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    बेटे के लिए इच्छामृत्यु मांगने वाले पिता का दर्द:बोले- बेटे को तड़पते हुए नहीं देख सकता था, मैं तबाह हो गया

    5 hours ago

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    'मैं बेटे के दर्द को बता नहीं सकता। उसकी पीड़ा और तड़प को देख नहीं सकता था। मैंने बेटे के लिए 13 साल में क्या-क्या कष्ट सहे, मैं बता नहीं सकता। मेरा पूरा परिवार तबाह हो गया। बेटा ठीक हो जाए, इसके लिए मैंने अपना घर तक बेच दिया। सब कह रहे हैं कि मैंने बेटे के लिए इच्छामृत्यु मांगी और मुझे यह मिली। लेकिन लोग यह नहीं जानते कि मेरा बेटा मेरा सबकुछ है। मेरी दुनिया, मेरा भविष्य। मैं कितनी पीड़ा में हूं, उसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता।' यह दर्द है गाजियाबाद के 31 वर्षीय हरीश राणा के पिता अशोक राणा का है। जिनके बेटे हरीश को कोर्ट ने इच्छामृत्यु दी है। हरीश 13 साल से कोमा में हैं। उन्हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की मंजूरी दी थी। अदालत ने यह फैसला हरीश की मां निर्मला राणा और पिता अशोक राणा की इच्छामृत्यु देने की अपील पर सुनाया। एक हफ्ते के भीतर उसे एम्स शिफ्ट किया जाएगा, जहां उनकी सभी लाइफ सपोर्ट ट्यूब हटा दी जाएंगी। ये देश में इस तरह का पहला मामला है। अशोक ने बताया कि कोई समझ नहीं सकता कि हमने क्या-क्या परेशानी उठाई है। हमें किस स्थिति में कोर्ट जाना पड़ा है। सभी लोगों ने हमेशा मेरा और परिवार का साथ दिया। मैंने बेटे को किस तरह पाल-पोशकर बड़ा किया था। उसके इलाज के लिए मैंने अपना घर तक बेच दिया। किराए के घर में आकर रहने लगा। मैंने कभी सोचा नहीं था कि यह दिन देखने को मिलेगा। हमनें बहुत प्रयास किए कि बेटा ठीक हो जाए। मगर हमारी उम्मीदें हार गईं। डॉक्टरों ने हमेशा मेरा साथ दिया। मैं और मेरी पत्नी रात में सो तक नहीं पाते थे। हमेशा बेटे की चिंता लगी रहती थी। जब सारी उम्मीदें टूट गईं, कि अब बेटा ठीक नहीं हो सकेगा। तब जाकर अदालत में इंसाफ की गुहार लगाई। इसके लिए लंबी लड़ाई लड़ी। पड़ोसी क्या बोले, अब वो पढ़िए- सोसायटी के बाहर दुकान करने वाले धर्मेंद्र ने बताया कि मैं कई साल से अशोक राणा को जानता हूं। वह खुद ही मेहनत करते थे। वह परिवार को चलाने के लिए खाने का सामान बनाते थे। उसे ग्राउंड में जा जाकर बेचते थे। उनके परिवार के किसी सदस्य को नहीं जानता। लेकिन हमेशा अशोक राणा को एक दर्द में देखा है। वह चेहरे से जरुर साफ दिखाई देते थे, लेकिन अंदर से पूरी तरह से टूट चुके थे। वह सभी से मिलते थे। उन्हें सोसायटी में आते जाते भी देखा गया है। वह हमेशा परिवार का खर्च और बेटे के इलाज के लिए खुद मेहनत करते थे, लेकिन कभी किसी से आर्थिक मदद नहीं मांगी। सोसायटी में रहने वाले ऋषि ने बताया कि मैं कई साल से उन्हें देख रहा हूं। सोसायटी के बाहर वह स्टॉल लगाते थे। वह रिटायर्ड हैं, उनके बेटे के साथ कॉलेज में हुई घटना का पता चला है। उनका बहुत संघर्ष है, उनके साथ आर्थिक समस्या रही है। उन्हें देखा है कि स्टेडियम में वह खुद आइटम बनाकर स्कूटी पर लेकर जाते थे, उन्हें बेचते थे। लेकिन कभी भी आर्थिक मदद नहीं मांगी। वह बहुत ही अच्छे इंसान है। जब उनके बेटे की स्थिति के बारे में भी मीडिया में खबरों से पता चला था। कोर्ट का फैसला है वह समाज हित में है। 6 साल पहले आए थे एमएस चौधरी ने बताया कि 6 साल से अशोक राणा यहां रहते थे। सभी से सुहानुभूति के नाते वह मिलते थे, सभी लोग उन्हें जानते थे। वह खाने-पीने का सामान बनाते थे, उससे खुद बेचते थे। वह इतना बताते थे कि 13 साल पहले मेरा बेटा पंजाब में पढ़ाई के दौरान बिल्डिंग से गिर गया था। उसके बाद से उनका बेटा बोला नहीं है। वह कोमा में चला गया। अशोक राणा का लोगों का व्यवहार बहुत ही अच्छा है, चेहरे से कभी उन्हें तनाव में नहीं देखा। लेकिन अंदर से कितने कमजोर होंगे यह बात अंदाजा लगाई जा सकती है। ---------- यह खबर भी पढ़ें… सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार इच्छामृत्यु की इजाजत दी:13 साल से कोमा में है बेटा, माता-पिता ने लगाई थी गुहार सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इच्छामृत्यु मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने 13 साल से कोमा में रह रहे 31 साल के युवक हरीश राणा को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की मंजूरी दे दी। गाजियाबाद के रहने वाले हरीश लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर हैं। पूरी खबर पढ़ें
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