इसका उदाहरण हैं बस्ती जिले में मूर्ति बनाने वाले जन्म से दृष्टिबाधित मूर्तिकार रामपाल (50)। जिन आंखों से वह दुनिया नहीं देख सकते, उन्हीं हाथों के हुनर से गणेश जी और मां दुर्गा की सुंदर मूर्तियों को बनाते हैं। मिट्टी को हाथों से महसूस कर उसका आकार देने वाले रामपाल की उंगलियां जब मूर्ति पर चलती हैं तो उसमें जान आ जाती है। महज 4 साल की उम्र में पिता से सीखी कला को उन्होंने करीब 10 साल की कड़ी मेहनत से निखारा। इनके बनाए मूर्तियों की मांग दूर-दूर तक है। मूर्ति बनाने की कला से रामपाल हर साल 30-40 मूर्तियों को बनाकर करीब एक से डेढ़ लाख रुपए की कमाई करते हैं। उन्होंने बताया कि अपने जीवन काल में अब तक 700 से ज्यादा मूर्तियां बना चुके हैं। इन दिनों गणेश उत्सव के समय क्षेत्र में अपने परिवार के साथ गणेश जी के प्रतिमाओं के साथ-साथ मां दुर्गा की प्रतिमाओं का अंतिम रूप देने में जुटे हैं। आज उनकी कहानी उन तमाम लोगों के लिए मिसाल है, जो मुश्किलों को अपनी कमजोरी समझ लेते हैं। जन्म से तीनों भाई दिव्यांग, फिर भी नहीं मानी हार छावनी क्षेत्र के बबुरहवा चौराहे पर देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को बनाने वाले रामपाल कोलकाता के शांतिपुर इलाके के निकुंजनगर के रहने वाले हैं। उन्होने बताया कि हम तीन भाई थे। तीनों जन्म से ही दृष्टिबाधित थे। तीनों बेटों के दिव्यांग पैदा होने पर पिता विनय कृष्णपाल को इस बात को लेकर बहुत निराशा हुई। कुछ दिन बाद नई उम्मीद और विश्वास के साथ उन्होंने बच्चों को अपने काम और सहारे के लिए दूसरों पर निर्भर न रहने के लिए उन्होने ठान लिया। मूर्ति बनाने की कला सीखने में 10 साल लगा दैनिक भास्कर की टीम से बात करते हुए रामपाल ने बताया- मैं जब 4 बर्ष का था तभी पिता ने उन्हें मूर्ति बनाने की कला सीखाना शुरू किया। इस कला को सीखने में लगभग 10 साल लग गया था। सिखने के दौरान पिता ने बांस की फट्टी काटना, जोड़ना और बांधना बताया। इसके बाद मिट्टी का लेप करने की बारीकी को सही तरह से बताकर एक सफल मूर्तिकार बनाया। रामपाल कहते हैं- मूर्ति बनाते समय कभी कोई गलती होती थी तो पिता पिटाई भी कर देते थे। लेकिन बाद में प्यार करना भी नहीं भूलते थे। उन्होने ने बताया कि मूर्ति बनाने में माहिर होने के बाद पिता ने मेरी शादी कोलकाता में ही कंचना पाल से कराई थी, कुछ साल बाद मेरे पिता का देहांत हो गया। घर में हम और हमारी पत्नी ही केवल रह गए। कुछ दिन बाद ईश्वर के कृपा से मुझे एक बेटा भी हुआ, जिसका नाम हमने सौरभ रखा है। सौरभ की भी शादी बगल के गांव की रहने वाली सीमा से हमने कर दिया। कील लगाते समय कभी-कभी होती समस्या रामपाल से जब पूछा गया कि आप जन्म से देख तो पाते नहीं, लेकिन फिर भी इतनी सुंदर प्रतिमा कैसे बना लेते हैं? इसपर उन्होंने बताया कि एक इंसान के लिए देख न पाने पर जीवन में बहुत सी समस्याओं का सामना करन पड़ता है, जोकि ठीक उसी तरह मेरे जीवन में हुआ। समाज से मिले ताने-बाने से मुझे और मेरे परिवार को बहुत निराश कर देती थी। लेकिन हमने हार नहीं मानी। आगे उन्होने बताया कि मूर्ती बनाते समय कील जब हथौड़ी के सहारे लगाते हैं तो हाथ में चोट भी लग जाती थी। कभी-कभी तो न देख पाने की वजह से कुछ मूर्तिया भी खराब हो जाती थी। लेकिन हमने उसके बाद भी हार नहीं मानी। समय के साथ रामपाल ने मूर्ति बनाने में इस प्रकार से पकड़ बना ली कि वह अब बिना देखे ही सभी देवी-देवाताओं के प्रतिमाओं को आकार दे लेते हैं। मिट्टी को छूकर पहचान लगा लेते हैं कि यह मूर्ति के बनाने लायक है या नहीं। मूर्ति की बनावट समझना, ढांचे पर लेप करना और प्रतिमा के अलग-अलग हिस्सों को सही से आकार देना उनके लिए आसान काम हो गया है। यही हुनर अब गणेश उत्सव, नवरात्रि और मां लक्ष्मी की मूर्ती बनाने में उनकी पहचान बन चुका है। परिवार के साथ कोलकाता से बस्ती जिले में आए रामपाल ने बताया कि गांव में अच्छी कमाई न हो पाने की बजह से बहुत परेशानी होने लगी। जिसके बाद अपने एक साथी के संपर्क से हम परिवार को साथ लेकर बस्ती में छावनी के बबुरहवा चौराहे पर आ जाते हैं। गणेश उत्सव नवरात्रि की मूर्ति बनाने के लिए वह लगातार यहां आकर तब से मूर्ति बनाकर बेचने का कारोबार कर रहे हैं। इनके बानाए मूर्तियों की मांग क्षेत्र में दू्र-दूर तक है। उत्सव शुरू होने से पहले ही सभी मूर्तियों को रामपाल अपने परिवार के साथ अन्तिम रूप देने में जुट जाते हैं। इस बार गणेश उत्सव में 8 मूर्तियां तैयार किए हैं, जिसमें 6-7 मूर्तियां बिक चुकी हैं। मूर्तियों की बुकिंग 5-6 महीनों पहले, कमाई लाखों में पिछले साल देवी-देवताओं की मूर्तियों की बात करें तो इन्होने बताया कि गणेश पूजा की चार मूर्तियां, दुर्गा पूजा की 30 मूर्तियां और लक्ष्मी पूजा की 10 मूर्तियों को तैयार किए थे। सभी मूर्तियों की बुकिंग 5-6 माह पहले हो गई थी। जिससे कमाई भी लगभग एक से डेढ़ लाख रुपए तक हो गया था। उन्होंने बताया कि अब मेरे बनाए गए मूर्तियों की चर्चा दूर-दूर तक हो रही है। चर्चा होने से हर साल मूर्तियों की मांग भी बढ़ रही है। इसलिए अब मेरे साथ मेरी पत्नी के अलावां मेरा बेटा सौरभ और बहू भी मूर्ती बनाने में साथ दे रहे हैं। मूर्तियों की रंगाई में हरबल रंगों का उपयोग आगे रामपाल ने बताया कि मेरे बनाए गए मूर्तियों की मांग इसलिए ज्यादा है क्योंकि वह मूर्ति बनाने के दौरान प्लास्टर ऑफ पैरिस और घातक रंगों का इस्तेमाल नहीं करते। सिर्फ गांव में खेत की मिट्टी को लाकर उससे मूर्तियों का निर्माण करते हैं। रंगाई के लिए पेड़-पौधों, फूलों, पत्तियों, फलों, सब्जियों से बने रंगों (हर्बल कलर) का ही हमेशा उपयोग करते हैं। उन्होंने बताया कि नदियों और तालाबों में विसर्जन के बाद उनकी बनाई मूर्तियां पूरी तरह पानी में गल जाती है जिससे प्रदूषण नहीं फैलने देती। रामपाल की अनोखी कला पर बनी शॉर्ट फिल्म रामपाल की कला बिना देखे मिट्टी को आकार देकर देवी-देवताओं की सुंदर प्रतिमाएं तैयार करने की प्रतिभा इतनी चर्चा में आ गई कि देश की एक बहु चर्चित पेंट कंपनी ने एक विशेष सुंदर ‘शॉर्ट फिल्म’ बनाई है। इसमें रामपाल के संघर्ष, हुनर और मूर्तियां बनाने के अनोखे तरीके को दिखाया गया। खेत की मिट्टी से प्रतिमा तैयार करने से लेकर उसमें प्राकृतिक रंग भरने तक, उनका हर काम अनुभव और स्पर्श के भरोसे होता है। उनकी कला यह साबित करती है कि हुनर के सामने कोई कमी बाधा नहीं बन सकती। लक्ष्मी पूजा बाद गांव के लिए होती वापसी दैनिक भास्कर से बात करते हुए रामपाल ने बताया कि वह अंतिम मूर्ति लक्ष्मी पूजा की बनाकर नवंबर के महीने में कई महीनों व्यस्त रहने के बाद परिवार के साथ कोलकाता अपने घर चले जाते हैं। वहां जाकर परिवार के सदस्यों के साथ त्योहार की खुशियां साझा करते हैं। दृष्टिबाधित होने के बावजूद रामपाल अपनी कला के जरिए परिवार का सहारा बने हुए हैं। उनका कहना है कि मूर्तियां बनाना उनके लिए सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि भगवान के प्रति आस्था और आत्मनिर्भरता का जरिया भी है। पूजा के बाद घर लौटकर वह कुछ दिन परिवार के साथ बिताते हैं और फिर अगले काम की तैयारी में जुट जाते हैं।
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